प्रकृति और रिश्तों को जोड़ते हैं छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य

Divendra SinghDivendra Singh   15 April 2019 1:04 PM GMT

प्रकृति और रिश्तों को जोड़ते हैं छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य

रायपुर (छत्तीसगढ़)। अपने नदी, जंगल, पहाड़ के लिए मशहूर छत्तीसगढ़ अपनी लोक कलाओं के लिए जाना जाता है। यहां के शादी-विवाह, फसल बुवाई, कटाई सब उत्सव ही होता है और सभी के लिए अलग नृत्य भी होते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के महंत घासीराम स्मारक संग्रहालय में प्रदेश के सभी लोक नृत्य को दिखाया गया है।

मड़िया (गौर) नृत्य

ये नृत्य बस्तर के आदिवासियों द्वारा किया जाता है। 'गौर' या 'गंवर' नृत्य करते समय माड़िया पुरुष नर्तक अपने सिर पर गौर का सींग युक्त शिरोभूषण धारण करते हैं। इसी कारण से यह नृत्य गौर नृत्य कहलाता है। अविवाहित माड़िया युवक-युवतियां इसमें भाग लेते हैं। गौर को माड़िया बोली में माओ या पेटमा कहा जाता है, बांस की खपचियों के आड़े-तिरछे अवस्था में गौर सिंग को बांधा जाता है। कौड़ियों की लटें निकाल कर इसका सौंदर्य बढ़ाया जाता है। मुख्य रूप से वैवाहिक समारोहों में यह गौर नृत्य किया जाता है।



शैला नृत्य

शैला, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में आदिवासियों के मध्य एक लोकप्रिय नृत्य है। इस नृत्य में पूरे गांव के युवक सम्मिलित हो सकते हैं। इसकी तैयारी भी 'करमा' की तरह एक माह पूर्व से ही आरम्भ जाती है। युवक आदिवासी पोषक में मोरपंख कमर में बांध कर वृत्त या अर्धवृत्त बनाकर नाचते हैं। हर युवक के हाथ में दो-दो फुट का डंडा होता है जिसे लेकर वे नाचते हुए ही आगे -पीछे होते रहते हैं। घुँघरू बांधकर मादल लेकर बजाते हुए बीच-बीच में 'कू-कू ' या 'हूं-हूं' की आवाज़ करते हैं जिसे 'छेरवा' कहा जाता है। होली, दीपावली, दशहरा, अनंत चतुर्दशी, शिवरात्रि के अवसर पर यह नृत्य किया जाता है।


ककसार नृत्य

ककसार नृत्य छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर ज़िले की अभुजमरिया जनजाति द्वारा किया जाने वाला एक सुप्रसिद्ध नृत्य है। यह नृत्य फ़सल और वर्षा के देवता 'ककसार' की पूजा के उपरान्त किया जाता है। ककसार नृत्य के साथ संगीत और घुंघरुओं की मधुर ध्वनि से एक रोमांचक वातावरण उत्पन्न होता है। इस नृत्य के माध्यम से युवक और युवतियों को अपना जीवनसाथी ढूंढने का अवसर प्राप्त होता है।


सुआ नृत्य

सुआ नृत्य छत्तीसगढ़ राज्य की स्त्रियों का एक प्रमुख है, जो कि समूह में किया जाता है। स्त्री मन की भावना, उनके सुख-दुख की अभिव्यक्ति और उनके अंगों का लावण्य 'सुवा नृत्य' या 'सुवना' में देखने को मिलता है। 'सुआ नृत्य' का आरंभ दीपावली के दिन से ही हो जाता है। इसके बाद यह नृत्य अगहन मास तक चलता है।

वृत्ताकार रूप में किया जाने वाला यह नृत्य एक लड़की, जो 'सुग्गी' कहलाती है, धान से भरी टोकरी में मिट्टी का सुग्गा रखती है। कहीं-कहीं पर एक तथा कहीं-कहीं पर दो रखे जाते हैं। ये भगवान शिव और पार्वती के प्रतीक होते हैं। टोकरी में रखे सुवे को हरे रंग के नए कपड़े और धान की नई मंजरियों से सजाया जाता है। सुग्गी को घेरकर स्त्रियाँ ताली बजाकर नाचती हैं और साथ ही साथ गीत भी गाये जाते हैं। इन स्त्रियों के दो दल होते हैं। पहला दल जब खड़े होकर ताली बजाते हुए गीत गाता है, तब दूसरा दल अर्द्धवृत्त में झूककर ऐड़ी और अंगूठे की पारी उठाती और अगल-बगल तालियाँ बजाकर नाचतीं और गाती हैं।


