बॉलीवुड की मां ने 150 रुपए महीने से शुरू किया था फिल्मों में काम

बॉलीवुड की मां ने 150 रुपए महीने से शुरू किया था फिल्मों में कामनिरूपा रॉय

भारतीय सिनेमा में जब भी माँ के किरदार को सशक्त करने की बात आती है तो सबसे पहला नाम निरुपा रॉय का ही आता है, जिन्होंने अपनी बेमिसाल अभिनय से माँ के किरदार को हिन्दी सिनेमा में बुलन्दियों पर पहुँचाया। लेकिन बहुत कम लोग जानते होंगे कि बॉलीवुड की मां कही जाने वाली निरूपा राय ने फिल्मों में अपना सफर सिर्फ 150 रुपए प्रति महीने के वेतन से शुरू किया था।

निरुपा रॉय का जन्म 4 जनवरी, 1931 को गुजरात के बलसाड में एक गुजराती परिवार में हुआ था। जब वह मात्र 15 साल की ही थीं, उनका उनका विवाह मुंबई में कार्यरत राशनिंग विभाग के कर्मचारी कमल रॉय से हो गया। विवाह के बाद निरुपा रॉय भी मुंबई आ गईं। उन्हीं दिनों निर्माता-निर्देशक बीएम व्यास अपनी नई फ़िल्म 'रनकदेवी' के लिए नए चेहरों की तलाश कर रहे थे। उन्होंने अपनी फ़िल्म में कलाकारों की आवश्यकता के लिए अख़बार में विज्ञापन दिया। निरुपा रॉय के पति फ़िल्मों के बेहद शौकीन थे और अभिनेता बनने की इच्छा रखते थे।

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कमल रॉय अपनी पत्नी को लेकर बीएम व्यास से मिलने गए और अभिनेता बनने की पेशकश की, लेकिन बीएम व्यास ने कहा कि उनका व्यक्तित्व अभिनेता बनने के लायक़ नहीं है। लेकिन यदि वह चाहें तो उनकी पत्नी को फ़िल्म में अभिनेत्री के रूप में काम मिल सकता है। फ़िल्म 'रनकदेवी' में निरुपा रॉय 150 रुपये प्रति माह पर काम करने लगीं। किंतु कुछ समय बाद ही उन्हें भी इस फ़िल्म से अलग कर दिया गया। यह निरुपा रॉय के संघर्ष की शुरुआत थी।

निरुपा रॉय ने अपने सिने कैरियर की शुरुआत 1946 में प्रदर्शित गुजराती फ़िल्म 'गणसुंदरी' से की थी। वर्ष 1949 में प्रदर्शित फ़िल्म 'हमारी मंजिल' से उन्होंने हिन्दी फ़िल्म की ओर भी रुख़ किया। ओपी दत्ता के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म में उनके नायक की भूमिका प्रेम अदीब ने निभाई। उसी वर्ष उन्हें जयराज के साथ फ़िल्म 'ग़रीबी' में काम करने का मौका मिला। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद वह अभिनेत्री के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हुईं।

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वर्ष 1953 में प्रदर्शित फ़िल्म 'दो बीघा ज़मीन' निरुपा रॉय के सिने कैरियर के लिए मील का पत्थर साबित हुई। विमल रॉय के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म में वह एक किसान की पत्नी की भूमिका में दिखाई दीं। फ़िल्म में बलराज साहनी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। बेहतरीन अभिनय से सजी इस फ़िल्म में दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई। 1955 में 'फ़िल्मिस्तान स्टूडियो' के बैनर तले बनी फ़िल्म 'मुनीम जी' निरुपा रॉय की अहम फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म में उन्होंने देवानंद की माँ की भूमिका निभाई थी। फ़िल्म में अपने सशक्त अभिनय के लिए वह सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' से सम्मानित की गईं। लेकिन इसके बाद छह वर्ष तक उन्होंने माँ की भूमिका स्वीकार नहीं की।

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1961 में प्रदर्शित फ़िल्म 'छाया' में उन्होंने एक बार फिर माँ की भूमिका निभाई। इसमें उन्होंने आशा पारेख की माँ की भूमिका निभाई थीं। इस फ़िल्म में भी उनके जबरदस्त अभिनय को देखते हुए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। सन 1975 में प्रदर्शित फ़िल्म 'दीवार' निरुपा रॉय के कैरियर की महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों में शुमार की जाती है। यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म में उन्होंने अच्छाई और बुराई का प्रतिनिधित्व करने वाले शशि कपूर और अमिताभ बच्चन की माँ की भूमिका निभाई। फ़िल्म में उन्होंने अपने स्वाभाविक अभिनय से माँ के चरित्र को जीवंत कर दिया।

निरुपा रॉय ने अपने पांच दशक के लंबे सिने कैरियर में लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया। भारतीय हिन्दी सिनेमा में माँ के किरदार को जीवंत करने वाली इस महान अभिनेत्री की 13 अक्टूबर, 2004 को मौत हो गई। उन्हें आज भी बॉलीवुड की सबसे सर्वश्रेष्ठ माँ माना जाता है।

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