वो गीतकार जो आज भी दिलों पर राज करता है

वो गीतकार जो आज भी दिलों पर राज करता हैशकील बदायूंनी का नाम सुनते ही उनके लिखे गीत ज़ेहन में चलने लगते हैं।

शकील बदायूंनी का नाम सुनते ही उनके लिखे गीत ज़ेहन में चलने लगते हैं, शायद ही लोगों को पता होगा कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत गीतकार से नहीं, दिल्ली में आपूर्ति विभाग में अधिकारी की नौकरी से की थी। 20 अप्रैल 1970 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा था। लेकिन आज भी उनके गीत और शायरी दुनियाभर में लोगों की जुबान पर हैं।

उत्तर प्रदेश के बदांयू कस्बे में 3 अगस्त, 1916 को जन्में शकील अहमद उर्फ शकील बदायूंनी बीए पास करने के बाद वर्ष 1942 में दिल्ली पहुंचे जहां उन्होंने आपूर्ति विभाग में आपूर्ति अधिकारी के रूप में पहली नौकरी की। इस बीच वह मुशायरों में भी हिस्सा लेते रहे जिससे उन्हें पूरे देश भर में शोहरत हासिल हुई। अपनी शायरी की बेपनाह कामयाबी से उत्साहित शकील बदायूं ने नौकरी छोड़ दी और वर्ष 1946 में दिल्ली से मुंबई आ गए।

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मुंबई में उनकी मुलाकात उस समय के मशहूर निर्माता ए आर कारदार उर्फ कारदार साहब और महान संगीतकार नौशाद से हुई। नौशाद के कहने पर शकील ने हम दिल का अफसाना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की आग लगा देंगे गीत लिखा। वर्ष 1947 में अपनी पहली ही फिल्म दर्द के गीत 'अफसाना लिख रही हूं' के बाद शकील बदायूंनी ने वापस मुड़कर नहीं देखा।

नौशाद व हेमंत के संग हिट रही जोड़ी

शकील बदायूंनी की जोड़ी प्रसिद्ध संगीतकार नौशाद और हेमंत कुमार के साथ खूब जमी। शकील बदायूंनी ने हेमन्त कुमार के संगीत निर्देशन में बेकरार कर के हमें यूं न जाइये.., कहीं दीप जले कहीं दिल.. जरा नजरों से कह दो जी निशाना चूक ना जाए.. (बीस साल बाद, 1962) और भंवरा बड़ा नादान है बगियन का मेहमान है.., ना जाओ सइयां छुड़ा के बहियां.. (साहब बीबी और ग़ुलाम, 1962), जब जाग उठे अरमान तो कैसे नींद आए.. (ज़िंदगी और मौत, 1963) जैसे गीत आएे। सी. रामचन्द्र के संगीत से सजा उनका दिल लगाकर हम ये समझे ज़िंदगी क्या चीज़ है.. (ज़िंदगी और मौत, 1965) गीत आज भी बहुत पसंद किया जाता है।

तीन बार मिला फिल्मफेयर पुरस्कार

शकील बदायूंनी को अपने गीतों के लिए लगातार तीन बार फ़िल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया। उन्हें अपना पहला फ़िल्मफेयर पुरस्कार वर्ष 1960 में प्रदर्शित चौदहवी का चांद फ़िल्म के लिए दिया गया था। वर्ष 1961 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘घराना’ के लिए भी सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्म फेयर पुरस्कार दिया गया। इसके अलावा 1962 में भी फ़िल्म ‘बीस साल बाद’ में कहीं दीप जले कहीं दिल... गाने के लिए फ़िल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया।

शकील के लिखे कुछ मशहूर गीत

अफ़साना लिख रही हूं... (दर्द)

चौदहवीं का चांद हो या आफ़ताब हो... (चौदहवीं का चांद)

जरा नज़रों से कह दो जी निशाना चूक न जाये.. (बीस साल बाद)

नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं... (सन ऑफ़ इंडिया)

सुहानी रात ढल चुकी.. (दुलारी)

दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पडे़गा (मदर इंडिया)

प्यार किया तो डरना क्या...(मुग़ले आज़म)

दोस्तों ने बनाया याद में ट्रस्ट

54 वर्ष की उम्र में 20 अप्रैल, 1970 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, आज वो नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे गीत हिन्दी सिनेमा के मशहूर गीतों में शुमार हैं। शकील बदायूंनी की मृत्यु के बाद उनके मित्र नौशाद, अहमद जकारिया और रंगून वाला ने उनकी याद मे एक ट्रस्ट ‘यादें शकील’ की स्थापना की ताकि उससे मिलने वाली रकम से उनके परिवार का खर्च चल सके।

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