कब तैयार होगा हमारी बेहतरीन लघु फिल्मों का बाजार

कब तैयार होगा हमारी बेहतरीन लघु फिल्मों का बाजारनवाजुद्दीन सिद्दीकी, इरफान खान।

प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव

हमारे देश में हर साल सैकड़ों लघु फिल्में बन रही हैं। इनमें अधिकतर एवन क्वालिटी की होती हैं जो किसी भी अंतर्राष्ट्रीय शार्ट फिल्म से किसी भी मायने में कम नहीं होती हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि नाटक की तरह ही मंझे हुए नामचीन कलाकार इसका हिस्सा बनते हैं। नसीरूद्दीन शाह, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, इरफान खान, मनोज बाजपेयी, राधिका आप्टे, कोनिका सेन शर्मा, अदिति राव, श्वेता बसु प्रसाद व गायिका सुनिधि चौहान जैसे अदाकार अपनी कला का जौहर दिखाने में किसी से पीछे नहीं हैं।

निर्देशक भी एक से बढ़कर एक प्रयोगधर्मिता से जुड़कर अपनी कला का लोहा मनवा रहे हैं। कुछ उभरते निर्देशक अब किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। चार मिनट से लेकर बीस मिनट तक की सैकड़ों लघु फिल्में यूट्यूब का बाजार गर्म किये हुए हैं। कुछ फिल्मों को तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सत्तर से अस्सी लाख बार देखा गया। ये सब अपनी जगह ठीक है लेकिन इन शार्ट फिल्मों के निर्माताओं का दर्द ये है कि इनके लिए आज तक कोई बाजार नहीं है।

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आपको याद होगा कि पहले दूरदर्शन अपनी देखरेख में प्रेरणाप्रद व सूचनात्मक फिल्में बनवाकर दिखाया करता था। लेकिन जैसे जैसे निजी चैनलों का जाल फैलता गया दूरदर्शन की पहुंच भी सीमित हो गयी। शार्ट फिल्म मेकर व डायरेक्टर तरुण जैन एक इंटरव्यू में इसी दर्द को बयां करते हैं कि इतने सालों में अभी तक लघु फिल्मों के लिए व्यवस्थित बाजार नहीं बन सका। आज फिल्म मेकर को अनके आर्थिक संकटों से जूझना पड़ता है। उनकी लागत तक नहीं निकल पाती। अब हमारे पास लघु फिल्म महोत्सव के अलावा और कोई प्लेटफार्म नहीं है जहां हम अपनी कला का प्रदर्शन कर सकें।

पत्रकार से फिल्म प्रोडक्शन में आये पवन कुमार सिंह बताते हैं कि जीएसटी की वजह से उनकी फिल्मों का बजट काफी बढ़ गया है। अब खाने से लेकर पानी की बोतल तक 18 प्रतिशत जीएसटी लगता है। पहले हम जितने बजट में एक फिल्म बना लेते थे आज उसमें 18 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गयी है। शार्ट फिल्म बनाने का कोई लाभ नहीं है क्योंकि आपकी लागत एकदम नहीं निकल पाती।

हां अगर आपके पीछे रॉयल स्टैग, एमेजॉन ओरिजिनल जैसी कोई बड़ी है तो आप की बल्ले-बल्ले है। दूसरा गूगल भी एक निश्चित दर्शक संख्या के बाद आपको कुछ मुआवजा देता है, अपना विज्ञापन लगाकर। शार्ट फिल्म के युवा निर्देशक उस्मान अहमद बताते हैं कि ज्यादातर युवा अपने पास से पैसा लगाकर फिल्म बनाते हैं। उनको यही लाभ होता है कि वे सिनेमा बनाने की टेक्नीक सीखते हैं। जिससे बाद में वे अपना काम दिखाकर फीचर फिल्म ले सकें।

