पंकज त्रिपाठी: मेरा सबसे बड़ा डर है कि मैं खुद से बोर न हो जाऊं

पंकज त्रिपाठी: मेरा सबसे बड़ा डर है कि मैं खुद से बोर न हो जाऊं

पिछले दिनों देश के सबसे चहेते स्टोरीटेलर नीलेश मिसरा के 'द स्लो इंटरव्यू विद नीलेश मिसरा' शो में पंकज त्रिपाठी ख़ास मेहमान बने। साल 2004 में आई फिल्म 'रन' से बॉलीवुड में अपने करियर की शुरुआत करने वाले पंकज त्रिपाठी आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। हाल में आई वेब सीरीज 'मिर्ज़ापूर' ने उनके अभिनय को नये मुकाम पर पहुंचा दिया है। अब तक आप इस लंबी बातचीत के कुछ अंश आप पढ़ चुके हैं (भाग 1, भाग 2, भाग 3)मेरा सबसे बड़ा डर है कि मैं खुद से बोर न हो जाऊं, पेश है इस ख़ास इंटरव्यू का अंतिम भाग...


नीलेश मिसरा: आप शूट कर रहे हों कुछ, कुछ ऐसा मार्मिक अनुभव हुआ हो, कुछ चीज याद हो, कोई रोचक अनुभव शेयर करना चाहें आप? आपके अंदर के स्टोरीटेलर से कह रहा हूँ।

पंकज त्रिपाठी : ये जो फिल्म कर रहा हूँ ना अभी ये मेरा पहला अनुभव है। कहने के लिए... मैं कोई भरोसा नहीं करता हूँ लीड रोल और सपोर्टिंग रोल में नहीं मानता हूँ, लेकिन इस कहानी का जो मुख्य पात्र है, वो मैं कर रहा हूँ। मैं इतना इस कहानी में घुसा हुआ हूँ ना कि मुझे कॉस्ट्यूम कॉन्टिन्यूटी भी पता है। ये पहली फिल्म है जिसका मेरे को ईडी लोगों से ज्यादा मैं जानता हूँ कि कौन क्या कपड़ा पहना था। इसमें कुछ तो हम प्रयोग कर रहे हैं ऐसा न...

देखिये प्रयोग करना बड़ा जरूरी है, कई बार आपके प्रयोग असफल होंगें। उन असफलताओं के बाद भी जब किसी एक में सफलता मिलती है तो दुनिया बदल जाती है। जितने लोग जो बल्ब बनाये होंगे, जो प्लेन बनाये होंगे या जो दवाइयाँ बनाएं होंगे वो उस सफल होने के पहले दस बार असफल रहे होंगें, तो हम बतौर अभिनेता, बतौर कलाकार भी प्रयोग करते हैं। इसमें मैं एक प्रयोग कर रहा हूँ, एक एलिमेंट अभिनय में ऐड करने का... हो सकता है लोगों को बेहद पसंद आये या हो सकता है लोग ख़ारिज कर दें। चूंकि मैं बतौर अभिनेता प्रयोग करने की स्थिति में हूँ क्योंकि मेरे ऊपर बॉक्स ऑफिस का कोई दबाव नहीं है। ना मैं हिट हूँ। जब आप हिट नहीं हैं तो आपको फ्लॉप होने का डर ही नहीं होता, तो फिर आदमी बहुत सुकून में आ जाता है कि हिट-फ्लॉप से हम ऊपर हैं, छोड़ दो, जीवन जीना है... बस...

और किस्सा मैं भूल गया क्या पूछा था, किस्सा... किस्सा...





नीलेश मिसरा: न्यूटन कहाँ शूट किया?

पंकज त्रिपाठी : छतीसगढ़ में, एक छोटा सा कस्बा है दल्ली राजहरा! कच्चा लोहा निकलता है वहाँ पर। वहाँ हम लोग रुके थे, कोई होटल भी नहीं था। बामुश्किल दस कमरे का एक छोटा सा होटल मिला, और अलग-अलग जगहों पर, रोज वहाँ से जंगल में दस किलोमीटर जाते थे और शाम को शूटिंग करके लौट आते थे।

नीलेश मिसरा: लिखते हैं?

