सआदत हसन मंटो : जो लेखक ही नहीं क्रांतिकारी भी थे

Divendra SinghDivendra Singh   11 May 2017 10:32 AM GMT

सआदत हसन मंटो : जो लेखक ही नहीं क्रांतिकारी भी थेमंटो

लखनऊ। मंटो का नाम सुनते ही उनकी लिखी किताबों के पन्ने जेहन में परत दर परत खुलने लगते हैं, जितना मंटो ने लिखा वैसे ही वो असल ज़िंदगी में भी थे, क्रांतिकारी स्वाभाव के। मंटो एक लेखक ही नहीं समाज को असली आइना दिखाने वाले क्रांतिकारी भी थे। जिस दौर में उन्होंने समाज की सच्चाइयों को कागज पर उतारा, शायद ही कोई लेखक होगा जो इस बारे में सोच पाता।

ऐसा नहीं था कि मंटो को आलोचकों की सुननी नहीं पड़ी, फिर भी मंटो लिखते रहे और समाज को आइना दिखाते रहे। सआदत हसन मंटो ने यूं तो कई तरह की कहानियां लिखी हैं लेकिन भारत पाकिस्तान बंटवारे पर लिखी उनकी कहानियों में कुछ अलग ही बात है। उस दौर पर लिखी उनकी कहानियां ऐसी हैं कि अगर कोई एक बार उन्हें पढ़ ले तो उसके मन में बंटवारे को लेकर कहीं कोई नफरत होगी तो यकीनन वो दया और दुख में बदल जाएगी।

प्रसिद्ध कहानीकार सआदत हसन मंटो का जन्म 11 मई 1912 को हुआ था, मंटो फ़िल्म और रेडियो पटकथा लेखक और पत्रकार भी थे। मंटो की कहानियों को आज भी उतने मन से लोग पढ़ते मिल जाएंगे। आंतोन चेखव के बाद मंटो ही थे जिन्होंने अपनी कहानियों के दम पर अपनी जगह बना ली। उन्होंने जीवन में कोई उपन्यास नहीं लिखा।

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मंटो ने एंट्रेंस तक की पढ़ाई अमृतसर के मुस्लिम हाईस्कूल में की थी। 1931 में उन्होंने हिंदू सभा कॉलेज में दाख़िला लिया। उन दिनों पूरे देश में और ख़ासतौर पर अमृतसर में आज़ादी का आंदोलन पूरे उभार पर था। जलियावाला बाग़ का नरसंहार 1919 में हो चुका था जब मंटो की उम्र कुल सात साल की थी, लेकिन उनके बाल मन पर उसकी गहरी छाप थी।

सात साल की उम्र में लिखी पहली कहानी

सआदत हसन के क्रांतिकारी दिमाग़ और अतिसंवेदनशील हृदय ने उन्हें मंटो बना दिया और तब जलियांवाला बाग़ की घटना से निकल कर कहानी 'तमाशा' आई। यह मंटो की पहली कहानी थी। क्रांतिकारी गतिविधियां बराबर चल रही थीं और गली-गली में 'इंक़लाब ज़िदाबाद' के नारे सुनाई पड़ते थे। दूसरे नौजवानों की तरह मंटो भी चाहते था कि जुलूसों और जलसों में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले और नारे लगाए, लेकिन पिता की सख़्ती के सामने वह मन मसोसकर रह जाता। आख़िरकार उनका यह रुझान अदब से मुख़ातिब हो गया। उन्होंने पहली रचना लिखी 'तमाशा', जिसमें जलियांवाला नरसंहार को एक सात साल के बच्चे की नज़र से देखा गया है। इसके बाद कुछ और रचनाएं भी उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों के असर में लिखी।

1932 में मंटो के पिता की मौत हो गई, भगत सिंह को उससे पहले फांसी हो गयी थी। मंटो ने अपने कमरे में पिता के फ़ोटो के नीचे भगत सिंह की मूर्ति रखी और कमरे के बाहर एक तख़्ती पर लिखा-“लाल कमरा।”

रूसी साहित्य से ली थी लिखने की प्रेरणा

मंटो का रुझान धीरे-धीरे रूसी साहित्य की ओर बढ़ने लगा। मंटो की मुलाक़ात इन्हीं दिनों अब्दुल बारी नाम के एक पत्रकार से हुई, जिसने उन्हें रूसी साहित्य के साथ-साथ फ़्रांसीसी साहित्य भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद मंटो ने विक्टर ह्यूगो, लॉर्ड लिटन, गोर्की, आंतोन चेखव, पुश्किन, ऑस्कर वाइल्ड, मोपासां आदि का अध्ययन किया।

अब्दुल बारी की प्रेरणा पर ही उन्होंने विक्टर ह्यूगो के एक ड्रामे "द लास्ट डेज़ ऑफ़ ए कंडेम्ड" का उर्दू में अनुवाद किया, जो “सरगुज़श्त-ए-असीर” शीर्षक से लाहौर से प्रकाशित हुआ। यह ड्रामा ह्यूगो ने मृत्युदंड के विरोध में लिखा था, जिसका अनुवाद करते हुए मंटो ने महसूस किया कि इसमें जो बात कही गई है वह उसके दिल के बहुत क़रीब है। अगर मंटो के कहानियों को ध्यान से पढ़ा जाए, तो यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि इस ड्रामे ने उसके रचनाकर्म को कितना प्रभावित किया था। विक्टर ह्यूगो के इस अनुवाद के बाद मंटो ने ऑस्कर वाइल्ड से ड्रामे “वेरा” का अनुवाद शुरू किया।

