पंकज त्रिपाठी: लोग नहीं जानते, मैं बहुत बढ़िया स्टोरीटेलर हूं

पंकज त्रिपाठी: लोग नहीं जानते, मैं बहुत बढ़िया स्टोरीटेलर हूं

गैंग्स ऑफ वासेपुर, स्त्री, न्यूटन, बरेली की बर्फी, मसान जैसी सुपरहिट फिल्म और हालिया रिलीज वेब सीरीज मिर्जापुर में शानदार एक्टिंग की छाप छोड़ने वाले पंकज त्रिपाठी आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। हाल में जब वे लखनऊ आये तो लखनऊ से लगभग 60 कि.मी. दूर गाँव कुनौरा में देश के सबसे चहेते स्टोरीटेलर नीलेश मिसरा से उन्होंने लंबी बातचीत की। 'स्लो इंटरव्यू विद नीलेश मिसरा' में अब तक इस लंबी बातचीत का पहला भाग और दूसरा भाग आप पढ़ चुके हैं, पेश है तीसरा भाग ...

नीलेश मिसरा : डायरेक्ट करना चाहते हैं?

पंकज त्रिपाठी : हाँ, मैं डायरेक्ट भी कर सकता हूँ। अच्छा अभी एक चीज मेरी बहुत लोगों को नहीं मालूम है, मैं खुद भी एक बहुत बढ़िया स्टोरीटेलर हूँ।

नीलेश मिसरा : अरे वाह!

पंकज त्रिपाठी : मेरे पास अथाह कहानियाँ हैं गाँव की। रेणु जी इसीलिए मुझे पसंद हैं। मेरी सास एक हैं वो भी एक बहुत अच्छी स्टोरीटेलर हैं। एक कहानी को मैं चार महफ़िलों में सुनाता हूँ, तो कोई एक बन्दा गलती से मिल गया जिसने पहली महफ़िल में सुनी थी और तीसरी में मिल गया। वो कहता है नहीं... नहीं... वहाँ तो ऐसे हुआ था। मैंने कहा अच्छा कहाँ? तो वो बोला वो वहाँ तुम सुनाये थे। मैंने कहा अच्छा ओके, तो मेरी कहानियाँ ना ऑडियंस पर डीपेंड होती हैं कि अगर मैं बुद्धिजीवियों के बीच बैठा हूँ तो कहानी को वैचारिक बना दूंगा। पहलवानों के बीच बैठा हूँ तो कहानी को ताकतवर बना दूंगा। अगर ह्यूमर पसंद वाली ऑडियंस है तो ह्यूमर वाले एलिमेंट थोड़े ज्यादा हो जायेंगे।


नीलेश मिसरा : क्या आप स्टोरीटेलर को स्टोरी सुनाना चाहेंगे?

पंकज त्रिपाठी : ऐसी बहुत सारी कहानियाँ हैं। एक ना मेरे अपने गाँव से सात किलोमीटर दूर रत्नसराय एक छोटा सा रेलवे स्टेशन है। जहाँ से छोटी लाइन की गाड़ियाँ चलती थीं पहले, अब बड़ी लाइन शुरू हो गयी इस साल से, तो उसमें हम लोग बैठकर जाते थे थावे-बरौनी एक ट्रेन हुआ करती थी, जो सुबह साढ़े तीन बजे आती थी, थावे से लेकर बरौनी तक जाती थी, हाजीपुर मुझे उतरना था, पटना जाने के लिए।

तो घर से सुबह तीन बजे, चार चालीस की ट्रेन होती थी तो तीन बजे मैं बाबूजी, साइकल पर थोड़ा चावल, गेहूँ, दाल, सरसों का तेल दो लीटर घर का लादकर बाबूजी और हम साइकिल पर ऐसे पैदल-पैदल सात किलोमीटर चले गये स्टेशन, ट्रेन पकड़ी।

ट्रेन में बामुश्किल एक बोगी के अंदर दो ही बल्ब जलते थे, या तो एक बीच में एक उस दरवाजे पर या पिछले दरवाजे पर और चार चालीस पर थोड़ा अँधेरा रहता ही है। उस कम रोशनी वाले लोकल ट्रेन में जिसमें पूरा कम्पार्टमेंट लकड़ी का है, गद्दा नहीं होता था स्लीपर्स पर, लकड़ी के बेंच होते थे दो नीचे दो ऊपर। उनमें सफ़र करते थे हम। बीच में कोई मूंगफली वाला आ गया, कैसे-कैसे लोग आ गये, कोई बकरी लेकर चढ़ गया, कोई साइकिल लेकर चढ़ गया। साइकिल को ऐसे पलटकर उधर खिड़की पर हैंडल फँसा दिया, रुमाल से बाँध दिया, तो कितने किस्से दिखते थे उस ट्रेन की यात्रा में, बहुत...

