मनोज बाजपेयी: मैं आलू-टमाटर खरीदने चला जाऊंगा, पर मुझे किसी फंक्शन में मत बुलाओ

मनोज बाजपेयी: मैं आलू-टमाटर खरीदने चला जाऊंगा, पर मुझे किसी फंक्शन में मत बुलाओ

'मनोज बाजपेयी' ये नाम भारतीय हिन्दी सिनेमा में अपनी अलग पहचान रखता है। इसे सुनते ही इनकी सबसे बड़ी सफ़लता 'भीखू म्हात्रे-सत्या' का वो डॉन याद आता है,जो 'सपने में मिलती है ओ कुड़ी मेरी' पर मगन होकर नाचता है। बैंडिट क्वीन से शुरुआत करते हज़ारों उतार-चढ़ाव के बाद आलोचकों के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता मनोज ही हैं। शूल, वीरज़ारा, घात, फ़िज़ा, जुब़ैदा, हनन, आरक्षण, अय्यारी, सोनचिरैया, सत्यमेव जयते, बेव़फ़ा, दस्तक, राजनीति, पिंजर,एल.ओ.सी.कारगिल जैसी ना जाने कितनी फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाकर उन चरित्रों को जीवंत कर चुके हैं। यही नहीं... मनोज अब 'पद्मश्री मनोज बाजपेयी' हैं। हमारे 'द स्लो इंटरव्यू विद नीलेश मिसरा' सीरीज़ के इस बार के हमारे मेहमान यही वर्सेटाइल हीरो हैं। तो आइये जानते हैं इनके जीवन के और भी विभिन्न पहलू जिनसे आप सब अभी तक अनभिज्ञ हैं, और पता करते हैं कि हम सबके चहीते मनोज बाजपेयी निजी जीवन में किस तरह के व्यक्तित्व के मालिक हैं।


नीलेश मिसरा: इस बड़े शहर में मैं यहाँ कई साल रहा! बहुत आसान है सिर्फ़ कैमरे का होकर रह जाना, सिर्फ़ प्रेस कॉन्फ्रेंसों का होकर रह जाना, मीटिंग में वो चेहरा पहनकर रह जाना... अपने आप को कैसे बचा पाये आप?

मनोज बाजपेयी : (हँसते हुये) बहुत आसान है लेकिन उतना ही मुश्किल है।

नीलेश मिसरा: जी

मनोज बाजपेयी: कैसे बचा के रख पाया! हम लोग बड़ी सीमित (लिमिटेड) ज़रूरतों के साथ जीते हैं, तो सबसे पहले हमने... मैं और मेरी पत्नी (शब़ाना उर्फ़ नेहा) ने ये निर्णय लिया कि हम अपनी ज़रूरतें बढ़ने ही नहीं देंगे, ताकि हम अपने आप को बचायें, वो बहुत ज़रूरी है।

नीलेश मिसरा: वाह

मनोज बाजपेयी: हम अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये काम नहीं करेंगे, किश्तें (इंस्टॉलमेंट) देने के लिये काम नहीं करेंगे।

हाँ... हम काम करेंगे अपनी ख़ुशी के लिये, अपने सुख के लिये और आराम के लिये। बिल्कुल चाहिये! क्यों नहीं चाहिये? मुझे विदेश जाना है, मेरा घूमने का मन कर रहा है। इस साल जो है मुझे अपनी बेटी को लेकर स्विट्ज़रलैंड जाना है, हम जायेंगे, लेकिन स्विट्ज़रलैंड जाने के लिये काम नहीं करेंगे।

दूसरा उसमें ये भी है कि जैसे मैंने कहा अपनी जरूरतों को कम करने को उसमें ये भी आता है... जैसे शूटिंग से आते हुए यदि पत्नी का फोन आ जाये कि एक किलो टमाटर लेते हुए आ जाना तो उतर के टमाटर भी लेते हैं।




नीलेश मिसरा : वाह ,वाह वाह वाह वाह..., तो अभी लेते हैं आप टमाटर?

