गुट्टे का खेल : याद है कौन सा खेल है ये ?

Pooja Vrat GuptaPooja Vrat Gupta   8 Jan 2019 5:14 AM GMT

खेल जो कहीं खो गए ... सेगमेंट में आज हमारे साथ अपने बचपन के खेल की यादें ताज़ा कर रही हैं पूजा व्रत गुप्ता, जो एक लेखिका भी हैं।

गुट्टे का खेल

लाख के रंगबिरंगे खूबसूरत गुट्टे लेकर वो मेरे चबूतरे पर आ गयी थी । हम सब सहेलियां भी उन सुन्दर गुट्टों को हाथ में लेकर देखना चाहते थे , उनसे खेलना चाहते थे , लेकिन उसने तो साफ़ साफ कह दिया देख बहन ... इन गुट्टों से तो बस हम ही खेलेंगे , मेरी बुआ लायी हैं जयपुर से । मम्मी ने कहा है कि किसी को भी इनसे मत खिलाना । बहुत महँगे आये हैं ना ... वरना ख़राब हो जाएंगे। तो दिखा तो दे नेक , हम लोग खेलेंगे नहीं बस देखेंगे। हां तो दूर से ही देख ले ना , तूने गिरा दिए तो

.....हम्म ह्म्म ....

चल बहन गुट्टे खेलते हैं .... फोटो - पूजा व्रत गुप्ता।


ये मेरी एक याद है या यूं कहिये बचपन की ढेरों जिदों में से एक ये भी ज़िद थी। मुझे भी अब रंगबिरंगे गुट्टे चाहिए थे । बिल्कुल वैसे ही जैसे वो लेकर आई थी । शायद मेरी ही तरह ये ज़िद उस वक़्त मेरी कई सहेलियों की भी रही होगी । खासकर उनकी जो मेरे साथ चबूतरे पर बैठकर गुट्टे खेलती थीं ।ऐसा नहीं था कि अब तक जिन पत्थरों के छोटे टुकड़ों से हम खेलते थे वो महंगे नहीं थे । वो भी महंगे थे लेकिन उनकी कीमत पैसों से नहीं आंकी जा सकती थी , क्योंकि वो हम सब की मेहनत से बनाए हुए होते थे ।

अब आप सोचेंगे कि पांच पत्थरों को इक्कठा करने में काहे की मेहनत ? तो इसका अंदाजा सिर्फ वो लोग ही लगा सकते हैं, जिन्होंने चिलचिलाती दोपहरी मोहल्ले की उन गलियों में बने घरों को खोजने में बिताई है, जिनके यहां सफ़ेद मार्बल का काम हो रहा होता था या कहीं गली में पड़ी कंक्रीट के ढेर से पांच गोल और चिकने पत्थरों को बीनने का काम किया हो या फिर जिन्होंने नुकीले पत्थरों को दूसरों के चबूतरे पर बैठकर पानी की सहायता से चिकना और गोल किया हो। सिर्फ वही लोग इन पाँच पत्थरों की कीमत समझ सकते हैं।


लेकिन ज़रा सोचिए कोई आपका ही साथी बिना मेहनत किए खूबसूसत और रंग बिरंगे पत्थरों को आपके सामने उछाले तो ?? जलना लाज़मी था। हम सब के सब जलने लगे थे उससे , शायद मैं भी । घर आकर जीना ( सीढ़ियों ) के नीचे ईटों की दरार के बीच में से अब तक इकट्ठे किए सारे गुट्टे निकाल लाई। हाँ मैं अब उन्हें वहीं छुपाती थी , क्योंकि कई बार मुझे चबूतरे पर गुट्टा खेलते देख पापा ने मेरे सारे गुट्टे घर के पास वाली नाली में फेंक दिए थे। उस एक वक़्त मुझे अगर सबसे ज्यादा पापा की डांट पड़ती थी तो वो ' गुट्टा खेलने ' पर ही थी । खैर ...... मुट्ठी भर गुट्टे लाकर बुआ के आगे रख दिए ।
बुआ सुनो... वो जो तुम चादर पर रंग से गुड़िया बना रही हो न वो वाले रंग मेरे गुटटों पर भी लगा दो ... उसकी बुआ तो जयपुर से लायी है खूब सुन्दर गुट्टा ... लेकिन किसी को छूने तक नहीं दे रही है वो ... बहुत नखरे दिखा रही है ...मेरे भी गुट्टे रंग दो ...


शायद वो फैब्रिक पेंटिंग के रंग थे , जो कम से कम पत्थर के ऊपर तो बिल्कुल भी नहीं टिकने वाले थे। लेकिन फिर भी मेरी इच्छा घर में पूरी ना हो ये बचन में तो शायद ही हुआ हो। इसलिए मेरे गुटटों को भी रंगा गया। अब मेरी मुट्ठी में पांच अलग -अलग रंग के गुट्टे थे । अब इतराना स्वाभाविक था ।अरे ...आज तू अपने रंगबिरंगे वाले गुट्टे नहीं लायी ??


नहीं ... गिरकर टूट गया एक... अब चार का क्या करुँगी ...कोई नहीं ... मेरे तो पत्थर के हैं ...टूटेंगे भी नहीं ... और देख रंगबिरंगे भी हैं ।

चल बहन खेलते हैं ...

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अगर आपको भी अपने बचपन का ऐसा कोई खेल याद है, तो हमें बताइए [email protected] आईडी पर।

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