सूचना और तकनीक से लैस हैं युवा संगीतकार: विश्व मोहन भट्ट

सूचना और तकनीक से लैस हैं युवा संगीतकार: विश्व मोहन भट्टसाल 1994 में विश्व मोहन को संगीत के क्षेत्र में प्रतिष्ठित माने जाने वाले ग्रैमी अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है

नई दिल्ली (भाषा)। हाल ही में देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित प्रख्यात मोहन वीणा वादक विश्व मोहन भट्ट का मानना है कि आज के वक्त में युवा संगीतकार नवीनतम सूचना और तकनीक से लैस हैं, बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अपने ऊपर ज्यादा महत्वाकांक्षी नहीं होना चाहिए।

‘मोहन वीणा' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने वाले भट्ट ने युवा संगीतकारों की तारीफ करते हुए कहा, ‘युवा संगीतकार बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। मेहनत कर रहे हैं लेकिन बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षा अपने ऊपर हावी ना होने दें।’ उन्होंने कहा, ‘आज के युवा संगीतकार ढेर सारी सूचना से लैस हैं। उनके पास नवीनतम जानकारी और तकनीक है। इंटरनेट और यू-ट्यूब के जरिए संगीत तक आसानी से पहुंच रहे हैं। हमारे समय में दिग्गजों को सुनना बहुत मुश्किल काम था, आज ऐसा नहीं है। आज आप पुराने किसी भी उस्ताद को सुन सकते हैं।’

साल 1994 में संगीत के क्षेत्र में सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले ग्रैमी अवॉर्ड से सम्मानित किए जा चुके भट्ट ने बताया, ‘संगीत मेरी आत्मा में बसता है। मेरी रगों में दौड़ता है। हमारे परिवार में संगीत की लंबी परंपरा रही है इसलिए मुझे लगता है कि मेरे रगों में संगीत समाया हुआ है। हम इसे आध्यात्म से भी जोड़ते हैं क्योंकि हमें ईश्वर का अनुभव संगीत के माध्यम से ही हो पाता है।’ शास्त्रीय संगीत से आध्यात्म के रिश्तों के बारे में पूछे जाने पर भट्ट ने कहा, ‘इस संगीत की परिकल्पना ही आध्यात्म से जुड़ी हुई है। शास्त्रीय संगीत भक्ति संगीत का ही बदला हुआ स्वरूप है। 5000 साल से ज्यादा समय से यह परंपरा चली आ रही है। सचमुच संगीत ईश्वर से साक्षात्कार कराता है।’ संगीत के क्षेत्र में कामयाबी के सफर के बारे में पूछे जाने पर भट्ट ने बताया, ‘प्रसिद्धि तो धीरे-धीरे मिलती है। इसमें समय लगता है। यह लंबी यात्रा है। अब हमें संगीत साधना करते हुए 49 साल हो गए। संगीत के क्षेत्र में दुनिया का सबसे बड़ा ग्रैमी पुरस्कार 1994 में मुझे अमेरिका में मिला था। इससे पूरी दुनिया में मेरे संगीत को पहचान मिली।’

भट्ट ने बताया, ‘वैसे तो पुरस्कारों की लंबी फेहरिस्त है लेकिन 2002 में भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान दिया। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और फिर उसके बाद तानसेन पुरस्कार भी मिला। अभी-अभी 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर पद्म भूषण मिला।’ पारंपरिक गिटार को ‘मोहन वीणा' में बदलने के बारे में भट्ट ने कहा, ‘यह एक बिल्कुल नई चीज है जो भारतीय संगीत को मैंने देने की कोशिश की है। करीब 49 साल से मैं इसका वादन कर रहा हूं। करीब 90 देशों में कार्यक्रम कर चुका हूं। इतने वर्षों में भारत में करीब-करीब सभी जगहों पर कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुका हूं।’ भट्ट ने बताया कि वह युवाओं को संगीत की तालीम देने की हरसंभव कोशिश करते हैं। भारत में लगभग हर शहर में और दुनिया के 100 से अधिक देशों में उनके ‘मोहन वीणा' में पारंगत शिष्य हैं।

राजस्थान और खासकर जयपुर से लगाव के बारे में उन्होंने कहा, ‘जयपुर मेरी जन्मभूमि और मातृभूमि है। मेरा अपनी मां से ऐसा लगाव रहा कि मैं उनको छोड़कर कहीं जा नहीं सका। मैंने अपनी मां से वादा किया था कि मैं जयपुर ही रहूंगा और आपके पास ही रहूंगा। आपके जाने के बाद भी मैं यहीं रहूंगा इसलिए जैसा कि कुछ संगीतकारों की परंपरा रही है, मैं ना तो न्यूयार्क लंदन में बसा ना ही मुंबई या कोलकाता में बसा।’

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