मनोज बाजपेयी : भाई वो मेरा ड्राइवर आपको बतायेगा कि कब खरीदे हैं मैंने। (दोनों के ठहाके)

नीलेश मिसरा : कमाल है ,कमाल है... वाह, वाह।

मनोज बाजपेयी : है ना! मेरी जो सब्जी वाली है वो भी जानती है कि भैया आये हैं, तो भैया को कौन सी सब्जी दिखानी है।

नीलेश मिसरा: जी, अच्छा!

मनोज बाजपेयी : तो वो मुझको फॉर ग्रांटेड नहीं लेती। (नीलेश जोर से हँसते हैं)

उसको पता है कि ये किसान का बेटा है ये जानता है कि कौन सी ताज़ी सब्जी है, कौन सी नहीं है और कौन सी शीतगृह (कोल्ड स्टोरेज) में रखी हुई थी।

नीलेश मिसरा : (हँसकर) जी...वाह, बहुत सुन्दर! बहुत ही सुन्दर, तो इस तरह से आपने अपने आप को बचा के रखा।

मनोज बाजपेयी : हाँ, क्यूँकि आनंद भी आता है। नीलेश मैं आपको सच में बताऊँ, बड़ी मेहनत है यार। बड़ी मेहनत है नाटक (प्रिटेंड) करने में। इसका मुझे बहुत शुरू में ही एहसास हुआ था कि बड़ी मेहनत लगती है।

शायद ये भी वज़ह है कि मैं पार्टियों में नहीं जाता हूँ कि बड़ा प्रिटेंड करना पड़ता है। जरा सा इसमें थोड़ा आलसीपना भी आता है कि यार कपड़े तय (डिसाइड) करना मुझसे हो नहीं पाता है।




नीलेश मिसरा : मैं, बिल्कुल समझ सकता हूँ ये! बिल्कुल-बिल्कुल।

मनोज बाजपेयी : मुझे बड़ी कोफ़्त होती है और मेरा डिजाइनर मेरे पीछे पड़ा रहता है कि मनोज सर ऐसा मत कीजिये सर! प्लीज सर, डेनिम और शर्ट्स से भी बाहर निकलिये आप सर। (दोनों के ठहाके)

अब क्या करे वो! उसको पता नहीं किस के पास पड़ा हुआ है वो।

नीलेश मिसरा: एक... क्रियेटिव लोगों के साथ मेरा जो राइटिंग में, इस सबमें जो दख़ल रही, तो हमें लगता है कि हम थोड़ा विशेष अधिकार रखते हैं, अलग हैं, ख़ास हैं। हमें टमाटर लाने के लिये मत कहो। हालांकि आप अपवाद हैं, लग रहा है। ऐसा लगता है कभी कि दुनिया हमें अकेला छोड़ दे, अपनी चीजें करने दे हमें।

मनोज बाजपेयी : नहीं... नहीं! टमाटर लाने में सुख है, मुझे इंटरव्यू पर मत बुलाओ।

नीलेश मिसरा : (जोर के ठहाके के साथ) बहुत शुक्रिया कि आप आये।

मनोज बाजपेयी: मैं... आलू -टमाटर लेने बांद्रा तक चला जाऊँगा पर किसी फंक्शन पर मत बुलाओ मुझे। किसी जगह जो है स्पीकर की तरह मत बुलाओ। मैं अमूमन आपको बताऊँ कि ये सच बोल रहा हूँ... बहुत सारे लोग आपका ये प्रोग्राम देख रहे हैं, ये झूठ खुल जायेगा। मैं कतराता हूँ ये सम्मान समारोह, ये की नोट स्पीकर, यहाँ पर एड्रेस करना है, यहाँ पर ये ज्ञान बाँटना है, वहाँ पर वो ज्ञान बाँटना है।

मेरा... एक तो क्या है कि मैं अमूमन ज्यादा बोलने वाला नहीं हूँ, और मुझे ज्ञान बाँटने से नफ़रत है क्योंकि हर दो व्यक्ति की जीवन यात्रा अलग है। जिन बच्चों को मैं ज्ञान बाँटने जाने वाला हूँ तो मुझे पता है कि हर व्यक्ति अपने-अपने जीवन को अपने-अपने तरीके से सुलझाने वाला है, लड़ाई करने वाला है।

