मचान खेती से बचाएं सब्ज़ियों की फसल

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बलरामपुर। निजी कंपनी में काम करने वाले आदित्य खेती करने और फिर उगाए उत्पाद को बाज़ार में बेचने से शर्माते थे। लेकिन नई मचान तकनीक से हुए मुनाफे से जब उनके घर की आर्थिक स्थिति सुधरी तो वे किसान बन गए।

मचान विधि खेती का एक ऐसा नया तरीका है जिसमें कम जगह, कम लागत और कम पानी के इस्तेमाल से सब्ज़ी का बढ़िया उत्पादन किया जा सकता है।

किसानों की आजीविका को सुदृढ़ करने के लिए कम क्षेत्र में कैसे अधिक से अधिक उत्पादन किया जाए इसके लिए ‘स्पेस’ संस्था ने ‘पानी’ गैर सरकारी संगठन के निर्देशन में सब्ज़ी की खेती को बढ़ावा देने का निर्णय किया और मचान विधि से सब्ज़ी की खेती के लिए किसानों को प्रेरित करना शुरू किया।

सभी ने हाथ खड़े कर दिए पर एक किसान गोष्ठी में शामिल संगीता ने इस फायदे के नुस्खे को अपनाने की ठानी। संगीता के पति आदित्य प्रसाद ने पहले तो काफी ना-नुकुर की लेकिन बाद में मचान विधि से सब्जी की खेती शुरू की। अपनी 500 वर्ग मीटर कृषि भूमि मे बांस का मचान बनाया और नीचे प्याज और ऊपर लौकी की बेल को चढ़ाया। जब लौकी का उत्पादन शुरू हो गया तो उसे बेचने की बात आई।

“उन्होंने (आदित्य प्रसाद) साफ इनकार कर दिया। कहा वो बाजार तक लौकी के बोरे को छोड़ेंगे लेकिन बेचेंगे नहीं”। संगीता (42 वर्ष) आगे बताती हैं, “तोड़ी गई लौकी को बोरे में भरकर, बेटे को मोटर साइकिल पर बैठा कर बाजार ले गए।” बाजार में ताजी लौकी देखकर दुकान पर ग्राहकों की भीड़ बढ़ गयी। बेटा अकेले ग्राहकों को नहीं संभाल पा रहा था। लौकी बेचने में झिझक रहे दूर खड़े आदित्य प्रसाद बेटे की मदद के लिए उसके करीब आए और ग्राहकों से पैसा लेना शुरू कर दिया। घर पहुंचने पर सबने जब पहले दिन की कमाई की गिनती की तो पता चला 300 रुपए की कमाई हुई। खेती के मुनाफे ने आदित्य की शर्म को खत्म कर दिया, वो अपना समय खेती में देने लगे, सब्जि़यां उगाकर बेटे के साथ बाज़ार में जाकर बेचने भी लगे।

कुछ दिन में प्याज भी तैयार हो गया। इसकी खुदाई के बाद दोनों पति-पत्नी ने खेत में सूरन और करेला लगाया। धीरे-धीरे पति-पत्नी की मेहनत रंग लाई। एक के बाद एक करेले फिर सूरन में अच्छा उत्पादन हुआ। इन सब्जि़यों को बेचकर परिवार ने अच्छा मुनाफा कमाया, जिससे धीरे-धीरे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी।

मचान विधि से सब्जी उगाकर पहले वर्ष में ही केवल 500 वर्ग मीटर भूमि में उन्होंने 35 से 40 हज़ार रुपए की शुद्ध आय प्राप्त की। इस वर्ष उन्होंने बिना परियोजना के मदद के उतनी ही भूमि में कई तरह की कम अवधि की सब्जियां जैसे पालक, मूली, चुकन्दर, धनिया, लौकी, प्याज उगाकर बेचा।

मचान का फसल चक्र 

यह प्रक्रिया 15 नवम्बर के करीब शुरू की जाती है। नवम्बर के मध्य में प्याज की नर्सरी डालते हैं फिर जनवरी के मध्य में प्याज की रोपाई करते हैं। दिसम्बर के मध्य में लौकी की नर्सरी डालते हैं इसके बाद फरवरी में पहले लगे मचान के खंम्भे के पास रोपाई करते हैं। प्याज की खुदाई अप्रैल में हो जाती है और लौकी जून-जुलाई तक खत्म हो जाती है। मई में सूरन की बुवाई करते हैं। जुलाई में पहले तैयार करेले के पौधे को लौकी के स्थान पर लगाते हैं। इसके बाद सूरन की खुदाई नवम्बर में दीपावली के पहले की जाती है तथा करेले की फसल नवम्बर तक खत्म होती है। इस प्रकार से पूरे वर्ष फसल चक्र चलता रहता है। 

मचान विधि

मचान विधि में 500 वर्ग मीटर में 2 गुणे 2 मीटर पर बांस के खंभे खड़े करते हैं। फिर खंभे के ऊपर तार से जाल बनाते हैं। इसमें जनवरी माह में प्याज की रोपाई की जाती है। इसके बाद जनवरी के अन्त में बांस के खंभे के किनारे लौकी का पौधा लगाते हैं उसके बाद प्याज की खुदाई के बाद सूरन लगाते हैं तथा लौकी के स्थान पर करेला लगाते हैं। इस तरह सालभर के फसल चक्र में केवल दो फसलों को जल देते हैं और चार फसल का उत्पादन लेते हैं। जिससे दो फसल का जल बचता है। चूंकि मचान के ऊपर बनाए गए जाल पर लौकी और करेला का फैलाव होने के कारण छांव रहती है, जिससे जमीन में नमी ज्यादा दिन तक बनी रहती है।

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