अभी हाल ही में लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग द्वारा तैयार की गयी लगभग दो सौ शार्ट फिल्म के लिए राज्यपाल की दखल पर लखनऊ दूरदर्शन के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए हैं जिसमें उनकी चुनिंदा फिल्मों को डीडी लखनऊ प्लेटफार्म देगा। इस सिलसिले में अधिशासी अधिकारी आत्म प्रकाश मिश्र से बात हुई तो उनका कहना था कि हम इसमें किसी प्रकार का पेमेन्ट नहीं करने जा रहे हैं। यह प्लेटफार्म केवल पत्रकारिता विभाग द्वारा निर्मित लघु फिल्मों को ही दिया गया है।

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बहुचर्चित भारतीय शार्ट फिल्म

बाईपास (2003) निर्देशक- अमित कुमार, कलाकार - इरफान खान, नवाजुद्दीन सिद्दीकी की अदाकारी से सजी ये फिल्म राजस्थान में अपने जीवित रहने के लिए किये जा रहे हत्या जैसे अपराध को सहजता से दर्शाती है। पैसा लूटने के लिए कोई किसी भी हद तक जाता है।

रास्ता (2011) निर्देशक- दिग्विजय चौहान, ट्रैफिक सिग्नल से उठे दो बच्चों की कथा जिसे कैनन 550 डी कैमरे से शूट किया गया और यह फिल्म काफी चर्चित रही।

दैट डे आफ्टर एवरी डे (2013) निर्देशक- अनुराग कश्यप, लेखक- नितिश भारद्वाज, कलाकार - राधिका आप्टे, संध्या मृदुल, गीतांजलि थापा व अन्य। इसमें दिखाया गया है कि जब तक लड़कियां गुंडों से डरती हैं गुण्डे उनपर अपना जुल्म ढाते रहते हैं। लेकिन एक दिन सब मिलकर उन्हें छठी का दूध याद दिला देती हैं तो गुण्डे उनसे खौफ खाने लगते हैं।

ब्लैक मिरर (2011) निर्देशक- अबु बर्मन, कलाकार- साहिल रेवाले जो मात्र 12 साल है और किसी को नहीं पता वो कहां से आया है और उसके मां-बाप कौन हैं। मुम्बई में बिखरे ऐसे हजारों बच्चों की दास्तां करती है ये शार्ट फिल्म।

लिटिल टैरिस्ट (2004) लेखक, निर्माता व निर्देशक-अश्विन कुमार, कलाकार - जुल्फिकार अली, सुशील शर्मा व मेघना मोहिता के जानदार अभिनय से सजी पाकिस्तान बार्डर से एक बच्चे के हिन्दुस्तान सीमा में आ जाने की मार्मिक कहानी है। एक हिन्दू परिवार उसे आश्रय देता है और सुरक्षा बलों से बचाकर वापस उसके घर पहुंचाता है। यह फिल्म 2005 के एकेडमी अवार्ड के लिए नामित भी हुई थी।

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ट्यूबलाइट का चांद (2013) निर्माण-अनुराग कश्यप फिल्म्स, लेखक- निर्देशक-श्लोक शर्मा - कलाकार - मास्टर मोहम्मद शारिक के जीवन पर आधारित एक सात साल के बच्चे की कहानी है जो आसमानी चांद की तरह अपना चांद बनाने के लिए कोलकाता शहर के बल्ब व तार चुराने लगता है। बाद में वह अपने मकसद में कामयाब हो जाता है।

माइग्रेशन (2008) निर्माण व निर्देशन-मीरा नायर, लेखक-जोया अख्तर, कलाकार - इरफान खान, रीमा सेन, समीरा रेड्डी, शाइनी आहूजा और सुलभा देशपाण्डे के सशक्त अभिनय और बोल्ड विषय से सजी इस फिल्म में गांव के लोग का शहर जाकर किस तरह असुरक्षित सेक्स के चंगुल में फंस कर अपने ही लोगों को एड्स की बीमारी बांट बैठते हैं।

