अगर आप किसान है तो मशहूर कवि केदारनाथ सिंह की इन कविताओं को पढ़े, दिल छू लेंगी

अगर आप किसान है तो मशहूर कवि केदारनाथ सिंह की इन कविताओं को पढ़े, दिल छू लेंगीकवि डॉ. केदारनाथ सिंह।

नयी दिल्ली। केदारनाथ सिंह अपनी कविताओं में खेत खलिहान और किसानों के दर्द को भी बड़ी शिद्दत से अपनी लेखनी के जरिए उकेरते थे। उनकी कविता 'फसल' में किसान का दर्द, कविता 'दाने' में जहां दाना कहता है कि वो मण्डी नहीं जाएंगे और 'बुनाई गीत' जब आप पढ़ते हैं तो लगता है कि वो किसानों के करीब ही नहीं उन्होंने खेत-खलिहान और किसानी का जीवन जिया है और उस जीवन को ही मोती जैसे अक्षरों में पिरो दिया।

उनके प्रमुख कविता संग्रहों में अभी बिलकुल अभी', 'जमीन पक रही है', 'यहां से देखो', 'बाघ', 'अकाल में सारस' और 'उत्तर कबीर' शामिल हैं। आलोचना संग्रहों में 'कल्पना और छायावाद', 'मेरे समय के शब्द प्रमुख हैं। उनका अंतिम संस्कार आज दोपहर तीन बजे लोदी रोड शमशान घाट में किया जाएगा।

वर्ष 2013 में केदारनाथ सिंह की सेवाओं के लिए उन्हें साहित्य के सबसे बड़े सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें इसके अलावा साहित्य अकादमी पुरस्कार और व्यास सम्मान सहित कई सम्मानों से पुरस्कृत किया गया था।

हिंदी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह का जन्म वर्ष 1934 में क्रांतिकारियों की नगरी बागी बलिया के गांव चकिया (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। वह हिंदी कविता में नए बिंबों के प्रयोग के लिए जाने जाते हैं। केदारनाथ सिंह के परिवार में एक पुत्र और पांच पुत्रियां हैं। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि डॉ. केदारनाथ सिंह को करीब डेढ़ माह पहले कोलकाता में निमोनिया हो गया था। इसके बाद से वह बीमार चल रहे थे। पेट के संक्रमण के चलते उनका 19 मार्च की रात करीब पौने नौ बजे एम्स में निधन हो गया।

फसल ......

मैं उसे बरसों से जानता था

एक अधेड़ किसान

थोड़ा थका

थोड़ा झुका हुआ

किसी बोझ से नहीं

सिर्फ़ धरती के उस सहज गुरुत्वाकर्षं से

जिसे वह इतना प्यार करता था

वह मानता था--

दुनिया में कुत्ते बिल्लियाँ सूअर

सबकी जगह है

इसलिए नफ़रत नहीं करता था वह

कीचड़ काई या मल से

भेड़ें उसे अच्छी लगती थीं

ऊन ज़रूरी है--वह मानता था

पर कहता था--उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है

उनके थनों की गरमाहट

जिससे खेतों में ढेले

ज़िन्दा हो जाते हैं

उसकी एक छोटी-सी दुनिया थी

छोटे-छोटे सपनों

और ठीकरों से भरी हुई

उस दुनिया में पुरखे भी रहते थे

और वे भी जो अभी पैदा नहीं हुए

महुआ उसका मित्र था

आम उसका देवता

बाँस-बबूल थे स्वजन-परिजन

और हाँ, एक छोटी-सी सूखी

नदी भी थी उस दुनिया में-

जिसे देखकर-- कभी-कभी उसका मन होता था

उसे उठाकर रख ले कंधे पर

और ले जाए गंगा तक--

ताकि दोनों को फिर से जोड़ दे

पर गंगा के बारे में सोचकर

हो जाता था निहत्था!

इधर पिछले कुछ सालों से

जब गोल-गोल आलू

मिट्टी फ़ोड़कर झाँकने लगते थे जड़ों से

या फसल पककर

हो जाती थी तैयार

तो न जाने क्यों वह-- हो जाता था चुप

कई-कई दिनों तक

बस यहीं पहुँचकर अटक जाती थी उसकी गाड़ी

सूर्योदय और सूर्यास्त के

विशाल पहियोंवाली

पर कहते हैं--

उस दिन इतवार था

और उस दिन वह ख़ुश था

एक पड़ोसी के पास गया

और पूछ आया आलू का भाव-ताव

पत्नी से हँसते हुए पूछा--

पूजा में कैसा रहेगा सेंहुड़ का फूल?

गली में भूँकते हुए कुत्ते से कहा--

'ख़ुश रह चितकबरा,

ख़ुश रह!'

और निकल गया बाहर

किधर?

क्यों?

कहाँ जा रहा था वह--

अब मीडिया में इसी पर बहस है

उधर हुआ क्या

कि ज्यों ही वह पहुँचा मरखहिया मोड़

कहीं पीछे से एक भोंपू की आवाज़ आई

और कहते हैं-- क्योंकि देखा किसी ने नहीं--

उसे कुचलती चली गई

अब यह हत्या थी

या आत्महत्या--इसे आप पर छोड़ता हूँ

वह तो अब सड़क के किनारे

चकवड़ घास की पत्तियों के बीच पड़ा था

और उसके होंठों में दबी थी

एक हल्की-सी मुस्कान!

उस दिन वह ख़ुश था।

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दाने......

नहीं

हम मण्डी नहीं जाएंगे

खलिहान से उठते हुए

कहते हैं दाने॔

जाएंगे तो फिर लौटकर नहीं आएंगे

जाते-जाते

कहते जाते हैं दाने

अगर लौट कर आये भी

तो तुम हमे पहचान नहीं पाओगे

अपनी अन्तिम चिट्ठी में

लिख भेजते हैं दाने

इसके बाद महीनों तक

बस्ती में

कोई चिट्ठी नहीं आती। (रचनाकाल : 1984)

................................................

बुनाई का गीत ....

उठो सोये हुए धागों

उठो

उठो कि दर्जी की मशीन चलने लगी है

उठो कि धोबी पहुँच गया घाट पर

उठो कि नंगधड़ंग बच्चे

जा रहे हैं स्कूल

उठो मेरी सुबह के धागो

और मेरी शाम के धागों उठो

उठो कि ताना कहीं फँस रहा है

उठो कि भरनी में पड़ गई गाँठ

उठो कि नाव के पाल में

कुछ सूत कम पड़ रहे हैं

उठो

झाड़न में

मोजो में

टाट में

दरियों में दबे हुए धागो उठो

उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है

उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा

फिर से बुनना होगा

उठो मेरे टूटे हुए धागो

और मेरे उलझे हुए धागो उठो

उठो

कि बुनने का समय हो रहा है (रचनाकाल : 1982)

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