मैं चाहता हूँ मैंने जो अनुभव किये हैं मेरी बेटी को वो सारे अनुभव करवाऊं, उसको वो दुनिया दिखा दूँ। सारे बच्चों को वो अनुभव होना चाहिए जो हमारे आपके पास है। जैसे हम अभी स्कूल में भी बात कर रहे थे कि हमने यहाँ की भी जिन्दगी जी ली, अनुभव देख लिया। हम बाहरी दुनिया में, फिल्म फेस्टिवल में जाते हैं तो वो भी देख लेते हैं। जैसा अक्सर मुझे लगता है कि हमारे देश में साउंड पॉल्यूशन, ये हॉर्न बजाने की समस्या खत्म हो जाएगी अगर हर भारतीय को हम यूरोप में या सिंगापुर घूमने भेज दें कि तुम एक हफ्ते इस कंट्री में रहो, और उन्हें ये रियलाइज होगा कि अरे यार क्यूँ मारते हैं हम लोग इतना हॉर्न?

नीलेश मिसरा : कोई पैदल जा रहा है उसके लिए इतनी इज्जत... आप रोक देंगे, आप लाइट के गुलाम नहीं हैं। अगर पैदल जा रहा है तो आप रोक देंगे, उसका अधिकार है ये।

पंकज त्रिपाठी : मुझे लगता है घूमना भी ना... हम संसार में घूमते हैं तो बहुत कुछ सीखते हैं, तो वही जो अनुभव हमारे आपके पास में हैं, मैं चाहता हूँ कि मेरी अपनी बेटी या दूसरे बच्चों तक भी पहुँचे वो।



नीलेश मिसरा : जाती है बेटी गाँव?

पंकज त्रिपाठी : हाँ जाती है बेटी...

नीलेश मिसरा : ये भी दुर्लभ है क्योंकि मुंबई जैसे शहर में जो बच्चा बड़ा हो रहा है, एक अलग तरह का परिवेश है, एक अलग तरीके के लोगों के साथ उठना बैठना है, लेकिन वो एक रोशनदान खुला हुआ है, उस रोशनदान से बच्चा झाँक लेता है बीच-बीच में...

पंकज त्रिपाठी : बहुत जरूरी है, बहुत जरूरी है सर... पता तो होना चाहिए न कि धरातल क्या है? आखिर जो अन्न हम लोग खाते हैं वो आता कहाँ से है? उसको पैदा करने में कितना परिश्रम जाता है। हर इंडिविजुअल को पता तो होना चाहिए। वो आप जो किस्सा बता रहे थे जब हर आदमी भारत का जान जायेगा कि अन्न की उपज कैसे होती है तो वो वेस्ट नहीं करेगा उसको।

नीलेश मिसरा : मेरा हमेशा से ये मानना रहा है। मैं हर पब्लिक प्लेटफार्म पर कहता हूँ कि बहुत बड़ा दोष हम कम्यूनिकेटर्स का रहा है कि हमने अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से नहीं निभाई, हम राइटर्स ने, चाहे जो टीवी पर हैं उन्होंने। अगर आज से चार सौ साल पहले कहा गया होता कि वो खूबसूरत काली लड़की! तो दुनिया अलग होती। लेकिन हमने नहीं कहा। हमने कहा राधा क्यों गोरी, मैं क्यों काला। और उसको रिफोर्स करते आये लगातार। ये सोचा भी नहीं कि जितनी बार हम किसी भी माध्यम पर ये कहते हैं रंग को लेकर, किसी की हाइट को लेकर, किसी के सिर पर बाल है या नहीं, उसका वजन कितना है, वो देश के किस हिस्से से आया है।

पंकज त्रिपाठी : उसकी भाषा और बाहरी रूप पर जो कमेंट करते हैं, उसको हंसी का पात्र बनाते हैं। बड़ा आसान ह्यूमर है किसी को डिफेम का टारगेट करके करना, बहुत शॉर्टकट है...




