जन्मदिन विशेष : कभी कांच की बोतल से तो कभी ट्रक की बेयरिंग से बनाते थे संगीत ऐसे थे पंचम दा

जन्मदिन विशेष : कभी कांच की बोतल से तो कभी ट्रक की बेयरिंग से बनाते थे संगीत ऐसे थे पंचम दासंगीत निर्देशक आरडी बर्मन।

लखनऊ । राहुल देब बर्मन, भारतीय संगीत का वो नाम, जो इतने सालों बाद भी सम्मान और अदब से लिया जाता है। पंचम दा का नाम जितना संगीत से भरा है, ज़िन्दगी भी उतने ही संगीत के तरानों से भरी है। बॉलीवुड गीतों को शायद ही किसी और संगीत निर्देशक ने इतनी यादगार धुनें दी होंगी, जितनी पंचम दा ने दी हैं। आइये, जानते हैं संगीत के महान निर्देशक पंचम दा को।

यूं ही नहीं पड़ा आरडी बर्मन का नाम पंचम

राहुल बचपन में हर शब्द को 'प' अक्षर से शुरू करते थे। इस कारण अभिनेता अशोक कुमार ने उनका नाम पंचम रख दिया।

पंचम दा के ऊपर अपने पारिवारिक सांगीतिक घराने का गहरा प्रभाव हुआ। महज़ नौ साल की उम्र में सचिन ने 'ऐ मेरी टोपी पलट के आ' का संगीत लिखा, जिसे पिता सचिन देब ने 1956 में आई फिल्म फंटूश में इस्तेमाल किया। गुरुदत्त की फिल्म 'प्यासा' का 'सर जो तेरा चकराए' गाना तो आप सबने सुना होगा। उसका संगीत पंचम दा ने बचपन में तैयार किया था।

पंचम दा ने उस्ताद अली अकबर ख़ान से सरोद और समता प्रसाद से तबले की शिक्षा ली और सलिल चौधरी को अपना गुरू स्वीकार किया।पंचम दा ने अपना संगीत अधिकतर किशोर कुमार, पत्नी आशा भोंसले और लता मंगेशकर के साथ किया है।

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कंघे से बनाया मेरे सामने वाली खिड़की' का संगीत

पंचम दा की धुनों का अंदाज़ बहुत निराला है, जो उन्हें अपनी फेहरिस्त के सभी संगीत निर्देशकों से अलग लाकर खड़ा करता है। पंचम दा ने बाँस की डंडियों को बजाकर, रेत कागज़ को रगड़कर, शराब की बोतलों को बजाकर संगीत निकाला। 1968 में आई फिल्म 'पड़ोसन' के 'मेरे सामने वाली खिड़की में' का संगीत कंघे को घिसकर निकाला। 1973 में आई फ़िल्म 'यादों की बारात' के 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' का संगीत कप और सॉसर से पैदा किया है।

एक पत्रकार के मुताबिक फिल्म डार्लिंग डार्लिंग के गाने 'रात गई बात गई' में एक थाप को पंचम दा ने अपने साथी अमृतराव कातकर की पीठ को बजाकर पैदा किया है। इस गाने का संगीत देते वक्त बर्मन ने अमृतराव को अपनी शर्ट उतारने के लिये कहा, जिससे कातकर परेशान और व्यग्र हो गए। गनीमत यह है कि इस थाप का कोई रीटेक नहीं लेना पड़ा। नहीं तो कातकर की पीठ का क्या हाल होता।

यहाँ से मिली पंचम दा के संगीत को पहचान

पंचम दा को संगीत निर्देशक के रूप में पहचान 1966 में आई फिल्म 'तीसरी मंज़िल' से मिली। पंचम दा इसका श्रेय शायर मजरूह सुल्तानपुरी को देते हैं। इस फिल्म के सभी गाने मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे। सभी गानों को मोहम्मद रफ़ी ने गाया, जिसमें चार गानों में आशा भोंसले ने पार्श्वगायिका के रूप में उनका साथ दिया। 1969 में आई फ़िल्म 'आराधना' के 'मेरे सपनों की रानी' और 'कोरा कागज़ था ये मन मेरा' के संगीत का श्रेय पंचम दा ने अपने पिता सचिन देब बर्मन को दिया। पिता की तबीयत खराब होने के चलते ये संगीत पंचम दा ने पूरा किया।