आफ्टर ग्लो (2011) निर्माण-एफटीआईआई, पटकथा- निर्देशक-कौशल ओझा, कलाकार - अनाहिता ओबेरॉय, महाबानो मोदी कोतवाल, सोहराब आर्देशिर के स्वाभाविक अभिनय से परिपूरित यह फिल्म पारसी समाज के वर्तमान चलन की पर्तें खोलकर रखती है जब एक महिला का पति भगवान के पास चला जाता है और उसके पीछे उसके रिश्तेदार किस तरह से व्यवहार करते हैं। 2012 में बेस्ट फिल्म इन फेमिली वेल्यू में नेशनल फिल्म अवार्ड जीता। इसके अलावा देश विदेश के कई नामचीन अवार्ड ये शार्ट फिल्म अपनी झोली में डाल चुकी है।

अहिल्या (2015) लेखक, पटकथा व निर्देशक - सुजय घोष, कलाकार - राधिका आप्टे, सौमित्र चटर्जी व तोरा रॉय चौधरी अभिनीत यह चौदह मिनट की फिल्म ने तहलका मचा दिया। दस लाख से ज्यादा लोग अब तक इस फिल्म को देख चुके हैं। मूल रूप से बांग्ला भाषा की इस शार्ट फिल्म के सब टाइटल्स अंग्रेजी में हैं। फिल्म देखने के बाद दर्शक रोमांचित हो उठते हैं।

चाय (2005) निर्माण-अनुराग कश्यप फिल्म्स, लेखिका-निर्देशिका- गीतांजलि राव। इस फिल्म की खूबसूरती यह है कि इसके कलाकारों को कभी समाने से नहीं दिखाया गया। ये सभी चाय वाले हैं। इनसे हमारा सम्बंध चाय पीने तक ही होता है।

एक दस वर्षीय लड़के से मुम्बई के गेटवे ऑफ इंडिया में, एक 18 साल की राजस्थानी लड़की को शहर के बीच में अपनी चाय की दुकान के साथ, एक 19 वर्षीय कश्मीरी लड़के को बरिस्ता चाय हाउस में वेटर और एक 80 वर्षीय आदमी की केरल के एक बस स्टैंड पर अपनी चाय की दुकान पर अपनी-अपनी व्यथा कहते सुनाया गया है। अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह सर्किट में आरेंज व विबग्योर के अलावा 2006 में कान फिल्म फेस्टिवल में तीन-तीन क्रिटिक अवार्ड अपनी झोली में डाल चुकी है यह फिल्म।

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नयनतारा का नेकलेस (2014) निर्माता- सियाग्राम, निर्देेशक-जयदीप सरकार, कलाकार - कोनिका सेन, तिलोतमा शोम अभिनीत इस 20 मिनट की फिल्म में नयनतारा की दोस्ती एक मध्यम वर्ग की महिला अलका से है, जो कि सामान्य सी पृष्ठभूमि से हैं। फिल्म की नायिका इस मध्यवर्गीय महिला की आकांक्षाओं को बढ़ावा देती है और आंखों के सामने स्केच की गयी भोग विलास की चीजों को भोगने के लिए तैयार कराती है। महिला मित्र सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपने स्कूल फ्रेंड से मिलने होटल चली जाती है। नयनतारा अलका का मेकओवर करती है आैर उसे अपना नेकलेस भी पहन देती है। फिल्म का अंत देखकर दर्शक सकते में आ जाते हैं।

नामकरण (2006) निर्देेशिका-कोकणा सेन शर्मा, कलाकार - सुदीप्ता चक्रवर्ती व बिदीप्ता चक्रवर्ती के सशक्त अभियन की बदौलत कहानी आगे बढ़ती है। नामकरण दो बहनों की कहानी है। एक बहन पिकपॉकेटर है और दूसरी पेशे से शिक्षिका। सर्दियों में कोलकाता में ट्राम में सफर के दौरान छोटी बहन लोगों का बटुआ पार करती है।