नीलेश मिसरा : उस दिन मैं सुन रहा था एक रेडियो कलाकार, एक रेडियो आरजे का जो प्रोमो था वो ये था कि यूँ तो लड़की है लेकिन... मैंने तुरंत रेडियो स्टेशन को ट्वीट किया कि आप कहना क्या चाह रहे हैं। यूँ तो लड़की है लेकिन... मतलब कहना चाह रहे थे कि ये बड़ी ऑउटस्पोकन है। या जैसे कभी-कभी हम यूज करते हैं- 'मैंने चूड़ियाँ नहीं पहन रखी हैं' मतलब जिसने चूड़ियाँ पहन रखी हैं वो कमजोर है? ये इतना शटल होता है कि कब आपके दिमाग में बैठ जाता है?

पंकज त्रिपाठी : औरत की तरह क्यों रोता है? क्या हुआ औरतों की तरह रो रहा है? वो काम मर्दों का भी होना चाहिए। सर आप भी रोइए, अगर आपको रोना नहीं आता है या रोना छिपाते हैं तो मत छिपाइये आप।

नीलेश मिसरा : तो एज कम्यूनिकेटर हमने इतने स्टीरियोटाइप जिन्दा रखे हैं, उनको बनाया, उनको सहेजा। और रियालाइज भी नहीं किया। हमने अपने शब्दों की ताकत नहीं पहचानी। बस हम कहते गये।

एक दिन हम रेस्टोरेंट में गये और वैदेही बोली- "वो देखो, मोटे अंकल बैठे हैं"

मेरी सांस रुक गयी, मैंने कहा ये कहाँ से सीखा तुमने। मैंने कहा अंकल एक तरह के होते हैं, तो इस उम्र से जब आप.....

पंकज त्रिपाठी : ट्रेन करेंगे, बतायेंगे उनको तब बात बनेगी।

नीलेश मिसरा : मैं मण्डली में भी कहता हूँ कि जब आप अच्छे इंसान होंगे, तब अच्छे राइटर बन पाएंगे। आप वही सोच लेकर आ रहे हैं और आपको पता भी नहीं है आप इतने करोड़ों लोगों को वो सुना रहे हैं उसके इन्फ्लुएंस हो रहा है।

पंकज त्रिपाठी : अगर ईश्वर ने आपकी वाणी में इतनी ताकत दी है कि आप कोई बात बोलते हैं तो पांच हजार, दस हजार, दस लाख लोग सुन रहे हैं, पढ़ रहे हैं तो आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है क्योंकि आप पीढ़ियों का निर्माण कर रहे हैं। आप कैसी कहानी सुना रहे हैं, मैं कैसा अभिनय कर रहा हूँ ये सिर्फ़ पैसा कमाने का माध्यम नहीं है, सिर्फ़ मेरे घर चलाने का। मेरी बात वहाँ तक पहुँचे कि किसी के जीवन में डार्कनेस को कम करे, या उसको बेहतर इन्सान बनाने में मदद करे वो बात। वो प्रेरणा स्रोत बने। हमारी जिम्मेदारी बड़ी हो जाती है। रास्ते में हम पत्रकारिता की बात कर रहे थे कि हमें मालूम ही नहीं है। अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है, हम हिट होने के लिए कुछ भी कर दें और हम हिट भी हो जाएं। लाखों करोड़ों भी कमा लें, पर संजय भाई एक बात बोलते हैं कि जब हम समाज से विदा हों तो हमें लगे कि हम एक अच्छे समाज से विदा हो रहे हैं। सबको रहना नहीं है, जाना है ये तय है। जाते वक्त लगे तो कि हमने एक अच्छी सोसाइटी बनाई थी। कोई मलाल नहीं है, सत्य है कि मरना ही है। जीवित रहने कोई नहीं आया है, पर जाते वक्त लगे कि हाँ यार, हम खुश हैं, हमने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया, नाऊ ओके बाय हैप्पी जर्नी! तुम अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाना। वो तो बहुत जरूरी है।

नीलेश मिसरा : अपने और साथी कलाकार जो ऐसे ही परिवेशों से आये हैं, उनके बारे में आप क्या सोचते हैं? आपके कुछ फेवरेट्स हैं, किसी की कोई बात अच्छी लगती है? कोई चीज जनरली जो आपके साथी कलाकार हैं उनमें से... किसका नाम लेना चाहेंगे आप?

पंकज त्रिपाठी : चूंकि हम रंगमंच वाले बैकग्राउंड से आये हुए लोग हैं तो वहाँ से भी बहुत लोग आये हैं...

नीलेश मिसरा : पुराना साथ रहा होगा...

