वैलेंटाइन डे विशेष: वो आग को शब्द बनाकर इश्क को कागज पर बिछा देते थे

फरवरी में प्यार को त्यौहार के रूप में मनाए जाने वाले इस हफ्ते में प्रस्तुत हैं दुनिया के सबसे खूबसूरत प्रेम पत्रों में से कुछ प्यार भरे पत्र।

वैलेंटाइन डे विशेष: वो आग को शब्द बनाकर इश्क को कागज पर बिछा देते थे

लखनऊ। वो इसी दुनिया के थे, मगर उनकी दुनिया अलग थी। वो एक-दूसरे से दूर थे, मगर उनकी रूह एक थी। उन्हें एक-दूसरे की याद ऐसे आती थी जैसे गीली लकड़ी में से गहरा और काला धुंआ उठता है... और फिर वो आग को शब्द बना देते थे, इश्क को कागज पर बिछा देते थे।

उनके बीच उन्हें जोड़कर रखने वाला बस एक ही पुल था- प्रेमपत्र। उनके प्रेम पत्रों की ताकत पर एक कवि ने लिखा-

'प्रेत आएगा, किताब से निकाल ले जाएगा प्रेमपत्र

गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खाएगा

चोर आएगा तो प्रेमपत्र ही चुराएगा

जुआरी प्रेमपत्र ही दांव लगाएगा...

मैं कैसे बचाऊंगा तुम्हारा प्रेमपत्र।'

मगर उन प्रेमियों ने अपने प्रेमपत्रों पर ऐसी रसीदी टिकट लगाई थी कि सैंकड़ों साल बाद भी इतिहास की एक अलमारी में बचे हुए हैं उनके प्रेमपत्र और रह-रहकर बोल भी उठते हैं>

फ्रांज काफ्का का मिलेना के नाम लिखा एक खत कहता है-


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प्रिये मिलेना,


तुम्हारे सबसे सुंदर पत्र वे हैं जिनमें तुम मेरे डर से सहमत हो और साथ ही यह समझाने की कोशिश करती हो कि तुम मेरे लिए प्रयास करती हो कि मेरे लिए डर का कोई कारण नहीं है (मेरे लिए यह बहुत कुछ है क्योंकि कुल मिलाकर तुम्हारे पत्र और उनकी प्रत्येक पंक्ति मेरे जीवन का सबसे सुंदर हासिल है) शायद तुम्हें कभी-कभी लगता हो जैसे मैं अपने डर को खुद ही पाल रहा हूं पर तुम ये भी मानोगी कि ये डर मुझमें बहुत गहराई तक बस चुका है। शायद यही मेरा वह एकमात्र रूप है जिसे तुम प्यार करती हो क्योंकि मुझमें प्यार के काबिल और क्या मिलेगा? सच है इंसान को किसी को प्यार करना है तो उसकी कमजोरियों को भी खूब प्यार करना चाहिए। तुम यह बात जानती हो, इसीलिए मैं तुम्हारी हर बात का कायल हूं। तुम्हारा होना मेरी जिंदगी में क्या मायने रखता है यह बता पाना मेरे लिए संभव नहीं है।


तुम्हारा काफ्का

जर्मनी का यहूदी लेखक दुनिया भर में मशहूर था, मगर उम्र भर प्यार के बुखार की तपिश ने काफ्का का पीछा नहीं छोड़ा। उनकी प्रिय मिलेना ईसाई थी और धर्म के इस भेद ने उन्हें कभी एक नहीं होने दिया, फिर भी दोनों कभी अलग नहीं हो पाए।

इस प्रेमपत्र को पढ़ते हुए जैसे ही आंखें भर आती हैं और एक आंसू बहकर नीचे गिरता है, तो एक और प्रेमपत्र गीला हो उठता है और उसकी सिसकी कुछ यूं सुनाई देती है-

