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कवयित्री नहीं भिक्षुणी बनाना चाहती थीं महादेवी वर्मा

Divendra SinghDivendra Singh   11 Sep 2018 5:30 AM GMT

कवयित्री नहीं भिक्षुणी बनाना चाहती थीं महादेवी वर्मामहादेवी वर्मा

लखनऊ। हिन्दी साहित्य जगत में कई ऐसे साहित्यकार और लेखक हुए, जिन्होंने अपनी रचनाओं से खुद को साहित्य जगत में अमर कर दिया। ऐसी ही एक कवयित्री व लेखिका थीं, महादेवी वर्मा। वे अध्यापक, कवि, गद्यकार, कलाकार, समाजसेवी और विदुषी के बहुरंगे मिलन का जीता जागता उदाहरण थीं।

महादेवी वर्मा के परिवार में कई पीढ़ियों से कोई लड़की नहीं पैदा हुई थी, उनका जन्म 26 मार्च 1907 हुआ।

बचपन से ही मिला था साहित्य का सानिध्य

इनके दादाजी फारसी और उर्दू जानते थे। बचपन से इसका असर महादेवी पर पड़ा। महादेवी वर्मा ने पंत्रतंत्र तथा संस्कृत का अध्ययन किया। महादेवी वर्मा ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई इंदौर से की। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी कविताओं का प्रकाशन होने लगा था। पाठशाला में हिंदी अध्यापक से प्रभावित होकर ब्रजभाषा में समस्यापूर्ति भी करने लगीं। फिर तत्कालीन खड़ीबोली की कविता से प्रभावित होकर खड़ीबोली में रोला और हरिगीतिका छंदों में काव्य लिखना प्रारंभ किया।

इसके बाद उन्होंने जबलपुर से बी.ए. किया। 1919 में इलाहाबाद में 'क्रॉस्थवेट कॉलेज' से शिक्षा का प्रारंभ करते हुए महादेवी वर्मा ने 1932 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। उनके दो काव्य संकलन 'नीहार' और 'रश्मि' प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुके थे। महादेवी जी में काव्य प्रतिभा सात वर्ष की उम्र में ही मुखर हो उठी थी। विद्यार्थी जीवन में ही उनकी कविताऐं देश की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाने लगीं थी।

बनना चाहती थीं भिक्षुणी

महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की एक बेहतरीन कवित्री थी। वे शुरू से ही कवि सम्मेलनों में भाग लेती थी। इसके बाद वे स्वतंत्रता संग्राम में भी अपना योगदान देने लगी। उन दिनों के प्रचलन के अनुसार महादेवी वर्मा की शादी भी जल्द ही हो गई थी। लेकिन उन्हें संसारिकता से कोई लगाव नहीं था। वे बौद्ध धर्म से काफी प्रभावित थी और बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहती थी। जिसकी शिक्षा उन्होंने शादी के बाद भी जारी रखी।

लेखिका के साथ ही थीं बेहतर समाजसेविका

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महादेवी वर्मा को मानवसेवा करना बहुत अच्छा लगता था। उन्होंने निरीह व्यक्तियों की सेवा का व्रत भी ले रखा था। वे कई बार पास के ग्रामीण अंचलों में जाकर ग्रामीण लोगों को उपचार तथा निशुल्क दवाईयां उपलब्ध कराती थी। महादेवी वर्मा ने एक निर्भीक, स्वाभिमाननी भारतीय नारी का जीवन जिया। 11 सितंबर 1987 को उनका निधन हो गया था। उनकी कविताएं आज भी जिंदा है, उन्हीं कविताओं में से कुछ कविताएं हम आपको पढ़ाने जा रहे है।

पशुप्रेमी भी थीं महादेवी

महादेवी वर्मा के हृदय में शैशवावस्था से ही जीव मात्र के प्रति करुणा थी, दया थी। उन्हें ठण्डक में कूं कूं करते हुए पिल्लों का भी ध्यान रहता था। पशु-पक्षियों का लालन-पालन और उनके साथ खेलकूद में ही दिन बिताती थीं। तभी तो उन्होंने अपनी गिलहरी और हिरण के लिए भी लिखी थी कहानियां।

गूगल डूडल ने हिन्दी कवयित्री महादेवी वर्मा को किया याद

हिन्दी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर महादेवी वर्मा को आज गूगल ने डूडल बना कर याद किया। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित महादेवी का जन्म 1907 में उत्तर प्रदेश में फर्रुखाबाद जिले में हुआ था। बचपन से ही उनके माता-पिता ने उन्हें संस्कृत और हिन्दी में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया।

गूगल डूडल ने कहा है, "आज महादेवी वर्मा को हिंदी साहत्यि के छायावाद काल की शुरुआती कवयित्रियों के तौर पर जाना जाता है।" डूडल में महादेवी एक पेड़ की छांव में बैठी हैं। उन्होंने सफेद साड़ी पहनी है और हरियाली के बीच डूबते सूरज की सुनहरी आभा में अपने विचारों को उजले कागज पर उतार रही हैं।

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