पंकज त्रिपाठी : हाँ, हाँ कई लोगों को बहुत पहले से जानता हूँ मैं। मैं एक चीज महसूस करता हूँ इन दिनों कि आदमी के पास जब पैसा नहीं होता है ना तो बड़ा साहसिक होता है वो। और जब पैसे आते हैं तो वो ताकतवर हो जाता है, लेकिन वो साहस खत्म हो जाता है। मैंने ऐसे कई अभिनेताओं को देखा कि अरे आप तो बहुत साहसिक व्यक्ति हो। अभिनेता ही नहीं बाकि भी फ़ील्ड में। एडवंचरस हमें होना चाहिए, हममें साहस की कमी नहीं होनी चाहिए। साहस का पैसों से कोई लेना-देना नहीं है। पैसे आपको ताकतवर बना सकते हैं, फिर से ताकत का साहस से कोई मतलब नहीं है। ताकत उर्दू का शब्द है, साहस जो है हिंदी का है। खैर! भूल जाता हूँ का बोलने वाला था, मेरे ही विचार बीच बीच में लिंक टूट जाते हैं।

नीलेश मिसरा : लेकिन ऐसे जो लोग थे, जिन लोगों को आपने देखा कि जब मुश्किलें थी तब ज्यादा साहस हो, ज्यादा ईमानदारी हो... तो आपने लोगों को बदलते देखा है?

पंकज त्रिपाठी : हाँ, इसीलिए एक किस्सा याद आया था। क्या होता है न कि ये जो बाजारवाद है न, सक्सेस कई चीजें लेकर आती है साथ में। कई लोगों को देखा है बदलने लगते हैं, धरातल खोने लगते हैं। आये दिन मुझे लोग मैसेज करते हैं फेसबुक पर, ट्विटर पर कि आप जैसे हो वैसे ही रहना। मुझे लगता है आप लोग क्यूँ डरे हुए हैं? आप लोगों को शंका है कि मैं बदलने वाला हूँ? या 2019 तक ये आदमी ऐसा नहीं रहेगा? हमारा सॉफ्टवेयर वैसा है। गाय हमेशा गाय ही रहेगी। उसको आप एसी काउयार्ड में रख दें या ये गाँव के खेत में रखें। साँप जहर नहीं छोड़ सकता, उसकी प्रवृति है। तो मैं जैसा हूँ वैसा ही रहूँगा, लेकिन ये सक्सेस, सफलता कई बार शायद.... चूँकि हम ह्यूमन हैं और हमारे पास दिमाग नाम की चीज है जो हमें बाकी जानवरों से अलग करती है और इसको खराब होने में बहुत कम समय लगता है, तो कई अभिनेता मुझे दिखते हैं, मुझे लगता है कि अरे यार...

ये बड़ा अच्छा नाम रखा है आपने 'स्लो', मैं जीवन में ना, स्लो रहना चाहता हूँ। ठहराव रहना चाहिए। क्यूँ भागना, कहाँ भागना है? किधर उड़के जाना है। हो जाएगा सब हो जाएगा इत्मीनान से। सांस तो लें। 72 बार धड़कता है। हमें पता है कि 72 धड़कता है या चौरासी धड़कता है। छोड़ो यार हो जाएगा।

तो ये एक आपाधापी में... मुझे पता है कि सिनेमा इंडस्ट्री बहुत इनसिक्योरिटी से भरी हुई है। हर किसी को लगता है कि जो मैं आज हूँ कल रहूँगा, नहीं रहूँगा? पर फिर जीवन भी तो जीना है। छोड़ो ना सिक्योरिटी, इनसिक्योरिटी भाड़ में जाए।





नीलेश मिसरा : दोस्त खोये आपने?

पंकज त्रिपाठी : ना एक भी नहीं, बिल्कुल नहीं।

नीलेश मिसरा : लोगों के मूल्यों में पतन होते देखा है?

पंकज त्रिपाठी :हाँ मूल्यों में पतन होते देखा है। और मन थोड़ा व्यथित भी हुआ कई बार। फिर लगा कि शायद इन्होंने वैसी किताबें नहीं पढ़ी थी जैसी मैंने पढ़ीं हों।

नीलेश मिसरा : ऐसे लोगों की संगत में नहीं रहे...