बड़ी बहन का एक बेटा है जिसका नाम अभी नहीं रखा जा सका है। छोटी बहन नाम रखना चाहती है लेकिन वह उसके बताये नाम पर सहमत नहीं है। फिर एक बार बड़ी बहन बस में सफर के दौरान एक लड़के का गिरा बटुआ वापस करती है अौर उसका नाम भी पूछ लेती है। जब वह बस से नीचे उतरी है तो यात्री के बटुए का पैसा बच्चे के स्वेटर से निकालती है। बस स्टाप पर उतरते ही एक महिला बच्चे का नाम पूछती है तो वह उसी लड़के का नाम बता देती है जिसका उसने बटुआ मारा था।

चटनी (2016) निर्देेशिका-ज्योति कपूर दास, कलाकार - टिसका चोपड़ा, आदिल हुसैन, रसिका दुग्गल। 17 मिनट की यह लघु फिल्म एक सरल कहानी के रूप में शु डिग्री होती है, जिसमें एक अतिरिक्त-वैवाहिक संबंध के अंतर्निहित संकेत दिखाये जाते हैं। टिस्का एक सरल, विन्र गृहिणी हैं, जो कि उस व्यक्ति से विवाहित हैं जो खुद चरित्र से ढीला है। टिस्का चोपड़ा द्वारा निर्मित व सहलेखिका का दायित्व निभाते हुए इस लघु फिल्म की सरल कहानी धीरे-धीरे मोड़ लेती है। हालांकि, जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, आपके आगे उसके चरित्र की परतें खुलना शु डिग्री होती हैं और अंत निश्चित रूप से आपके रोंगटे खड़े कर देगा!

इंटीरियर कैफे नाइट (2014) निर्देेशक-लेखक-अधिराज बोस, कलाकार - नसीरूद््दीन शाह, शहनाज पटेल, नवीन कस्तूरिया, श्वेता बसु प्रसाद। 13 मिनट की इस लघु फिल्म में प्यार करने वाले दो लोग बिछड़ जाते हैं। तीस साल के बाद प्रेमिका वापस आती है अपने घर आैर एक कैफे में उसकी मुलाकात पुराने प्रेमी से होती है जो बूढ़ा हो गया है। इंटीरियर कैफे नाइट का हीरो अनुभवी अभिनेता नसीस्र्द्दीन शाह और अभिनेत्री का किरदार निभाया है शहनाज पटेल ने। दोनों की जवानी की कहानी कहते हैं नवीन कस्तूरिया और श्वेता प्रसाद जैसे समर्थ कलाकार। आैर अंत वैसे ही होता है जैसे दर्शक सोचते हैं। अनेक राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय अवार्डांे के अपनी झोली में समेटे एक बेहतरीन फिल्म है।

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कृति (2016) निर्देेशक-लेखक-सम्पादक- शिरीष कुंदर, कलाकार- मनोज बाजपेयी, आधिका आप्टे, नेहा शर्मा। 18 मिनट की इस फिल्म को फिल्मकार शिरीष कुंदर एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर कृति में मनोज बाजपेयी, राधिका आप्टे और नेहा शर्मा एक ऐसे वातावरण का सृजन करते हैं जिसमें काफी कुछ स्वाभाविक सा लगता है। यह कहानी वास्तव में क्या है और क्या नहीं है, के बीच फंसी नजर आती है ... लेकिन जो कुछ भी वे प्रकट करते हैं वह एक उलझाने वाला है। बाजपेयी कई जगह स्कोर करते हैं। तो मनोवैज्ञानिक राधिका आप्टे अपने सशक्त अभिनय से कहानी को आगे बढ़ाती हैं। आप शायद इस लघु फिल्म में अन्य फिल्म से कुछ समानताएं भी देख सकते हैं।

