ओडिशा: 2 साल के इंतजार के बाद एक बार फिर गर्मियों में होने वाली रामलीला की वापसी

कोरोना महामारी के 2 साल बाद ओडिशा में गर्मी की रामलीला एक बार फिर शुरू हो गई है। यह उत्सव पूरे एक महीने तक रहता है। ये उत्सव महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए आय का एक स्त्रोत है। महिलाएं खुले मंच पर रामायण महाकाव्य का प्रदर्शन करने वाले कलाकारों के लिए वेशभूषा तैयार करती हैं। जाजपूर के गाँवों से एक रिपोर्ट जहां एक रामलीला चल रही है।

Ashis SenapatiAshis Senapati   9 May 2022 7:07 AM GMT

ओडिशा: 2 साल के इंतजार के बाद एक बार फिर गर्मियों में होने वाली रामलीला की वापसी

ओडिशा में जात्रा उत्सव पतझड़ के मौसम के दौरान शुरू होता है और मानसून की शुरुआत में खत्म होता है। फोटो: अरेंजमेंट

रामलीला उत्सव आमतौर पर भारत में सर्दियों की शुरुआत में मनाया जाता है। जहां रामायण का प्रदर्शन गीतों, कहानियों के कहने और नाटक के साथ किया जाता है। हालांकि, पूर्वी राज्य ओडिशा में ग्रीष्मकालीन रामलीला की एक लंबी परंपरा है, जिसे गाँव में किया जाता है, इस रामलीला को आमतौर पर जात्रा के नाम से जाना जाता है।

कोविड महामारी के 2 साल बाद एक बार फिर ग्रीष्मकालीन रामलीला की शुरुआत हो गई है और ग्रामीण इससे आनंदित हो रहे हैं।

आमतौर पर, ओडिशा में जात्रा उत्सव पतझड़ के मौसम के दौरान शुरू होता है और मानसून की शुरुआत में खत्म होता है। गर्मी के मौसम की रामलीला, जिसमें रंगीन पोशाक, संगीत और नृत्य का जीवंत मिश्रण शामिल होता है, एक खुले मंच पर किया जाता है, जो आमतौर पर एक उठा हुआ मंच होता है जिसके चारों तरफ दर्शक बैठते हैं। इस साल गर्मी की रामलीला 10 अप्रैल को रामनवमी पर्व पर शुरू हुई है और यह जून के आखिरी सप्ताह या जुलाई के पहले सप्ताह तक चलती रहेगी।

जात्रा पर्व का इतिहास

ऐसा माना जाता है कि जात्रा की उत्पत्ति 15वीं शताब्दी में भक्ति आंदोलन के नतीजे में हुई थी, जिसमें भगवान कृष्ण के भक्त जुलूस में गाते और नाचते थे और अक्सर एक समाधि में चले जाते थे। नाटकीय तत्वों के साथ यह गायन धीरे-धीरे जात्रा के रूप में जाना जाने लगा, जिसका अर्थ है "जुलूस में जाना।"


दक्षिण एशियाई कला के लोक रंगमंच के बारे में ब्रिटानिका सेक्शन बताता है, थिएटर सिटी (कोलकाता, मुंबई और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों को छोड़कर) के अभाव में, लोक रंगमंच सदियों से ग्रामीण दर्शकों का मनोरंजन किया है और विभिन्न भाषाओं में आधुनिक थिएटर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।"

"शैलीबद्ध मूमेंट, अलंकृत वेशभूषा, पारंपरिक संगीत, बहुत सारे नृत्यों, गीतों और संघर्षों और हास्य से भरे भूखंडों के साथ, उड़ीसा में जात्रा न केवल मनोरंजन के लिए बल्कि आम तौर पर लोगों को शिक्षित करने और उन्हें ऊपर उठाने के लिए एक आवश्यक संस्थान बना हुआ है।" जात्रा-पीपुल्स थिएटर ऑफ़ उड़ीसा नामक एक शोध पत्र का उल्लेख है, जो केंद्र सरकार की भारतीय संस्कृति वेबसाइट पर प्रदर्शित है।

गर्मी की रामलीला जीवन यापन का साधन

ओडिशा के जाजपुर जिले के हरिपुर और नरसिंहपुर गाँवों के लोगों में काफी उत्साह देखा जा सकता है। ग्रामीण लोगों के लिए जात्रा न केवल मनोरंजन का साधन है बल्कि उनकी आजीविका का साधन भी है। इस नाट्य प्रदर्शन में डायरेक्ट या इनडायरेक्ट हजारों ग्रामीण शामिल हैं।

ग्रामीण महिलाएं जो स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं, जात्रा कलाकारों के लिए पोशाक बनाती हैं।

