नौटंकी : कभी नगाड़ों की थाप के बीच जोकर पर लगते थे ठहाके, अब लड़कियों के डांस पर बजती हैं सीटियां

Arvind ShuklaArvind Shukla   28 Feb 2019 7:21 AM GMT

गांव कनेक्शन मनोरंजन सेक्शन में आज हम आपको उस लोककला से रूबरू कराएंगे जो कभी देसी मनोरंजन का एक मात्र जरिया हुआ करती थी। नौटंकी, जी हां वहीं नौटंकी, जिसके मंच पर बजते नगाड़े लोगों को एक अलग ही दुनिया में ले जाते थे। नौटंकी में मनोरंजन तो आज भी होता है लेकिन स्टाइल चेंज हो गया है। कभी जोकर के कपड़ों पर ठहाके लगते तो आज डांसर के डांस पर सीटियां बजती हैं।

कुछ समय पहले गांव कनेक्शन की टीम जब नौटंकी को समझने निकलती तो लखनऊ से करीब 250 किलोमीटर दूर कानपुर के एक गांव में महफिल सज चुकी थी, दूर से नगाड़ों का आवाज़ आ रही थी। नौटंकी यानि लोकनृत्य और नाटक शैली की वो कला जो स्वांग से मिलती जुलती है। प्रेम और वीर रस पर आधारित नौटंकी में हास्य और व्यंग का पूरा मसाला होता है। नगाडों की आवाज सुनकर आसपास के कई गांवों के लोग नया इस गांव पहुंचे थे। आसपास के लोगों ने बताया ये नौटंकी बहुत खास हैं क्योंकि यहां कानपुर से रंपत की कंपनी को बुलाया गया है। कहते हैं नौटंकी की दुनिया में रंपत सिंह भदौरिया के नाम का डंका बजता है। रंपत जब अपनी सहयोगी रानीबाला के साथ मंच पर जुगलबंदी करते हैं तो महफिल में सिर्फ तालियों और सीटियों की आवाज ही गूंजती है।

नौंटकी की दुनिया में बजता है रंपत के नाम का डंका, खुद उनकी कहानी है फिल्मी

32 साल से लोगों का मनोरंजन कर रहे रंपत नौटंकी को फिल्मों की जननी बताते हैं। उनका कहना है जब फिल्में नहीं बनती थी तो लोग नौटंकी से मनोरंजन करते थे। शौकिया तौर पर नौटंकी से जुड़े रंपत की खुद की जिदंगी भी किसी नौटंकी की किसी कहानी से कम नहीं है।

सिंचाई विभाग में सरकारी नौकरी छोड़कर रंपत ने नौटंकी से रिश्ता जोड़ा तो नाराज घरवालों ने नाता तोड़ लिया। हालांकि उन्हें जिंदगी का सबसे हसीन तोहफा भी यहीं मिला। रंपत कहते हैं कृष्णाबाई की नौटंकी में काम करते हुए रानीबाला से मुलाकात हुई। और मंच की सहयोगी को उन्होंने जीवनसाथी बना लिया। दोनों ने मिलकर अपनी नौटंकी कंपनी खोली और खूब नाम कमाया, लेकिन एक कसक जो चेहरे पर साफ दिखती है कि नौटंकी में अब वो बात नहीं रही।

देखिए रंपत की नौटंकी का लाइव वीडियो

रंपत बताते हैं, "पहले किरदार बोलते थे लेकिन अब ड्रामा करना पड़ता है, ड्रांसर बुलानी पड़ती हैं वर्ना भीड़ न रुके।" रंपत की जीवनसाथी रानीबाला भी खुलकर मानती हैं कि नौटंकी बदल चुकी है। और खेल यानी नाटक और गायन कम जबकि कमेडी और फिल्मी संगीत ज्यादा हो गया है। रानीबाला कहती है वो आज भी ज्यादा से ज्यादा खेल दिखाना चाहती है लेकिन लोग डांस के दीवाने हैं। और लोगों की डिमांड पूरी करना उनकी मजबूरी।

रंपत सिंह भदौरिया

रानीबाला बताती हैं, "पहले भी नृत्य होता था लेकिन तब लड़कियां खुद गाती थीं और उस पर नृत्य करती थीं, लेकिन अब तो जमाना बदल गया है, अब सीडी और पेन ड्राइव में गाने लगाए जाते हैं और ड्रांस होता है।'

रंपत और रानीबाला की नौटंकी का बदला रूप नजर भी आता है। मंच पर डांस कर रही है लड़कियों को देखने के लिए भीड रातभर बैठी रहती है। औऱ फिल्मों के मशहूर गानों पर डांस का सिलसिला भी बदस्तूर जारी रहता है। रंपत बताते हैं भीड़ को रोके रखने के लिए वो हर 15-20 मिनट में एक फिल्मी गाने पर डांस तो जरूरी हो गया है। खासकर भोजपुरी गाने तो फिल्मों में आइटम नंबर की तरह जरूरी ही हो गए हैं।

भोजपुरी गाने नौटंकी में करते हैं आइटम नंबर का काम

नौटंकी का एक और पहलू परदे के पीछे बने टेंट के इस कमरे में दिखता है। मोहिनी, दिव्या और सानिया समेत रंपत की कंपनी में आधा दर्जन से ज्यादा महिलाएं हैं। इनमें से अधिकांश सिर्फ डांस करती हैं। इस कंपनी में सबसे कम उम्र की दिव्या स्कूल जाती है तो मोहिनी प्राइवेट पढ़ाई पूरी कर रही है। इन सबको को पता है डांस के नाम पर लटके-झटके सिर्फ भीड़ के लिए हैं। 4 साल ये नौटंकी में काम कर रही है सानिया साफ कहती हैं ये काम वो मजबूरी में कर रही हैं।

नौटंकी के गिरते स्तर और बंद होती कंपनियां का जिक्र आते ही अपनी कमेडी से सबको लोट-पोट कर देने वाले रंपत काफी गंभीर हो जाते हैं। उनका कहना है अब लोगों को राजा हरीशचंद, डाकू सुल्ताना और लैला-मंजनू जैसे नाटक नहीं सिर्फ डांस ही चाहिए। ऐसे में जो सच्चे कलाकार थे उनकी कंपनियां बंद होती जा रही हैं। इस लोककला को बचाने के लिए सरकार से मदद की आस लगाए रंपत ने खुद को नए रंग में रंगना शुरू कर दिया है। आज कल वो मंच से ज्यादा सीडी में नजर आते है। हाल ही में उनकी एक फिल्म भी रिलीज हुई हैं। बहरहाल पर्दे के पीछे बैठे इन कलाकरों की सबकी अपनी कहानी है। जिसका कथानक मंच के सामने बैठी भीड़ की डिमांड पर लिखा जा रहा है। - गाँव कनेक्शन टीवी की रिपोर्ट

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