पंकज त्रिपाठी : ना

नीलेश मिसरा: लिखना चाहेंगे?

पंकज त्रिपाठी : लिखना मुझे लगता है मेरे लिए मुश्किल काम है। मैं बोल सकता हूँ, लिखने बैठता हूँ तो कुछ नहीं सोच पाता हूँ, लेकिन घंटों बातें कर लूँगा। लिखना मुझे लगता है अच्छा लिखना चाहिए, अच्छा लिखने में, शब्द ढूँढने में और वाक्य कैसे बनें इसी में उलझा रह जाता हूँ मैं। बोलने में, मेरी बातचीत में आपको व्याकरण की बहुत कमी मिलेगी। अभिनय में भी मैं जानता हूँ और अटेम्प्ट करता हूँ कि जब तक मैं किसी उर्दू या हिंदी के स्कॉलर का रोल नहीं कर रहा हूँ तब तक मैं व्याकरण पर, और उच्चारण पर ध्यान उतना नहीं दूँगा।

नीलेश मिसरा: बिल्कुल स्वाभाविक है।

पंकज त्रिपाठी : क्योंकि हमारे मुल्क में अगर हिंदी/उर्दू का स्कॉलर है तो उससे तो अपेक्षित है कि आप सही बोलें। मेरा मकसद ये होता है कि यार मूल भाव जो है ना वो पहुँच जाए। भाषा इसमें बाधा न बने। हालांकि दसवीं तक गाँव में था तब तो मुझे पता ही नहीं था। जब नुक्ते के साथ पहली बार अनुभव हुआ... एक खान साहब थे नाटक में, तो बोले देखो क्या है वहाँ पर ज के नीचे क्या है? मैं बोला कुछ नहीं है। वो बोले फिर से देखो। मैं बोला सर कुछ नहीं है। बोले देखो है कुछ। मैं बोला थोड़ा स्याही गिर गयी है शायद, हल्की सी स्याही गिरी हुई है।

वो सिर पकड़ लिए कि ये तो बोल रहा है स्याही गिरी हुई है। मुझे मालूम ही नहीं था कि ये नुक्ता पुक्ता क्या होता है। हमारे तो एक ही स होता है, दंत स। हम भी एबीसीडी ये छठी क्लास में पढ़े थे। अब लगता है कि नहीं यार गुरु थोड़ा ठीकठाक स्कूल में पढ़ लिए होते, फिर लगता है कि नहीं, जो ताकत आई है, जो क्षमता आई है अगर ठीकठाक स्कूल में पढ़े होते तो नहीं आती।

नीलेश मिसरा: अगर ये फाउंडेशन नहीं होती तो आप उस दुनिया से उन टर्म्स पर बात नहीं कर पाते। आपका सीमेंट जो है ना इस जमीन का है... इन लोगों का अनुभवों का अपना महत्व है। कोई ऐसा पात्र आपके निभाये पात्रों में जो आपके साथ रहा हो। आपको सबसे प्रिय हो?

पंकज त्रिपाठी : सब, ऑलमोस्ट सब....





नीलेश मिसरा : सर अब मैं आपसे थोड़ा पत्रकार वाला, मतलब फिल्मी सवाल पूछ रहा हूँ लेकिन मेरे लिए जानना रोचक है...

