समर्पण भाव का प्रतीक है मोहिनीअट्टम नृत्य 

समर्पण भाव का प्रतीक  है मोहिनीअट्टम नृत्य ये केरल की महिलाओं का अर्ध शास्त्रीय नृत्य है जो कथकली से अधिक पुराना माना जाता है।

लखनऊ। ये केरल की महिलाओं का अर्ध शास्त्रीय नृत्य है जो कथकली से अधिक पुराना माना जाता है। यह केरल के मंदिरों में किया जाता था। इसे देवदासी नृत्य विरासत का उत्तराधिकारी भी माना जाता है जैसे कि भरतनाट्यम, कुचीपुड़ी और ओडिसी। इस शब्द मोहिनी का अर्थ है एक ऐसी महिला जो देखने वालों का मन मोह ले या उनमें इच्छा उत्पन्न करें।

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वेश-भूषा

सोने की जरदोजी के काम वाले सफेद या हाथी दांत के रंग वाले सादे और सुंदर पोशाक केरल की महिलाओं के पारंपरिक पोशाक से मेल खाते हैं। इसमें पूरा श्रृंगार किया जाता है।

इतिहास

मोहिनीअट्टम मूल रूप से हिन्दू पौराणिक कथा पर आधारित है। यह भगवान विष्णु की एक जानी मानी कहानी है कि जब उन्होंने दुग्ध सागर के मंथन के दौरान लोगों को आकर्षित करने के लिए मोहिनी का रूप धारण करके नृत्य किया था। इस नृत्य का उल्लेख 934 ई के नेदुमपुरा तली शिलालेखों में मिलता है। उन्नीसवीं सदी के एक कवि राजा स्वाति तिरुनल के दरबार में दो नृत्य गुरुओं और भाइयों सिवानन्द और वाडिवेलु को शाही संरक्षण प्राप्त हुआ, और उन्होंने भरत नाट्यम के समान मोहिनीअट्टम के एकल प्रदर्शन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भरतनाट्यम की तरह ही होता है ये नृत्य

मोहिनीअटट्म नृत्य प्रेम व भगवान के प्रति समर्पण का प्रतीक है। विष्णु या कृष्ण इसमें अधिकांशत: नायक होते हैं। नृत्यांगना धीमी और मध्यम गति में अभिनय के लिए पर्याप्त स्थान बनाने में सक्षम होती है और भाव प्रकट करती है।

इस रूप में यह नृत्य भरतनाट्यम के समान लगता है। यह अनिवार्यत: एकल नृत्य है किन्तु वर्तमान समय में इसे समूहों में भी किया जाता है।

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