मेरे बोलने से चीजें कुछ आसान नहीं होने वालीं, है ना। सिवाय इसके कि मैं जाऊँगा तो कुछ एक को अच्छा लगेगा कि एक फिल्म का अभिनेता आया है। इसके अलावा कुछ होना वाला नहीं है इसलिए मैं भागता हूँ।

फंक्शन वगैरह से मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि भागता हूँ सबसे। जहाँ भी मुझे बहुत ज्यादा ही कुछ और बनकर होना पड़ता है तो बहुत दिक्कत होती है मुझे।

फिल्मों से ही हम लोग बहुत थक जाते हैं, अपने चरित्र (कैरेक्टर) निभाकर ही बड़े थक जाते हैं तो एक दूसरा मनोज बाजपेयी खड़ा करना बड़ा मुश्किल लगता है।

टमाटर, आलू से मुझे बिल्कुल नफ़रत नहीं है, वो मुझे लगता है कि... इनसे बाहर की दुनिया में लोगों से जुड़ाव रहता है मेरा! लेकिन इन सब जगहों से मेरा तालमेल बैठता नहीं है।





नीलेश मिसरा : मनोज जी, आप पर्दे पर इतने गम्भीर पात्र निभाते हैं। वैसे मुझे लगता है कि आप ख़ुद का मज़ाक उड़ाना और दुनिया का मज़ाक उड़ाना... कैसे?

मनोज बाजपेयी: हँसी मज़ाक उड़ाना, पहले मैं बड़ा गंभीर रहा करता था, सच में कहूँ तो। वैसे भी मैं एक अंतर्मुखी आदमी हूँ। लोगों के बीच में हँसी-मज़ाक करना आ चुका है मुझे। खुलना जिसे कहते हैं। क्योंकि मुम्बई शहर में जब आप आये थे तो पहले तो बात ही नहीं निकलती थी मुँह से कि भई हम कौन हैं! हमारी काबिलियत क्या है, और हम करना क्या चाहते हैं?

और ये शहर ऐसा है, शहर तो छोड़ दीजिये, सारे शहर ऐसे ही होते हैं... अपेक्षक (डिमांडिंग) होते हैं और आपको प्रतियोगिता के दौर में धकेलते हैं, मुम्बई उससे अलग नहीं है। लेकिन हमारी फिल्म इंडस्ट्री में बहुत बाद में पता चला मुझे कि भाई ये इंडस्ट्री है, और जब आप मुम्बई सेंट्रल पर उतरे हैं तो आप अपने आप को बेचने आये हैं।

नीलेश मिसरा: (हँसते हुये) हाँ ! जी, बिल्कुल-बिल्कुल।

मनोज बाजपेयी : भई सीधी बात है कि आप अपनी कला बेचने आये हैं, या मनोरंजन बेचने आये हैं, कुछ तो आप बेचने के ही लिये यहाँ आये हैं। नहीं तो रंगमंच तो सही ही था।

तो... वहाँ जो मुझे ज्ञान प्राप्ति हुई तो मैंने अपने ऊपर काम करना शुरू किया। जहाँ पर सबसे पहले आप ख़ुद का मज़ाक उड़ाना सीखिये और खुल के बोलना सीखिये आप।

आपने सही कहा, मैं अपना मज़ाक बहुत उड़ाता हूँ। और अपने दोस्तों का भी मज़ाक उड़ाता हूँ।

कई दोस्त मेरे गंभीर भी होते हैं, बेसिकली बेचारे बाद में समझ जाते हैं कि ये मैं ना सिर्फ़ उनको हल्का करने के लिये करता हूँ। अपने आपको गंभीरता से न लेने का जो एक प्रयत्न ये भी है कि आप हँसी मज़ाक करते रहिये।

नीलेश मिसरा : जी... आप ख़ुद को बहुत संजीदा तौर पर नहीं ले रहे हैं।

मनोज बाजपेयी : यह अत्यंत आवश्यक है, ख़ासतौर पर आज हम जिस समय और उम्र में रह रहे हैं। यह बहुत जरूरी है।

नीलेश मिसरा : तो अगर आप किसी और को बताते हैं, अपना मज़ाक उड़ाते हैं तो... कौन है मनोज बाजपेयी?