मेरी रानी,


तुम अपने घर पहुंच गयी होगी। तुम्हें रह-रहकर अपने मां-बाप, अपनी बहन से मिलने की खुशी हो रही होगी, लेकिन मेरी रानी, मेरा जी भरा आ रहा है। आंसू रास्ता देख रहे हैं। इस सूने आंगन में मैं अकेला बैठा हूं। ग्यारह दिन में घर की क्या हालत हुई है, वह देखते ही बनती है। कमरे में एक-एक अंगुल गर्दा जमा है। किताबें बिखरी पड़ी हैं। अभी-अभी कपड़े संभालकर तुम्हें ख़त लिखने बैठना हूं, लेकिन कलम चलती ही नहीं। दो शब्द लिखता हूं और मन उमड़ पड़ता है काश… कि तुम मेरे कंधे पर सिर रक्खे बैठी होतीं और मैं लिखता चला जाता… पन्ने दर पन्ने। प्रिये, मैं चाहता हूं कि तुम्हें भूल जाऊं। समझूं तुम बहुत बदसूरत, फूहड़ और शरारती लड़की हो। मेरा तुम्हारा कोई संबंध नहीं। लेकिन विद्रोह तो और भी आसक्ति पैदा करता है। तब क्या करूं? मुझे डर लगता है। मुझे उबार लो।


बहुत सारे प्यार के साथ,
तुम्हारा ही
विष्णु

शरद चंद्र के जीवन को 'आवारा मसीहा' के रूप में अमर कर देने वाले शब्द देकर विष्णु प्रभाकर खुद भी हिंदी साहित्य में हमेशा के लिए अमर हो चुके हैं। उनका अपनी पत्नी सुशीला के नाम लिखा ये ख़त भी आज साहित्य की जमा-पूंजी से कम नहीं हैं। यह खत उन्होंने अपनी पत्नी को तब लिखा था जब वह शादी के बाद पहली बार मायके गई थीं।

इस खत को पढ़कर एक मीठी सी कशिश उठती है, जो प्यार के दर्द को बयां करती है। फिर एक और खत हाथ लगता है, जो कहता है कि किसी का हो जाना ही प्यार को मुक्कमल करने का रास्ता है और इस रास्ते पर चलने वाले अमर हो जाया करते हैं, जैसे व्लादिमीर और वेरा-

'हां, मुझे तुम्हारी जरूरत है। तुम मेरे लिए एक परी-कथा जैसी हो। सिर्फ तुम ही हो, जिससे मैं बादलों के रंग के बारे में भी बात कर सकता हूं, उस गाने के बारे में भी, जो सिर्फ मेरे दिमाग में है और अभी बना नहीं हैं, क्योंकि तुम समझोगी।'


- मेरी खुशी जल्दी मिलते हैं

1923 में रूसी लेखक व्लादिमीर नोबोकोव और वेरा की मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात के दो महीने बाद उन्होंने वेरा को ये खत लिखा और फिर ये सिलसिला चलता रहा। वेरा ना सिर्फ व्लादिमीर की पत्नी बनीं, बल्कि उनकी असिस्टेंट, एडिटर, एडमिनिस्ट्रेटर, एजेंट, रिसर्चर, स्टेनोग्राफर और बॉडीगार्ड भी बनीं। कहा जाता है कि वह हमेशा अपने साथ पर्स में एक छोटी पिस्तौल रखा करती थीं। आखिर उनके पति अमेरिका के सबसे मशहूर और विवादित लेखक जो बन चुके थे और उनकी जान को हमेशा खतरा रहता था।



इस खत को पढ़कर जैसे खुशी के आंसू छलक उठते हैं वैसे ही एक और आंसू गालों पर फिसल आता है और उस आंसू को पोंछने के लिए बढ़ा हुआ हाथ आंखों को एक और खत का रास्ता दिखाता है-