एक तरफ मंटो की साहित्यिक गतिविधियां चल रही थीं और दूसरी तरफ उनके दिल में आगे पढ़ने की ख़्वाहिश पैदा हो गई। आख़िर फ़रवरी, 1934 को 22 साल की उम्र में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया। यह यूनिवर्सिटी उन दिनों प्रगतिशील मुस्लिम नौजवानों का गढ़ बनी हुई थी। यहीं मंटो की मुलाक़ात अली सरदार जाफ़री से हुई और यहां के माहौल ने उसके मन में कुलबुलाती रचनात्मकता को उकसाया। मंटो ने कहानियां लिखना शुरू कर दिया। “तमाशा” के बाद कहानी “इनक़िलाब पसंद” (1935) नाम से लिखी, जो अलीगढ़ मैगज़ीन में प्रकाशित हुई।

1936 में मंटो का पहला मौलिक उर्दू कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ, उसका शीर्षक था “आतिशपारे”। अलीगढ़ में मंटो अधिक नहीं ठहर सके और एक साल पूरा होने से पहले ही अमृतसर लौट गये।

वहां से वह लाहौर चले गये, जहां उन्होंने कुछ दिन “पारस” नाम के एक अख़बार में काम किया और कुछ दिन के लिए “मुसव्विर” नामक साप्ताहिक का संपादन किया। जनवरी, 1941 में दिल्ली आकर ऑल इंडिया रेडियो में काम करना शुरू किया।

दिल्ली में मंटो सिर्फ़ 17 महीने रहे, लेकिन यह सफर उनकी रचनात्मकता का स्वर्णकाल था। यहाँ उनके रेडियो-नाटकों के चार संग्रह प्रकाशित हुए 'आओ', 'मंटो के ड्रामे', 'जनाज़े' तथा 'तीन औरतें'। उसके विवादास्पद 'धुआं' और समसामियक विषयों पर लिखे गए लेखों का संग्रह 'मंटो के मज़ामीन' भी दिल्ली-प्रवास के दौरान ही प्रकाशित हुआ। मंटो जुलाई, 1942 में लाहौर को अलविदा कहकर बंबई पहुँच गये। जनवरी, 1948 तक बंबई में रहे और कुछ पत्रिकाओं का संपादन तथा फ़िल्मों के लिए लेखन का कार्य किया।

अपने परिवार के साथ मंटो।

अपने मुंबई प्रवास के बारे में अपने संस्मरण की किताब तस्वीरें में मंटो ने लिखा, "फिल्मस्तिान ही वो जगह थी जहां पर मेरे फिल्मी लेखन का सितारा बुलंद हुआ था । मेरे दिलो दिमाग में काबिज फिल्मिस्तान की यादें आज भी मेरा पीछा नही छोड़ती हैं। अशोक कुमार का जीजा एस मुखर्जी तो मानो उस समय जनता की नब्ज जानता था। पूरे फिल्म के विचार को एक सूत्र में पिरो देता था। वो फिल्म कला का बड़ा ताज़िर था, खुद पर बेहद विश्वास रखने वाला वह शखस कलाकारों के चयन में बाजार का रुख देखता था। इस कारण अशोक और मुखर्जी दोनों जीजा सालों के बीच खूब जद्दोजहद होती थी।“

नहीं रास आया अपने देश को छोड़कर जाना

1948 के बाद मंटो पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनका शहर, उनका देश उनके अंदर ही कहीं था, जिसे वो मरते दम तक न भुला पाए। पाकिस्तान में उनके 14 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें 161 कहानियां संग्रहित हैं। कई कहानियों पर लंबे मुक़दमे चले। इन मुक़दमों से मंटो मानसिक रूप से परेशान ज़रूर हुए लेकिन उनके तेवर ज्यों के त्यों थे।

मंटो के 19 साल के साहित्यिक जीवन से 230 कहानियां, 67 रेडियो नाटक, 22 शब्द चित्र और 70 लेख मिले। तमाम ज़िल्लतें और परेशानियां उठाने के बाद 18 जनवरी, 1955 में मंटो ने अपने उन्हीं तेवरों के साथ, इस दुनिया को अलविदा कह दिया

मंटो की जिंदगी पर फिल्म

मंटो फिल्म में नवाजुद्दीन।

मंटो की जिंदगी के कई पहलू हैं, जिन्हें उनके पाठकों ने पढ़ा तो है, लेकिन जल्द ही वो पर्दे पर भी दिखायी देंगे। अभिनेत्री व निर्देशिका नंदिता दास मंटो की जिंदगी पर फिल्म बना रहीं हैं, जिसमें मंटो का किरदार नवाजुद्दीन सिद्दीकी निभा रहे हैं।

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