प्लेइंग प्रिया (2016) निर्देेशक- आरिफ अली, कलाकार-सुनिधि चौहान, मुकुल चड््ढा। गायिका सुनिधि चौहान ने इस लघु फिल्म से सेलुलाइड पर पदार्पण किया है। उनकी पहली शार्ट फिल्म का फर्स्ट लुक देखकर सभी उनकी बहुमुखी प्रतिभा को देखकर दंग रह गए। वह अकेले घर के चारों ओर मस्ती से घूम रही है तभी दरवाजे पर एक अप्रत्याशित दस्तक सुनती है। आरिफ़ अली द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आप कहानी के साथ जैसे ही आगे बढ़ते हैं दंग रह जाते हैं। हालांकि साढ़े छह मिनट की इस फिल्म में कोई डायलाग नहीं है, लेकिन वह एक समर्थ कथानक की तरह किस्सा बयां करती है।

नो स्मोकिंग (2016) निर्माता- अनिल व मनीष मुरारका, निर्देेशक- विभु पुरी, कलाकार- आलोक नाथ, सनी लियोनी, दीपक डोब्रियाल। संस्करकारी आलोक नाथ आैर सनी लियोन के साथ इस साढ़े चार मिनट की फिल्म में एक सशक्त संदेश देने का प्रयास किया गया है। प्रतिभाशाली दीपक डोब्रियाल के अभिनय आैर मजेदार कथानक इस लघु फिल्म की आत्मा है। यह फिल्म सबका दिमाग उड़ाने वाली है।

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भारत में होने वाले प्रमुख शार्ट फिल्म फेस्टिवल व अवार्ड

नेशनल फिल्म अवार्ड फार बेस्ट शार्ट फिक्शन फिल्म

इंडियाज इंटरनेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल, मुम्बई

मुम्बई फिल्म फेस्टीवल (इंट्री फ्री)

मुम्बई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल (इंट्री फीस एक हजार रु.)

धर्मशाला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (डीआईएफएफ)

इंटरनेशनल डाक्यूमेंट्री एंड शार्ट फिल्म फेस्टिवल आफ केरला (आईडीएसएफएफके) (इंट्री फ्री)

विबग्योर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल केरला (इंट्री फीस तीन सौ रु.)

बैंगलोर इंटरनेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल (इंट्री फीस 10 यूएस डालर)

जयपुर इंटरनेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल (इंट्री फीस एक हजार पांच सौ रु.)

साइन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (इंट्री फ्री)

गुजरात इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिीवल (इंट्री फीस दो हजार रु.)

इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया (आईआईएफआई) (इंट्री फीस एक हजार पांच सौ रु.)

नवी मुम्बई इंटरनेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल (एनएमआईआईएफ) (इंट्री फीस आठ सौ से तीन हजार रु.)

जागरण शार्ट फिल्म्स फेस्टिवल

थर्ड आई एशियन फिल्म अवार्ड, मुम्बई

इंडियन डाक्यूमेंट्री प्रमोशन एसोसिएशन

मीराज इंटरनेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल

गोल्डेन फ्रेम्स इंटरनेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल, मुम्बई

ब्रह्मपुत्रा वैली फिल्म फेस्टिवल, गुवाहाटी

माई मुम्बई शार्ट फिल्म फेस्टिवल, संयोजक युनिवर्सल मराठी, मुम्बई

इंटरनेशनल स्टूडेंट शार्ट फिल्म फेस्टिवल, बेटा मूवमेंट, नयी दिल्ली

हाईवे 61 फिल्म फेस्टिवल

मुम्बई वूमन्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल

आकृति इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल

इंटरनेशनल डाक्यु. एंड शार्ट फिल्म फेस्टिवल कर्नाटक

इसके अलावा दुनिया के सभी देशों में फिल्म फेस्टिवल पूरे साल होते रहते हैं। लंदन, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेेलिया, जर्मनी, जापान, स्पेन, बेलजियम, इटली, स्वीटजरलैंड, फ्रांस, पोलैंड, बुलगारिया, नीदरलैंड, डेनमार्क, पुर्तगाल, मलाया, फिनलैंड, सर्बिया, माल्टा, स्लोवेनिया अौर टर्की जैसे देशों में आयोजित होते रहते हैं।

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