ठेठ ग्रामीण संस्कृति से रूबरू कराता गोंडा का पसका मेला

ठेठ ग्रामीण संस्कृति से रूबरू कराता गोंडा का पसका मेलागोंडा में पसका मेले का आयोजन शुरू हुआ।

हरि शुक्ला/शेफाली श्रीवास्तव

गोंडा/लखनऊ। शहरी संस्कृति में भले ही आनंद, जश्न और छुट्टियां बिताने के अलग-अलग मायने हैं लेकिन गाँव में आज भी मेला ही लोगों के मनोरंजन का साधन है। ये लोगों के दिलों को मिलाता है। एक मंच है जहां जनमानस जुटता है। यहां न कोई अमीर होता है न गरीब, लोगों के आपसी संवाद होते हैं। उत्तर भारत में कई ऐसे मेले हैं जो कई वर्षों से होते आ रहे हैं, जिनका अपना इतिहास है। इसी में उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले का पसका मेला भी आता है जिसका महत्व अधिक है लेकिन आधुनिकता और समय की भेंट चढ़ने लगा है। इसके बारे में बताते हैं इतिहासकार योगेश प्रवीन-

गोंडा मुख्यालय से करीब 36 किमी दूर स्थित सूकरखेत में हर साल पूस के महीने में पसका मेला लगता है। कृष्ण पक्ष से शुरू होकर पूरे माह तक चलता है। 11 जनवरी को यह मेला शुरू हुआ। गुरुवार को मुख्य स्नान शुरू हुआ जिसमें लाखों श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। यह मेला कई वजहों से विशेष महत्व रखता है।

पहला पक्ष- यह गोस्वामी तुलसीदास के गुरु नरहरिदास की तपोस्थली व तुलसीदास की जन्मस्थली मानी जाती है। तुलसीदास ने अपने एक सोरठे में अपने गुरु का नाम भी लिया है। यह रामचरितमानस के मंगलाचरण में ही है -

बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर।

इस स्थली का उल्लेख स्कंद पुराण में भी इस तरह उल्लिखित है।

दशकोटि सहस्त्राणि, दश कोटि शतानि च तीर्थानि सरयू नद्या, घर्घरोदक संगमे।

इसका भावार्थ यह है सरयू व घाघरा संगम तट पर हजारों तीर्थ विद्यमान हैं। इस स्थली पर लाखों लोग स्नान-दान कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।

दूसरा पक्ष- यह भगवान विष्णु के वाराह अवतार का मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने वाराह का रूप धारण कर हिरण्याक्ष नामक राक्षस का वध किया था इसलिए इस स्थल को सूकरखेत के नाम से जाना जाता है। यहां भगवान सूकर की प्रतिमा स्थापित की गई थी। भगवान विष्णु की मूर्ति आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी।

तीसरा पक्ष- यहां पर दो नदियों का संगम है घाघरा और सरयू। यह निर्जन स्थल है जहां लोगों का कम आना-जाना होता है। इतिहासविद् योगेश प्रवीन बताते हैं कि कहा जाता है कि जब नदियां निर्जन स्थान या गाँव के आस-पास रहती है तो वह साफ होती है। ऐसे में उस नदी में स्नान-दान करना ज्यादा पुण्य देता है।

मेला शुरू होने से पहले यहां सरयू नदी के संगम तट त्रिमुहानी घाट पर बड़ी संख्या में नागा, साधु-संतों व गृहस्थों ने फूस की कुटिया डालकर कल्पवास, तपस्या में लीन होकर अपना नाता परब्रह्म परमात्मा से जोड़ते हैं। यहां पर गोंडा, कर्नलगंज, फैजाबाद, बाराबंकी जिले के लोग आते हैं और सरयू में डुबकी लगाकर अपने को धन्य मानते हैं। मेले में हर तरह की दुकाने सजी है और खान-पान सहित घरेलू समान लोगखरीद रहे हैं। अलग-अलग स्थानों पर लोग भजन व कीर्तन कर रहे हैं। रामायण पाठ के साथ भंडारे का आयोजन भी शुरू हो गया है।

स्वास्थ्यवर्धक है कटि स्नान

नदी में शरीर के आधे हिस्से को पानी में डुबाकर नमन करने के अभ्यास को कटि स्नान कहते हैं। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि यह स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। योगेश प्रवीन के अनुसार, ‘एक जमाना था कि जब यातायात व संचार व्यवस्था इतनी मजबूत नहीं थी। तब लोग ज्यादा दूर नहीं जा पाते थे और पास की जगह में जाकर अपनी छुट्टियों व त्योहार का आनंद लेते थे।’

मेले में दिख रहा नया लुक

इस बार मेले की तरफ लोगों का ज्यादा ध्यान आकर्षित करने के लिए सर्कस, काला जादू, कठपुतली शो, मौत का कुंआ, झूला, बेबी शो, ट्वाय ट्रेन, एनीमल झूला, वाटर पार्क, मिक्की माउस व फैशन शो शोभा बढ़ा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर महिलाओं के श्रृंगार से लेकर चूड़ी कंगन और घरेलू सामान भी खूब बिक रहे हैं।

कवि सम्मेलन ने बढ़ाई रौनक

बुधवार को यहां कवि सम्मेलन भी हुआ जिसमें जमुना प्रसाद उपाध्याय, अषोक टाटाम्बरी, अवनींद्र मिश्र, सोमनाथ अनाड़ी, ताराचंदतन्हा, राम नरायण शुक्ल, प्रेम गांधी, याकूब अजम, एसबी सिंह झंझट, शिवाकांत विद्रोही, जमील आजमी, हनामान दूबे, केडी सिंह, डॉ, संत शरण त्रिपाठी, शिवपूजन शुक्ल, केके सिंह वगैरह ने हिस्सा लिया।

"This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org)."

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