अख्तर मेरे,


कब तुम्हारी मुस्कुराहट की दमक मेरे चेहरे पर आ सकेगी, बताओ तो? बाज लम्हों में तो अपनी बाहें तुम्हारे गिर्द समेट कर तुमसे इस तरह चिपट जाने की ख्वाहिश होती है कि तुम चाहो भी तो मुझे छुड़ा न सको। तुम्हारी एक निगाह मेरी जिंदगी में उजाला कर देती है। सोचो तो, कितनी बदहाल थी मेरी जिंदगी जब तुमने उसे संभाला। कितनी बंजर और कैसी बेमानी और तल्ख थी मेरी जिंदगी, जब तुम उसमें दाखिल हुए। मुझे उन गुज़रे हुए दिनों के बारे में सोचकर गम होता है जो हम दोनों ने अलीगढ़ में एक-दूसरे की शिरकत से महरूम रहकर गुज़ार दिए। आओ, मैं तुम्हारे सीने पर सिर रखकर दुनिया को मगरूर नजरों से देख सकूंगी।


तुम्हारी अपनी
सफिया

पत्नी सफिया के इस खत से मुखातिब होकर ही जां निसार अख्तर ने शायद ये शेर कहा होगा- 'तुझे बांहों में भर लेने की ख़्वाहिश यूं उभरती है, कि मैं अपनी नज़र में आप रुस्वा हो सा जाता हूं।'

आज के दौर के मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर के पिता जां निसार अख्तर मशहूर शायर थे और उनकी पत्नी सफिया उर्दू के बेहद प्रसिद्ध शायर मजाज की बहन थीं। दोनों अपनी दूरियों को ऐसे खतों से नापते थे कि दूरियां भी शरमा जाएं...

इस खत को पढ़कर प्यार पर भरोसे की चमक आंखों में फिर एक बार आंसू बनकर चमक उठती है, तो वो खत हाथ लगते हैं जिन्हें इतिहास की इस अलमारी में सबसे सुरक्षित जगह पर रखने की बेताबी दिलो-दिमाग को गिरफ्त में ले लेती है-

इमरोज़


तुम्हारे और मेरे नसीब में बहुत फर्क है। तुम वह खुशनसीब इंसान हो, जिसे तुमने मुहब्बत की, उसने तुम्हारे एक इशारे पर सारी दुनिया वार दी। पर मैं वह बदनसीब इंसान हूं जिसे मैंने मुहब्बत की , उसने मेरे लिए अपने घर का दरवाजा बंद कर लिया। दु:खों ने अब मेरे दिल की उम्र बहुत बड़ी कर दी। अब मेरा दिल उम्मीद के किसी खिलौने के साथ नहीं खेल सकता।


-अमृता

इस पर प्यार से अमृता को जीती और आशी कहने वाले इमरोज लिखते हैं-

जीती,


तुम जिन्दगी से रूठी हुई हो. मेरी भूल की इतनी सजा नहीं, आशी। यह बहुत ज्यादा है। यह दस साल का वनवास। नहीं-नहीं मेरे साथ ऐसे न करो। मुझे आबाद करके वीरान मत करो।
वह मेज, वह दराज, वे रंगों की शीशियां, उसी तरह रोज उस स्पर्श का इंतजार करते हैं, जो उन्हें प्यार करती थी और इनकी चमक बनती थी। वह ब्रश, वे रंग अभी भी उस चेहरे को, उस माथे को तलाश करते हैं, उसका इंतजार करते हैं जिसके माथे का यह सिंगार बनकर ताजा रहते थे, नहीं तो अब तक सूख गए होते। तुम्हारे इंतजार का पानी डालकर मैं जिन्हें सूखने नहीं दे रहा हूं पर इनकी ताजगी तुम्हारे साथ से ही है, तुम जानती हो। मैं भी तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं, रंगों में भी जिंदगी में भी।


तुम्हारा
इमरोज

अमृता-इमरोज के इन खतों को पढ़कर प्यार की संभावनाओं पर शोध करने को जी चाहता है। ऐसा महसूस होता है जैसे हर खिड़की-दरवाजे से प्यार दस्तक दे रहा है और हम ही कहीं परिभाषाओं में बंधे, परदों में छिपे बैठे हैं।




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