पंकज त्रिपाठी: गुडगाँव एक फिल्म है, वो करते हुए मुझे मजा आया था। उसमें बहुत मेहनत की थी। बाकी तो सब... जो भी रोल हम करते हैं न सर वो दो-तीन महीने जिस वक्त वो चल रहा होता है वो हमारे साथ होता है, बाथरूम में भी साथ होता है। चौबीस घंटा दिमाग में वही रहता है कि यार वो सीन में कैसे करेगा? ऐसा भी हो सकता है वैसा हो सकता है। सब सोचने के बाद किरदार के बारे में, जब मैं शूटिंग पर जा रहा होता हूँ, कैमरे के पास, तो मुझे कुछ पता नहीं होता है कि करूँगा कैसे? सोच तो लिया है कि ऐसा हो सकता है, वैसा हो सकता है। पर होगा कैसे? और वहाँ जाते हैं पहले टेक में देखते हैं, ऐसे हो गया। रिटेक हुआ फिर हो गया। मुझे भी ठीक से पता नहीं है। मैं अभिनय के बारे में बहुत बातें करता हूँ, पर मैं अभिनय के बारे में दरअसल बहुत कुछ जानता नहीं हूँ। बहुत अभी पढ़ना बाकी है।

मुझे गोर्की के उपन्यास, कहनियाँ बड़े अच्छे लगते हैं। मुझे लगता है कि उनकी भावनाएं, मेरे बचपन में, मेरे उस विश्वविद्यालय में और मेरे गाँव की भावनाएं हैं। अंतर सिर्फ़ सर्दियों का है। वहाँ क्रिसमस मनाई जाती है और बर्फ़ गिरती है, मेरे गाँव में क्रिसमस, बर्फ़ और वो क्रिसमस ट्री नहीं होता है, बाकी भावनाएं वही हैं। एक बार जर्मनी से कहीं जा रहा था ट्रेन में... मेरा बहुत ड्रीम था, जैसे आपके यहाँ टाइल्स पर बैठना था, वैसे ही यूरोप के गाँव में ट्रेन से घूमना क्योंकि मैं वो लकड़ी की ट्रेन में चढ़ा हूँ जो अभी बता रहा था। क्या जीवन जिया है न, उपन्यास टाइप का जीवन है, तो वही लकड़ी की ट्रेन में एक बच्चा बैठा सोच लिया होगा, कोई अखबार में पढ़ लिया होगा। पता नहीं कहाँ आई पर ये बात थी कि यूरोप के ट्रेन में घूमना है। अब थी दिमाग में तो हमको लगा चलो!

तो छोटे से स्टेशन पर गाँव खेड़े में घूम रहे थे और मध्यम स्पीड की ट्रेन थी। पर अंतर यही था न कि वहाँ लोग गोरे हैं, प्लेटफार्म पर पेपर नहीं बिखरे हुए हैं। प्लेटफार्म पर ट्रेन रुक रही है, पर रुकने की जरूरत भी नहीं थी। कोई चढ़ने वाला आदमी ही नहीं है। रुकी तो बामुश्किल आठ बोगियों में से एक आदमी उतरा, और दो कोई चढ़ गये, लेकिन जो उतर रहा था उसको लेने एक औरत खड़ी थी। वो ऐसे ही आँखें भरके मिल रही है अपने बच्चे को छोड़ते हुए या अपने पति को छोड़ते हुए। हमको लगा ये रोना सेम ही तो है। रंग अलग है। ये रत्त्नसराय और बिस्वा का स्टेशन नहीं है लेकिन भावनाएं तो वही हैं, ये भी बच्चे को छोड़ने में रो रही है, वो आदमी ट्रेन आगे बढ़ती है तो खिड़की से निकलके पीछे देख रहा है। ऐसे ही तो हम देखते थे, जब बाऊजी प्लेटफार्म पर खड़े हैं, हम जा रहे हैं।

नीलेश मिसरा : बिल्कुल! हम लोग जो कहानियाँ डॉक्यूमेंट कर रहे हैं अब अपनी पत्रकारिता के माध्यम से। जैसे अभी एक कानपुर में शहनाई वादक की कहानी थी। वो आँखों की तकलीफ... बाप बेटे की कहानी थी वो।

