सैकड़ों साल पुरानी परंपरा है कव्वाली

सैकड़ों साल पुरानी परंपरा है कव्वालीकव्वाली संगीत की एक लोकप्रिय विधा है, जिसका इतिहास 700 साल से भी पुराना है।

लखनऊ। कव्वाली संगीत की एक लोकप्रिय विधा है, जिसका इतिहास 700 साल से भी पुराना है। आठवीं सदी में ईरान और अफगानिस्तान में दस्तक देने वाली संगीत की अनोखी विधा शुरुआती दौर से ही सूफी रंगत में डूबी, वह विधा जो तेरहवीं सदी में भारत आई।

यह इस्लाम का सूफी स्वर ही था, जिसने उपेक्षा की शिकार निचली जातियों को अपनी ओर आकर्षित किया। अब जब सूफियन ने इन्हें अपना लिया है, तो इन जातियों को इनका मज़हब याद दिलाने की कोशिश हो रही है, लेकिन कव्वाली तो कब की इंसानियत की आवाज़ बन चुकी है।

मनोरंजन से जुड़ी सभी बड़ी खबरों के लिए यहां क्लिक करके इंस्टॉल करें गाँव कनेक्शन एप

सूफी पीर व फकीरों ने खोजी थी कव्वाली

कव्वाली का आगाज़ मुस्लिम धर्म के सूफी पीर/फकीरों ने किया। आठवीं सदी में ईरान और दूसरे मुस्लिम देशों में धार्मिक महफिलों का आयोजन किया जाता था, जिसे समां कहा जाता था। समां का आयोजन धार्मिक विद्वानों यानी शेख की देखरेख में किया जाता था। समां का मकसद क़कव्वाली के जरिए ईश्वर के साथ संबंध स्थापित करना होता था।

ईरान से भारत आई कव्वाली

शुरुआत में सूफियों ने अमन और सच्चाई का पैगाम पहुंचाने के लिए मौसिकी और समां का सहारा लिया। ईरान से चलकर कव्वाली भारत आई और भारत के सूफी संतों ने क़ौव्वाली को लोकप्रिय बनाया। इसमें चिश्ती संत शेख निज़ामुद्दीन औलिया का प्रमुख योगदान रहा। इसके बाद अमीर खुसरो ने भारतीय संगीत और लोक भाषाओं का समायोजन करके क़ौव्वाली को अपने समय की संगीत की एक विकसित और लोकप्रिय विधा के रूप में स्थापित किया।

प्रार्थना व भजन की तरह है कव्वाली

प्रार्थना, भजन की तरह कव्वाली में भी शब्दों का ही असली खेल है, लेकिन कव्वाली की विशेष बनावट के कारण शब्दों और वाक्यों को अलग-अलग तरीके से निखारकर गाया जाता है। हर बार किसी विशेष स्थान पर ध्यान केंद्रित करने से अलग-अलग भाव सामने आते हैं।

शब्दों को कई बार दोहराया जाता है

इसमें शब्दों को कई बार दोहराया जाता है, लेकिन जैसे-जैसे क़ौव्वाल शब्दों को दोहराते हैं शब्द बेमायने होते जाते हैं और सुनने वालों के लिए एक पुरसुकून अहसास बाकी रह जाता है, जहां जाकर वह अध्यात्मिक समाधि में खो जाते हैं। यही कव्वाली की कामयाबी का चरम है। कव्वाली को गाते समय क़ौव्वाल को ध्यान रखना पड़ता है कि अगर कोई गाने वाला या सुनने वाला आध्यात्मिक समाधि में पहुंच जाए तो क़ौव्वाल की जिम्मेदारी होती है कि वो बिना रुके कुछ ही शब्दों को तब तक दोहराता रहे जब तक वो व्यक्ति वापस पूर्व अवस्था में नहीं आ जाए।

विशेष तरीके से बैठते हैं कव्वाली

मंच पर बैठे क़ौव्वालों में भी वरिष्ठता का खास ध्यान, सबसे वरिष्ठ सबसे दाएं और इसी तरह घटता हुआ क्रम, इसके बाद मुख्य क़ौव्वाल आलाप के साथ कव्वाली का पहला छंद गाते हैं। अमीर खुसरो, बुल्ले शाह, बाबा फरीद, ख्वाजा गुलाम फरीद, हजरत सुल्तान बाहू, वारिस शाह, ये नाम सुनते ही सूफियाना रंगत में डूबा कलाम याद आता है।

सिनेमा ने अपनाई कव्वाली

कव्वाली संगीत की एक विधा है। हिंदी सिनेमा जगत में 1944 में पहली बार फिल्म ‘नाईट बर्ड’ के गाने (हसीनों के लिए) में कव्वाली का अंदाज दिखा था। धीरे-धीरे हिंदी फिल्मों में क़ौव्वाली ने अपनी पैठ बना ली ,लेकिन समय के साथ जैसे–जैसे हिंदी फिल्मों में बदलाव हुआ, पारंपरिक क़ौव्वाली का स्वरूप भी बदलने लगा। 90 के दशक के बाद हिंदी सिनेमा जगत में क़ौव्वाली के एक नए रूप का पदार्पण हुआ, जिसमें पॉप और रॉक म्यूजिक का फ्यूज़न था।

ताजा अपडेट के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहां, ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

Share it
Top