गेड़ी (मुरिया) नृत्य

मुरिया नृत्य छत्तीसगढ़ राज्य में निवास करने वाली मुरिया जनजाति द्वारा किया जाता है। मुरिया लोगों के मुख्य पर्व और त्योहारों में नवाखनी, चाड़ जात्रा और सेशा आदि प्रमुख हैं। इन लोगों के कला रूपों में मुख्य रूप से गीत नृत्य शामिल हैं। प्रत्येक व्यक्ति नृत्य के साथ-साथ नृत्य गीत में भी पारंगत होता है। अधिकतर नृत्य गीत किसी न किसी रीति-रिवाज या मान्यताओं से जुड़े होते हैं।


पंडवानी नृत्य

पंडवानी छत्तीसगढ़ का वह एकल नाट्य है जिसका अर्थ है पांडववाणी - अर्थात पांडवकथा, यानी महाभारत की कथा। ये कथाएं छत्तीसगढ़ की परधान और देवार छत्तीसगढ़ की जातियों की गायन परंपरा है। परधान गोंड की एक उपजाति है और देवार धुमन्तू जाति है। इन दोनों जातियों की बोली, वाद्यों में अन्तर है। परधान जाति के कथा वाचक या वाचिका के हाथ में "किंकनी" होता है और देवारों के हाथों में र्रूंझू होता है।


जवारा नृत्य

चैत्र और शारदीय नवरात्रि में देवी को खुश करने के लिए जवार नृत्य किया जाता है। इसमें नवरात्रि के पहले दिन बोए जौ को नवरात्रि के आखिरी दिन सिर पर जौ रखकर परिक्रमा करके नृत्य किया जाता है।



करमा नृत्य

करम नृत्य, एक परम्परिक नृत्य है। एसे करमा पर्वके अवसर पर नाचा जता है। यह भादो, आश्विन, कार्तिक तक चलता है। यह इसके कई भेद हो जाते हैं। करम तैयारी के नृत्य जावा जगाने के करम स्वागत के काटने, लाने, गाड़ने तथा विजर्सन के अलग-अलग नृत्य गीत है। कोठा करम नृत्य में भी अधरतिया, भिनसरिया नृत्य होते हैं तो चाली करम के भी।

करम वृक्ष की टहनी को भूमि पर गाड़कर चारों ओर घूम-घूम कर, करमा नृत्य किया जाता है। करमा नृत्य में पंक्तिबद्धता ही करमा नृत्य का परिचायक है। स्त्री-पुरूष पंक्तिबद्ध होकर नाचते हैं और एक दूसरे का हाथ पकड़कर सीधी पंक्ति में अथवा अर्द्ध घेरे में आमने सामने अथवा दायें-बाँयें चलते हुए नाचते हैं। महिलाओं का दल अलग होता है और पुरूषों का दल अलग होता है। नाचने व गाने वालों की सँख्या निश्चित नहीं होती है कितने भी नर्तक इस नृत्य में शामिल हो सकते हैं बशर्ते नाचने के लिये पर्याप्त जगह हो।

करमा नृत्य में माँदर और टिमकी दो प्रमुख वाद्य होते हैं जो एक से अधिक तादाद में बजाये जाते हैं। वादक नाचने वालों के बीच में आकर वाद्य बजाते हैं और नाचते हैं। बजाने वालों का मुख हमेशा नाचने वालों की तरफ होता है। माँदर और टिमकी के अलावा कहीं-कहीं मंजीरा, झाँझ व बाँसुरी भी बजाये जाते हैं। किसी स्थान में नर्तक पैरों में घुँघरू भी पहनते हैं।



सरहुल नृत्य

यह उत्सव चैत्र महीने के तीसरे दिन चैत्र शुक्ल तृतीया पर मनाया जाता है। यह पर्व नये साल की शुरुआत का प्रतीक है। यह वार्षिक महोत्सव वसंत ऋतु के दौरान मनाया जाता है और पेड़ और प्रकृति के अन्य तत्वों की पूजा होती है, इस समय साल (शोरिया रोबस्टा) पेड़ों को अपनी शाखाओं पर नए फूल मिलते हैं।

