धार्मिक मान्यता और संस्कृति को बरकरार रखती हैं यात्राएं

धार्मिक मान्यता और संस्कृति को बरकरार रखती हैं यात्राएंप्रदेश में कई ऐसे तीर्थ स्थल हैं, जिनकी अलग-अलग पौराणिक मान्यताएं हैं 

नीतू सिंह/दीपांशू मिश्रा स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। प्रदेश में कई ऐसे तीर्थ स्थल हैं, जिनकी अलग-अलग पौराणिक मान्यताएं हैं, ऐसा ही एक तीर्थ स्थल है, राजधानी लखनऊ से 45 किमी. दूर सीतापुर का नैमिषारण्य, जहां पर इस समय 84 कोसी यात्रा चल रही है।

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फाल्गुन मास की प्रतिपदा से शुरू होने वाली नैमिष की 84 कोसी परिक्रमा सोमवार (27 फरवरी) से शुरू हो गई है। 15 दिवसीय इस परिक्रमा का समापन पूर्णिमा (12 मार्च) को मिश्रिख में दधीचि आश्रम पर होगा। इस परिक्रमा में कुल 11 पड़ाव आते हैं जिनमें सात सीतापुर में तथा चार हरदोई जिले में हैं। सीतापुर और हरदोई में परिक्रमा के 11 पड़ाव हैं।

आते हैं देश भर से श्रद्धालु

नैमिषारण्य के पौराणिक चक्रकुंड में डुबकी लगाने के बाद परिक्रमार्थी कुंड के तट पर स्थित मंदिर में भगवान गणेश को लड्डू का भोग अर्पित कर तड़के परिक्रमा का शुभारंभ करते हैं। पहले पड़ाव के रूप में यह श्रद्धालु 27 फरवरी की रात कोरौना में विश्राम करते हैं। इस परिक्रमा में प्रति वर्ष लाखों की संख्या में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, दिल्ली और कर्नाटक प्रांतों के संत, महंत और पीठाधीश्वरों समेत लाखों की संख्या में गृहस्थ श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता है। नैमिष के पुजारी महंत दीनानाथ बताते हैं, “साल भर लोग इस पर्व की प्रतीक्षा करते हैं, देश ही नहीं विदेशों से भी लोग यहां पर आते हैं।

यहां के बारे में मान्यता है कि अगर कोई चक्र कुंड में स्नान करता है तो उसे 84 योनियों से मुक्ति मिल जाती है।” इसके अलावा इस परिक्रमा में बड़ी संख्या में नेपाल और मॉरीशस के श्रद्धालु शामिल होते हैं। परिक्रमा के दौरान अधिकांश परिक्रमार्थी 252 किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय करते हैं।

इसके अलावा कई परिक्रमार्थी वाहनों से तो तमाम संत और महंत, हाथी, घोड़ा व पीनस (पालकी) से इसे पूरा करते हैं।

पौराणिक मान्यता

चौरासी कोसी परिक्रमा समिति के अध्यक्ष एवं पहला आश्रम के महंत भरत दास (डंका वाले बाबा) का कहना है कि हिंदू धर्म में इस प्रकार की 15 दिनी परिक्रमा का स्कंद पुराण के अलावा अन्य कहीं उल्लेख नहीं है। यह परिक्रमा मानव के समस्त पापों को नष्ट कर चौरासी लाख योनियों से मुक्ति देती है। स्कंद पुराण के अनुसार यह परिक्रमा सबसे पहले भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने की थी। स्कंदपुराण के धर्मारण्य खंड में इस बात का वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने भी अयोध्यावासियों के साथ यह परिक्रमा की थी।

तीर्थों के होंगे दर्शन

परिक्रमा के दौरान श्रद्धालुओं को जानकी कुंड, कुमनेश्वर, कुर्कुरी, मानसरोवर, कोटीश्वर, महादेव, कैलाशन, हत्या हरण, नर्मदेश्वर, दस कन्या, जगन्नाथ, गंगासागर, कपिल मुनी, नागालय, नीलगंगा, श्रृंगी ऋषि, द्रोणाचार्य पर्वत, चंदन तालाब, मधुवसनक, व्यास गद्दी, मनु सतरूपा तपस्थली, ब्रम्हावर्त, दशाश्वमेघ, हनुमान गढ़ी, यज्ञवाराह कूप, हंस-हंसिनी, देव-देवेश्वर, रुद्रावर्त आदि तीर्थ स्थलों का दर्शन करने का सौभाग्य मिलता है।

मोक्ष व स्वर्ग प्राप्त करता है पंचकोसी परिक्रमा

पौराणिक आख्यानकों के अनुसार जो व्यक्ति संपूर्ण परिक्रमा न कर सके वह यदि मिश्रित तीर्थ में पांच दिनों तक पंचकोसी परिक्रमा करेगा तो उसे पुण्य का लाभ मिलेगा। ललिता देवी मंदिर के प्रधान पुजारी एवं कालीपीठ के संस्थापक जगदंबा पुजारी ने बताया कि एक पौराणिक आख्यानक के अनुसार महर्षि दधीचि के अस्थिदान में आए सभी देवों एवं तीर्थगणों ने चक्र गिरे स्थान से चौरासी कोस की परिधि में अपना विश्राम स्थल बनाया था। भगवान श्रीराम के अश्वमेघ यज्ञ के समय यही चौरासी कोसी परिक्रमा यज्ञ की सफलता हेतु की गई थी।

कब होती है यात्रा

ज्यादातर यात्राएं चैत्र, बैसाख मास में ही होती हैं चतुर्मास या पुरुषोत्तम मास में नहीं। कुछ विद्वान मानते हैं कि परिक्रमा यात्रा साल में एक बार चैत्र पूर्णिमा से बैसाख पूर्णिमा तक ही निकाली जाती है। कुछ लोग आश्विन माह में विजया दशमी के पश्चात शरद काल में परिक्रमा आरम्भ करते हैं।

कहां-कहां होती परिक्रमा

चौरासी कोसी परिक्रमा पूरी तरह से संतों और भक्तों द्वारा संचालित धार्मिक व परम्परागत है। इस परिक्रमा को किसी विशेष समय और स्थान पर लोग करते हैं जैसे- ब्रज क्षेत्र में गोवर्धन, अयोध्या में सरयू, चित्रकूट में कामदगिरि व दक्षिण भारत में तिरुवन्मलई की परिक्रमा यात्रा है। उज्जैन में चौरासी महादेव की यात्रा का आयोजन किया जाता है।

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