"रामलीला के दौरान जात्रा के कपड़े बनाना अब एक पारिवारिक परंपरा बन गई है। यह परिवार की आय का एक स्त्रोत है। हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। टीवी और इंटरनेट के आने के बावजूद, जात्रा रामलीला ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी धार्मिक अपील के कारण जिंदा है। इसी से हम अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं।" हरिपुर गांव की एक जात्रा ड्रेसमेकर अन्नपूर्णा साहू ने गाँव कनेक्शन को बताया। वह जगन्नाथ स्वयं सहायता समूह में सचिव के पद पर भी काम करती हैं।

ओडिशा आजीविका मिशन के जाजपुर जिला परियोजना प्रबंधक प्रशांत पाधी से सम्पर्क करने पर उन्होंने बताया इस परियोजना ने महिलाओं को वित्तीय स्वायत्तता हासिल करने में मदद की है, जिसका पहले हरिपुर और नरसिंहपुर के सिर्फ पुरुष पोशाक निर्माता ही मजा लेते थे।

रामलीला जात्रा के एक सीजन में साहू लगभग 10 हजार रुपये से 30 हजार रुपये तक कमाती हैं। अन्नपूर्णा के अनुसार, उनके समूह की 50 महिला सदस्य जात्रा कलाकारों के पहनने के लिए अलग-अलग पोशाक बनाने में लगी हुई हैं।

साहू ने बताया, "दो साल पहले, सरकार द्वारा प्रबंधित ओडिशा आजीविका मिशन के अधिकारियों ने हमें गाँव में जात्रा पोशाक बनाने की इकाई लगाने के लिए एक लाख रुपये की ऋण राशि प्रदान की थी।" उन्होंने बताया, "हम राधा, कृष्ण, राजा, रावण, राम, सीता, हनुमान और अन्य पौराणिक पात्रों के लिए पोशाक बनाते हैं। हम कोट, मुकुट, रंगीन छतरियां, टोपी और सामान भी बनाते हैं।"

हरिपुर गाँव की एक जात्रा ड्रेस मेकर समरेंद्र साहू ने गाँव कनेक्शन को बताया उनका पूरा परिवार पूरे चार महीने से सिलाई में लगा हुआ है।

समरेंद्र ने कहा "जात्रा बंद होने के कारण हम पिछले दो वर्षों से कोई अतिरिक्त आय अर्जित नहीं कर सके। अब, मैं अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ जात्रा के राजाओं और सैनिकों के लिए कपड़े बनाने का काम कर रहा हूं। हम इस समय मुश्किल से सो पाते हैं, जात्रा हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने का अवसर प्रदान करता है।"

महिला पोशाक निर्माताओं को सरकारी मदद

जाजपुर जिले के नरसिंहपुर गाँव की रहने वाली कल्पना नायक ने गाँव कनेक्शन को बताया, "राज्य सरकार की योजना के तहत अधिक से अधिक महिलाएं स्वतंत्र पोशाक निर्माता के रूप में काम करने के लिए आगे आ रही हैं और अपने आप को सशक्त बना रही हैं।"

ग्रामीण महिलाएं जो स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं, जात्रा कलाकारों के लिए पोशाक बनाती हैं।

नायक ने कहा, "यह साल का एकमात्र समय है जब उनके बनाए प्रोडक्ट अच्छी तरह से बिकते हैं। एक जात्रा पोशाक निर्माता महीने भर चलने वाले रामलीला उत्सव के दौरान लगभग 10,000 रुपये से 30,000 रुपये तक कमाती है।"

ओडिशा आजीविका मिशन के जाजपुर जिला परियोजना प्रबंधक प्रशांत पाधी से सम्पर्क करने पर उन्होंने बताया इस परियोजना ने महिलाओं को वित्तीय स्वायत्तता हासिल करने में मदद की है, जिसका पहले हरिपुर और नरसिंहपुर के सिर्फ पुरुष पोशाक निर्माता ही मजा लेते थे।

अधिकारी ने गाँव कनेक्शन को बताया ,"क्षेत्र की महिलाओं और लड़कियों की मदद करने के लिए, दो साल पहले हमने 'री-जनरेशन ऑफ ट्रेडिशनल इंडस्ट्री' कार्यक्रम के तहत जात्रा कलाकारों के लिए वेशभूषा बनाकर लगभग 50 महिलाओं को पैसा कमाने में मदद करने के लिए हरिपुर और नरसिंहपुर में महिला स्वयं सहायता समूह और निर्माता समूह बनाए।"

उन्होंने बताया, "ओडिशा आजीविका मिशन इन महिला स्वयं सहायता समूहों को बड़े बाजारों से सीधे जोड़कर उनकी मदद कर रहा है।"

अंग्रेजी में पढ़ें

अनुवाद: मोहम्मद अब्दुल्ला सिद्दीकी

Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.