सरहुल महोत्सव कई किंवदंतियों के अनुसार महाभारत से जुड़ा हुआ है। जब महाभारत युद्ध चल रहा था तो मुंडा जनजातीय लोगों ने कौरव सेना की मदद की और उन्होंने इसके लिए भी अपना जीवन बलिदान किया। लड़ाई में कई मुंडा सेनानियों पांडवों से लड़ते हुए मर गए थे इसलिए, उनकी शवों को पहचानने के लिए, उनके शरीर को साल वृक्षों के पत्तों और शाखाओं से ढका गया था। निकायों जो पत्तियों और शाखाओं के पेड़ों से ढंके हुए थे, सुरक्षित नहीं थे, जबकि अन्य शव, जो कि साल के पेड़ से नहीं आते थे, विकृत हो गए थे और कम समय के भीतर सड़ गया थे। इससे साल के पेड़ पर उनका विश्वास दर्शाया गया है जो सरहुल त्योहार से काफी मजबूत है।



माड़िया गौर नृत्य

गौर माड़िया नृत्य छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर ज़िले में गौर माड़िया जनजाति द्वारा किया जाता है। इस जनजाति का यह नृत्य बहुत ही हर्षोल्लास से परिपूर्ण, सजीव एवं सशक्त होता है। यह नृत्य प्राय: विवाह आदि के अवसरों पर किया जाता है। इस नृत्य का नामकरण गौर भैंस के नाम पर हुआ है।

नृत्य करने वाली नर्तकियाँ अपने साधारण सफ़ेद और लाल रंग के वस्त्र को सौन्दर्यमय बनाने के लिए अनेक प्रकार के आभूषणों को धारण करती है। एक आन्तरिक गोला बनाकर वे ज़मीन पर लय के साथ डंडे बजाती, पैर पटकती, झूमती, झुकती और घूमती हुई गोले में चक्कर लगाती रहती है। दूसरी ओर पुरुष नर्तक एक बड़ा बाहरी गोला बनाते हैं और तीव्र गति से अपने क़दम घुमाते और बदलते हुए जोर-जोर से ढोल पीटते हैं।


राउत नृत्य

राउत नाच या राउत-नृत्य, यादव समुदाय का दीपावली पर किया जाने वाला पारंपरिक नृत्य है। इस नृत्य में राउत लोग विशेष वेशभूषा पहनकर, हाथ में सजी हुई लाठी लेकर टोली में गाते और नाचते हुए निकलते हैं। गांव में प्रत्येक गृहस्वामी के घर में नृत्य के प्रदर्शन के पश्चात् उनकी समृद्धि की कामना युक्त पदावली गाकर आशीर्वाद देते हैं। टिमकी, मोहरी, दफड़ा, ढोलक, सिंगबाजा आदि इस नृत्य के मुख्य वाद्य हैं। नृत्य के बीच में दोहे गाये जाते हैं। ये दोहे भक्ति, नीति, हास्य और पौराणिक संदर्भों से युक्त होते हैं।


पंथी नृत्य

पंथी नृत्य छत्तीसगढ़ राज्य में बसे सतनामी समुदाय का प्रमुख नृत्य है। इस नृत्य से सम्बन्धित गीतों में मनुष्य जीवन की महत्ता के साथ आध्यात्मिक संदेश भी होता है, जिस पर निर्गुण भक्ति व दर्शन का गहरा प्रभाव है। कबीर, रैदास तथा दादू आदि संतों का वैराग्य-युक्त आध्यात्मिक संदेश भी इसमें पाया जाता है। पंथ से संबंधित होने के कारण अनुयायियों के द्वारा किए जाने वाले नृत्य पंथी नृत्य के रूप में प्रचलित हुए। साथ ही इस नृत्य में प्रयुक्त होने वाले गीतों को पंथी गीत के रूप में प्रतिष्ठा हासिल हुई।



डंडारी नृत्य

दंतेवाड़ा के मारजूम चिकपाल के धुरवा जनजाति के ग्रामीणों ने आज भी इस डंडारी नृत्य को आने वाली पीढ़ी के लिये सहेज कर रखा है। यह नृत्य बहुत हद तक गुजरात के मशहूर डांडिया नृत्य से मेल खाता है। इस नृत्य में बांसूरी की धुन पर नर्तक बांस की खपचियों को टकराकर जो थिरकते हैं। यह कोरकू जनजाति द्वारा किया जाता है। यह होली के अवसर पर किया जाता है।



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