मनोज बाजपेयी : मनोज बाजपेयी, ये बड़ा अच्छा सवाल किया आपने कि कौन है मनोज बाजपेयी?

मनोज बाजपेयी एक बहुत ही अंतर्मुखी, और जो जीवन-मृत्यु के रहस्य को समझने में आज भी लगा हुआ है।

नीलेश मिसरा : अच्छा

मनोज बाजपेयी : बड़ा अजीब लगेगा आपको सुनकर के, ये जो है मेरी ख़ोज शुरू हुई थी बचपन से और वो आज तक चल रही है। ये जीवन-मृत्यु का चक्र क्या है? और जब मैं किसी से कोई बात करता हूँ, तो ऐसा कोई नहीं कि भारी बात कर रहा हूँ। ये सवाल, ख़ोज़ मेरे अंदर में आठ साल की उम्र में भी था, जब मैंने पहली बार अपनी चाची को मरते, पहली बार जब किसी को मरते हुये देखा!





नीलेश मिसरा : क्या था सवाल?

मनोज बाजपेयी : पहली बार किसी को मरते हुये देखा, किसी की मृत्यु देखी और जो मैं हिला, उसके बाद से जो खोज़ शुरू हुई मेरे अंतर में कि ये जीवन-मृत्यु आखिर हैं क्या? अगर जीवन के बाद मृत्यु ही है, तो फिर जीवन क्यूँ है?

तो ये मनोज बाजपेयी वही है। मनोज बाजपेयी मूल रूप से मुम्बई जैसे बड़े शहर में रहते हुए, भगवान की दया से एक अच्छी खासी प्रसिद्धि देखते हुए भी... एक गाँव का लड़का है जो गाँव जाने के लिये हर हफ़्ते सोचता रहता है।

नीलेश मिसरा : (आश्चर्य से) अच्छा! ये सच... ये सच में।

मनोज बाजपेयी : जी...! आपसे कोई प्रभाव डालने के लिये बातें तो गाँव कनेक्शन के लिये मैं नहीं करूँगा।

नीलेश मिसरा: बिल्कुल... जी ! वाह वाह वाह वाह वाह

मनोज बाजपेयी : मेरी पत्नी कहती हैं कि तुम हमेशा कहते हो कि तुम्हारी शादी नहीं हुई होती तो तुम चले जाते या बच्चा नहीं हुआ होता तो तुम चले जाते! तुम कभी नहीं जाते! तुम वो फँसे हुये आदमी हो अपनी महत्वाकांक्षा और अपने गाँव के बीच में, शायद वो सच है।

नीलेश मिसरा : वाह ! बहुत अच्छा लगा कि ऐसे बहुत कम लोग हैं जो कि अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। और आप वो विडम्बना भी समझ रहे हैं... कि एक ओर महत्वाकांक्षा और...

मनोज बाजपेयी: जी क्या करें? मेरे अपने जो एक आध्यात्मिक टीचर हैं, आध्यात्मिक गुरु हैं, जो कहते हैं कि तुम्हारा उद्देश्य जो है वो और ही है, मुझे नहीं पता कि क्या है, ना वो बताते हैं। आज तक तो मुझे लगता रहा कि अभिनय मेरा उद्देश्य है?