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तलाक के बाद पटरी पर लौटी पंचम की ज़िन्दगी

पंचम दा ने पहली शादी रीता पटेल से 1966 में की। लेकिन इनका प्यार ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सका और 1971 में दोनों का तलाक़ हो गया। तलाक़ के ग़म में 1972 में आई फिल्म 'परिचय' के 'मुसाफिर हूँ यारों' का संगीत पंचम ने एक होटल में बैठ कर तैयार किया।

तलाक़ के नौ साल बाद 1980 में पंचम ने अपना परिवार दोबारा बसाया। पार्श्वगायिका आशा भोंसले, जो कि उनकी बहुत अच्छी दोस्त और साथी थीं, अब उनकी धर्मपत्नी बनीं। उनकी और पंचम दा की जुगलबंदी ने बॉलीवुड को कई सुपरहिट गाने दिये। लेकिन जीवन के आखिरी दौर में दोनों साथ-साथ नहीं रहे।

सपने में आता था बर्मन को संगीत

पंचम दा को संगीत से इतना लगाव था, कि वह सपने में भी संगीत की धुनें बनाते थे। फिल्म 'हरे रामा, हरे कृष्णा' में 'काँचा रे काँचा रे' का पूरा संगीत उन्होंने सपने में ही तैयार किया है। एक पत्रकार को इंटरव्यू देते वक्त उन्होंने बीच में ही इंटरव्यू छोड़ दिया। वे अपने साथी बबलू दा के पास जाकर बोले, "यहाँ ऐसा म्यूज़िक रखो, यहाँ साइलेंस रखो।" और आकर इंटरव्यू को पूरा किया।

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एक खराब दौर से भी गुज़रे थे बर्मन

1980 के दशक के वक्त पंचम दा बहुत ही खराब दौर से गुज़र रहे थे। गीतकार बप्पी लहिरी और अन्य डिस्को का संगीत उनकी छवि पर भारी पड़ गया। जिस वजह से कई निर्देशकों ने पंचम दा के साथ काम करने से मना कर दिया, क्योंकि उनका संगीत लगातार बॉक्स ऑफिस पर पिट रहा था। नासिर हुसैन, जिन्होंने उनके संगीत को पहली बार बॉलीवुड में जगह दी, उन्होंने भी अपना संगीत पंचम दा को देने के बजाय दूसरे संगीत निर्देशकों को दे दिया। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पंचम दा का बचाव करते हुए नासिर ने कहा था कि पंचम ने किसी भी फिल्म में खराब संगीत नहीं दिया है। बस वह एक ख़राब दौर से गुज़र रहे हैं। लेकिन आने वाली लगातार तीन फ़्लॉप से नासिर और दूसरे फिल्मकारों ने पंचम से अपना पीछा छुड़ा लिया। फिल्मकार सुभाष घई ने राम लखन के लिये पंचम दा को आश्वासन दिया, लेकिन बाद में उसका संगीत लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल को दे दिया।

हालाँकि इसी दौर में पंचम दा को 1983 में 'सनम तेरी कसम' के लिये और 1984 में 'मासूम' के लिये सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का पुरस्कार मिला। फिल्म 'इजाज़त' में उनका संगीत फिर से जनता के सिर चढ़ कर बोला। इसके लिये गायिका आशा भोंसले और गुलज़ार को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।

1988 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा और 1994 में उनकी मृत्यु हो गई। बतौर संगीत निर्देशक, उनकी आखिरी फिल्म '1942ः अ लव स्टोरी' का संगीत भी जनता ने खूब सराहा। बस दुःख इस बात का है, कि इसे देखने से पहले पंचम दा इस दुनिया को अलविदा कर चुके थे। उनकी पत्नी आशा भोंसले कहती हैं कि वह बहुत जल्दी और बहुत कष्ट में इस दुनिया को अलविदा कह गए।

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