पंकज त्रिपाठी : मैंने देखी है सर। कमाल की कहानी थी। अरे आप लोग किये थे, बधाई के पात्र हैं आप। वो कहानी देखी है मैंने, और जब सुनी थी मैं रुक सा गया था उस दिन। मेरे साथ का एक किस्सा है। मैं पटना में एक साल तक, डेढ़ साल तक 'नगर में आज' एक कॉलम आता है अखबारों में, वो जो सांस्कृतिक कार्यक्रम उसमें दिखता था मैं वहाँ जाता था। कुछ भी कार्यक्रम हो चाहे... एक दिन कोई शहनाई वादन होगा बिस्मिल्ला खान का, मगध महिला कॉलेज में, बस शाम को साइकिल उठी, मगध महिला पहुँच गये, समय से पन्द्रह मिनट पहले। बैठा, पहली बार शहनाई सुन रहा हूँ, बिस्मिल्ला खान बजा रहे हैं, कुछ पता नहीं है संगीत के बारे में, शहनाई के बारे में। और सुना, डेढ़ घंटा। मेरे आस-पास सब बुजुर्ग लोग बैठे हैं, इकलौता मैं 22 साल का लड़का। और वो सब खादी और अच्छा सिल्क पहने, लोग जो संगीत की समझ रखते हैं, शहर के समृद्ध लोग, उनमें मैं एक साइकिल से आया हुआ, हवाई चप्पल पहन के एक बच्चा है जो बीच में बैठा हुआ है। और सुना डेढ़ घंटे उनको बजाते हुए, बड़ा आनंद आया, समझ कुछ नहीं आई।

भोपाल में मैं एक सुबह शूटिंग कर रहा था, होटल में रुका था। अख़बार दरवाजे के नीचे से डाला गया और मैं गया अखबार को उठाया। हिंदी अखबार और एक अंग्रेजी अखबार। दोनों अखबार मैं मंगाता हूँ, तो पहली हेडलाइन पर बिस्मिल्ला खान नहीं रहे। और मैं दरवाजे पर रोने लगा। हमको लगा अरे ये कैसे? फिर मैं रोने लगा, दस मिनट बाद रियालाइज हुआ कि मैं रो क्यूँ रहा हूँ। मेरा उनसे क्या नाता है। मैं तो सिर्फ़ सुना हूँ एक बार।

यूँ ही बता रहा था मैं किस्सा, क्योंकि शहनाई पर किस्सा शुरू हुआ।




नीलेश मिसरा: ये कमाल की बात है कि आप एक ऐसे व्यक्ति की बात कर रहे हैं, जिससे ना आप मिले और न मैं। और इस वक्त न सिर्फ़ आपकी हम दोनों की आँखों में आंसू आये। ये जो संवेदना है न जो एक करंट की तरह ट्रेवल करती है, ये जो कहानियाँ हैं जिन्हें हम यूनिवर्सल स्टोरीज बता पा रहे हैं। हाल ही में एक हमने किया। कानपुर में गंगा के किनारे आते हैं अध्यापक, अलग-अलग चीजें कर रहे हैं और वो गरीब बच्चों को पढ़ाते हों। पढ़ा क्या रहे हैं, कभी फ्रेंच पढ़ा रहे हैं, कभी संस्कृत पढ़ा रहे हैं, उनकी कहानी। अब हम ये करना शुरू कर रहे हैं कि जो आपने एग्जैक्टली बताया कि जर्मनी के उस रेलवे स्टेशन पर इमोशन वही था तो ये कहानी जर्मनी के किसी दर्शक को हम क्यूँ नहीं दिखा सकते। वो हमारी अब कोशिश है। कहीं ना कहीं आपका भी काम रहा है और अब हो रहा है जो, जो एक स्टार वैल्यू या एक निश्चित मार्केट के अंदर कैद नहीं है। जैसा आप बता रहे हैं कि न्यूटन दुनिया के किसी भी कोने में इंसान देख सकता है। उससे रिलेट कर सकता है। एक बार क्या हुआ मैंने किसी रेडियो स्टेशन में काम शुरू किया था तब कहा गया, दूसरा नीलेश मिसरा लाओ। उसने एनाउंस किया तो वहाँ के लड़कों ने मुझे आकर बताया कि सर ऐसा बोल रहे हैं। देखो आवाज तो ले आयेंगे, कहानियाँ भी ले आयेंगे, तकलीफ कहाँ से लायेंगे।