लेकिन शायद उद्देश्य कुछ बड़ा भौतिक है। शायद उद्देश्य कुछ और है, वो मुझे आगे की उम्र में पता चलेगा शायद। शायद जैसे क्राइस्ट को एक लाइट आई थी, वैसे मुझे भी आये... लेकिन मूलतः क्या है कि जैसा कि आपने पूछा, वो कौन है? तो... जो उसकी सतत् तलाश में है,वही मनोज बाजपेयी है। और महत्वाकांक्षा और जड़ के बीच में फंसा एक व्यक्ति मनोज बाजपेयी है।

नीलेश मिसरा: वाह... वाह। मैं बताऊँ, जब मैंने अपनी रेडियो की यात्रा शुरू की और बाकी चीजें करने लगा तो मुझे एक पल याद है कि मैं जब कोटा में था मैं, ग्रीन रूम में और मैं लाइव स्टोरी टेलिंग भी करता हूँ, और बाहर हॉल खचाखच भरा था, वो मेरा नाम पुकार रहे थे और मैं ग्रीन रूम में सुन रहा था।

वो बहुत शानदार था, बहुत बढ़िया और मुझे नहीं पता था कि इस वज़नी खुशी को किस तरह संभालूँ... क्योंकि मैं भी अंतर्मुखी ही रहा हूँ, मतलब मुझे कोई डर नहीं है स्टेज पर जाने में।

लेकिन जहाँ हॉल में मेरी बात हो रही हो तो मैं कोनै में बैठकर सुनना चाहूँगा मैं बीच में नहीं आऊँगा। और ऐसा भी कि पहचाना जाना, पब्लिक के बीच में न बैठ पाना... ये उसके साथ ही होता है। एक कीमत भी चुकानी पडती है,ऐसे। तो अब कैसे संभालते हैं आप इस चिरपरिचित पहचान को।

मनोज बाजपेयी : (धीमे हँसते हुए) इसमें देखिये बड़ा विरोधाभास है, लगातार मैं देखता रहता हूँ अपने आप को।

और मेरे जो एक आध मित्र हैं... ज्यादा मित्र नहीं हैं, वो भी बोलते हैं मुझे और मेरी बेटी भी। जैसे मेरी बेटी ने मेरा ध्यान उस तरफ खींचा या कहूँ जताना शुरू किया कि पापा सेल्फी क्यूँ नहीं दिया तुमने उसको?

नीलेश सेल्फी से मुझे थोड़ी नफ़रत है, इसमें दूसरा आदमी मेरे बहुत करीब आता है जो कि मुझे पसन्द नहीं है।

नीलेश मिसरा : सही है

मनोज बाजपेयी : और वो मेरा व्यक्तित्व है कि इतना ज्यादा अंतरंगता मुझे अनजान आदमी के साथ पसन्द नहीं है।

नीलेश मिसरा: एक निर्मलता है, अपना स्थान है।

मनोज बाजपेयी : कभी किसी को दे भी देता हूँ, तो मेरी बेटी ने मुझे बोलना शुरू किया- पापा, अच्छा! क्या वो अच्छा आदमी था?

मैंने कहा क्यों ?

आपने सेल्फी खिंचवाई।

मैंने कहा... हाँ वो अच्छा इंसान था, उसने सेल्फी को पूछा तो उसे दे दिया मैंने।

एक दो बार उसने बोला - पापा क्या वो अच्छा नहीं था।

मैंने कहा... क्यों, जबकि मैं तो उसे जानता तक नहीं।

आपने उसे सेल्फी नहीं दी।

तो मैंने सोचा कि यार एक बच्ची के लिये ये संदेश जा रहा है, कि जिसे मैं पसंद करता हूँ, उसी के साथ सेल्फी खिंचवाता हूँ, और जिसे पसंद नहीं करता हूँ, उसको सेल्फी नहीं खिंचवा रहा हूँ, तो शायद कहीं न कहीं मुझे थोड़ा अपने आप को सुधारना पड़ेगा, तो थोड़ा उस पर काम कर रहा हूँ। चूँकि मैं इस संस्कृति का नहीं हूँ, तो जो लोग सुन रहे होंगे जिनको मैंने सेल्फी नहीं दिया तो कृपया मुझे माफ़ कर दीजिये।

मैं थोड़ा असुविधाजनक हो जाता हूँ, ज्यादातर समय में।

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(प्रस्तुति : प्रीति राघव)


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