पंकज त्रिपाठी : हाँ, वैसे लोगों की संगत में नहीं रहे हैं तो इसलिए इनमें गिरावट हो गयी। मैं अक्सर बोलता हूँ कि जिन्दगी एक वो हिसाब है जिसको आप पीछे जाकर ठीक नहीं कर सकते, तो पिछले को अनुभव समझ लो और आज से बेहतर हो लो। जो भी होता है आदमी के जीवन में वो कुछ ना कुछ तो अनुभव देकर जाएगा ही। इन्होंने वैसी किताबें नहीं पढ़ीं, वैसे लोगों की संगत में नहीं रहे तो हो सकता है कि दो साल बाद उनको रियलाइज हो और ये बेहतर व्यक्ति बन जाएं। और अक्सर मुझे ये सब बातें, हर दिन मुझे अहसास होता है कि मैं कितना तुच्छ हूँ। कितनी कम जानकारी है मुझे। आपके पिताजी यहाँ 73 में 72 में स्कूल खोलने का सोच लिए... ग्रामीण विद्यालय। कैसे ये नाम आया होगा? मैं किसी किसी लेखक को सुनता हूँ...

अभी अमेरिका में चुनाव हो रहे थे तो वहाँ की कोई खबर पढ़ रहा था। कोई स्टेट है जहाँ पर वैश्यावृति लीगल है। वहाँ जो चुनाव जीता है वो ब्राथल चलाते थे तीन चार। और वो जीतने के आसपास मृत पाए गये अपने ही उसमें। मुझे लगा ये दुनिया कहाँ है? मैं क्यों नहीं जानता था? फिर मैं पढ़ने लगा अमेरिका के बारे में, उस शहर के बारे में। मैं मानचित्र देखता हूँ सर, और फिर पढ़ने लगता हूँ,खोजने लगता हूँ कि ये जगह क्या है? आपके यहाँ एक नदी जाती है... शारदा नदी यहाँ से। आगे जाकर वो घाघरा में मिल जाती है और वहाँ से घाघरा नाम है। घाघरा अलग से आ रही है, तो मुझे लगता था कि दो नदियाँ मिलती हैं, तो एक का नाम खत्म हो जाएगा, दूसरी का शुरू रहेगा ये किस आधार पर तय होता है? मुझे अब ये जानना है।

नीलेश मिसरा : वाह! कवि जिन्दा है आपके अंदर। बहुत बड़ी बात है ये... ऐसी चीजें आपको व्यथित करती हैं, कहीं कुछ चुभती हैं... वो देखिये चिड़िया उधर...

पंकज त्रिपाठी : अद्भुत! अद्भुत पंक्ति है... पंख इनके.... एक कविता थी कि

"नीड़ न दो टहनी का,

चाहे आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो,

लेकिन पंख दिए हैं तो

आकुल उड़ान में विघ्न न डालो" दसवीं में पढ़ी होगी। कि जैसे चिड़िया उड़ने के लिए बनी है, उनको आप थ्री बीएचके का घोसला दे दीजिये, एसी के साथ तो वो परेशान हो जाएगी। वैसे ही हम मानव चलने के लिए बने हैं। हमने चलना छोड़ दिया। ईश्वर को क्या मालूम था कि ये लोग गाड़ी बना देंगे। और ये चलेंगे नहीं। हम तो बने चलने के लिए हैं। जैसे चिड़िया उड़ने के लिए बनी है।

नीलेश मिसरा : ईश्वर को क्या मालूम था कि ये लोग गाड़ी बना देंगे, ब्यूटीफुल!

पंकज त्रिपाठी : मैं तो सर खूब पैदल चलता हूँ। जहाँ शूटिंग करूँगा उस इलाके में इर्द-गिर्द मुझे सब जानना है, पैदल घूमना है कि यहाँ क्या है, यहाँ सब कैसा है? मेरा बड़ा मन है, यहाँ दो नेशनल पार्क हैं नेपाल में, यहाँ से करीब... दुधवा और एक और है।

नीलेश मिसरा : चितवन?

पंकज मिसरा : चितवन तो थोड़ा आगे है, एक और है उसका नाम भूल गया हूँ मैं। मेरा मन है कि उस जंगल में भी जाकर एक दिन घूम आऊँ। ऐसे ही जंगल में पगडंडियों पर पैदल चलना है, पाँच छः किलोमीटर वॉक हो जाए।

आप पैदल चलियेगा रोज दस किलोमीटर, ना शुगर होगा, न बी.पी. होगा, कुछ नहीं होगा क्योंकि ईश्वर ने तो गाड़ी वही बनाई थी कि पैदल चलेगा आदमी। कम्पनियाँ जूते बनाती हैं पैदल चलने के लिए, हम जूता पहनकर गाड़ी में बैठ जाते हैं।

(प्रस्तुति: दीक्षा चौधरी)


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