पंकज त्रिपाठी: दूसरा नीलेश मिसरा हो ही नहीं सकता है सर।

नीलेश मिसरा : शुक्रिया, शुक्रिया।

पंकज त्रिपाठी : जैसे दूसरा पंकज त्रिपाठी नहीं हो सकता है, दूसरा ये भाई जो बैठा है ये नहीं हो सकता है। इस पृथ्वी पर मेरा मानना है ना की जितने लोग हैं वो ओरिजनल हैं और अकेले हैं। उनको जरूरी है अपनी ओरिजनैलिटी पहचानने की, कि मेरा मूड क्या है।

एक लड़का जो कहता है कि मुझे अभिनेता बनना है और मुझे शाहरुख़ खान पसंद हैं, उनको देखकर वो इंस्पायर्ड होता है तो शुरुआत उनकी नकल से हो सकती है। वो जैसा करते हैं वैसा करेगा। अगर वैसा ही करता रहेगा तो उसका कुछ नहीं होगा क्योंकि वो तो ओरिजनल हैं, बहुत बड़े रूप में हैं वो, तो उनको देखकर प्रेरणा ले सकते हैं लेकिन फिर हमें अपना ढूंढना पड़ेगा कि हम कौन हैं, हमारा मूल किधर है। आप हम अकेले ही हैं, दूसरा हो ही नहीं सकता कोई, तो हमारी लड़ाई किसी से नहीं है, अपने आप से है और बेहतर होने की।

नीलेश मिसरा : मेरा सबसे बड़ा डर है कि मैं खुद से बोर न हो जाऊं।

पंकज त्रिपाठी : मेरी बातें, इंटरव्यूज मैं देखता हूँ आजकल यू ट्यूब पर बड़े लड़के देखते हैं और बहुत पंसद करते हैं। खूब बातें होती हैं, अरे ये आदमी कमाल बोलता है, तो कई दिन मुझे लगा कि मैं तो सोचने लगा हूँ बातें इंटरव्यू के लिए कि मैं कैसे क्या बोलूँगा। मैं उसके लिए कंटेंट खोज रहा हूँ। मैंने कहा अरे ये क्या कर रहे हो तुम? दिमाग को खराब होने में टाइम नहीं लगता। लगता है कि आप हिट हो रहे हैं, लोग पसंद कर रहे हैं तो आप... पर उसके लिए भी मुझे नहीं जरूरत है बातें खोजने की। मेरे जीवन में इतना अनुभव है कि मुझे बातचीत के लिए कंटेंट ढूँढने की जरूरत नहीं है।

नीलेश मिसरा : वन लाइनर ढूँढने की जरूरत नहीं है।

पंकज त्रिपाठी : नहीं है।

नीलेश मिसरा : वही तो मैं बता रहा था कि मैंने मण्डली में एक राइटर से पूछा कि बाजार के लिए तो नहीं लिखने लग गये हो। अन्तः सुखाय! अपने लिए लिख रहे हो तो लिखो, वो करोड़ों लोग जो सुन रहे हैं उसमें अपनी तकलीफ देख रहे हैं, बाजार के लिए जब लिखने लगोगे तब फर्जी लगने लगेगा। वही कि रोते हो या नहीं, छोटे बच्चे को देखकर हंसी आती है या नहीं। भीड़ में होते हो और छोटे बच्चे को देख लेते हो तो इरीटेशन महसूस होता है या कहीं जुड़ाव महसूस होता है। कहीं आपके अंदर कुछ जिन्दा है या बस एक इनवॉइस के लिख रहे हो कि महीने एंड में इनवॉइस भेजना है।

पंकज त्रिपाठी : जीने के लिए जीना है कि ईएमआई के लिए जीना है! बहुत सुंदर गाँव है आपका!

नीलेश मिसरा : बहुत शुक्रिया आपका...

पंकज त्रिपाठी : मजा आ गया, धन्यवाद! और मिलते रहेंगे...


(प्रस्तुति: दीक्षा चौधरी)


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