एक महीने शहर में बसता है गाँव

एक महीने शहर में बसता है गाँवसाभार: इंटरनेट

लखनऊ। आजकल हाइटेक जमाने में लोग गाँव की खुशबू से दूर हो रहे हैं लेकिन शहर में नवंबर महीने में एक ऐसा गाँव बसता है जहां जाने के लिए हर कोई बेताब रहता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन शुरू होने वाला कतकी मेला मुगल काल से लग रहा है। यह मेला एक महीना और 15 दिन तक चलता है। इसमें लोग शॉपिंग से लेकर खाने-पीने और झूलों का भी आनंद लेते हैं। डालीगंज में प्लैनेटोरियम (नक्षत्रशाला) के सामने लगने वाले कतकी मेला इन दिनों शहर की रौनक बना हुआ है। मेले में क्या-क्या चीजें मिलती हैं, आइए डालते हैं एक नज़र-

राजस्थानी सिलबट्टा

सिलबट्टे पर बनी चटनी का कोई जवाब नहीं होता। मसाला पीसना या चटनी बनानी हो, मेले में राजस्थान का स्पेशल सिलबट्टा और इमामदस्ते उपलब्ध हैं। अमूनन शहर के बाजारों में ये थोड़े कम ही दिखाई देते हैं। लकड़ी के चिमटे और की-होल्डर।

खुर्जा के प्रसिद्ध चीनी-मिट‍्टी के बर्तन

सहारनपुर के शीशम की लकड़ी से बने लकड़ी के चिमटे, की-होल्डर, चूड़ी स्टैंड और मेकअप बॉक्स भी मेले में खास हैं। इन पर हाथ से डिजाइनिंग की जाती है। मेले में हर दूसरे-तीसरे स्टॉल में चीनी-मिट्टी की क्रॉकरी उपलब्ध हैं। अलीगढ़ के खुर्जा की ये मशहूर क्रॉकरी देखने में जितनी आकर्षक हैं, दाम में उतनी ही ज्यादा किफायती। इनमें कप-प्लेट, डोंगे, अचारदानी सहित कई बर्तन शामिल हैं।

पूर्वांचल का बाटी-चोखा

पू्र्वांचल के बाटी-चोखा का नाम आते ही मुंह में पानी आना स्वाभाविक है। यही कारण है कि बाटी-चोखे के स्टॉल पर दिनभर भीड़ लगी रहती है।

मेले में खास व्यंजन एक किलो का मुगलई पराठा है, जो शाही हलवे के साथ परोसा जाता है।

एक किलो का मुगलई पराठा और शाही हलवे का कॉम्बो

कतकी मेला टेस्ट में भी बेस्ट है। यहां मोहम्मद सलीम पिछले 20 साल से मिठाई का स्टॉल लगा रहे हैं, लेकिन मेले में इनका खास व्यंजन एक किलो का मुगलई पराठा है, जो शाही हलवे के साथ परोसा जाता है। वहीं, कुछ मीठा चाहते हैं तो सोहन हलवा भी चख सकते हैं।

सरसों के दाने का एंकल क्लीनर

मिट्टी में सरसों के दानों को गूथकर देसी एंकल क्लीनर बनाया जाता है। इस नए तरह के एंकल क्लीनर को खरीदने में लोग खासी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वहीं, आगरा के पत्थर से बने चकला और इमामदस्तों की भी खूब डिमांड है।

मेले में लगते हैं पांच सौ स्टॉल

सूरज कुंड चौराहे से नबीउल्ला रोड तक लगने वाले इस मुगल कालीन लोक मेले में वर्तमान में 500 स्टॉल और 50 ठेले शामिल हैं। मेले के संरक्षक मेहंदी हुसैन हैं। मेले के समन्वयक कुरैश खान और अभिनव कुमार के अनुसार मेले में साठ प्रतिशत शहर के बाहर के छोटे व्यापारी शामिल हुए हैं। उन्होंने शासन से मांग की है कि मेले के दौरान वहां वाहन का यातायात रोका जाए ताकि यह कतकी का मेला अपने वैभव को समेटे हुए आयोजित हो।

लखनऊ में कश्मीर और आप

कश्मीर की वादियां, दिल्ली का इंडिया गेट और जयपुर के बड़े किलों का नजारा लखनऊ के कतकी मेले में देखने को मिलेगा। चौंकिए नहीं मेले में बने स्टूडियो में ऐसे बैकग्राउंड के साथ लोग फोटो बड़े शौक से खिंचवाते हैं। आज जहां कैमरे वाले हाईटेक फोन का जमाना है लेकिन आज भी मेले में लगने वाले फोटो स्टूडियो का क्रेज कम नहीं हुआ है।

क्या है मेले में खास

  • सिलबट्‌टे
  • इमामदस्ता
  • सब्जियां घिसने वाला चाकू
  • मूसल, सूप, मथानी
  • बच्चों की बांसुरी
  • हीरो-हीरोइन के पोस्टर
  • ढोलक-मंजीरा
  • चंदन घिसने वाली चौकी

पांच रुपए में झूला

बच्चों के साथ मेले में आए हैं तो उनके साथ झूला झूलना तो बनता ही है। घोड़े और नाव वाले झूले के साथ गोल चक्कर वाले झूले भी लगाए गए हैं।

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top