मधोक जी इतिहास बन गए, उनके पद चिन्ह नहीं मिटेंगे

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आज जब जम्मू-कश्मीर में उथल-पुथल मची है तब मधोक जैसे विचारकों की जरूरत थी भले ही वह लम्बे समय से सक्रिय नहीं थे। जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय से लेकर आजतक उन्होंने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अनेक उतार-चढ़ाव देखे थे। हिन्दू विचारों को लेकर चलने वाला, सिद्धान्तों से समझौता न करने वाला नेता अब इतिहास बन गया। यह बात अलग है कि उनके विचारों को स्वीकार्यता नहीं मिली और जिस भारतीय जनसंघ की उन्होंने श्यामाप्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर स्थापना की थी उस पर अटल बिहारी वाजपेयी का नरम हिन्दुत्व हावी रहा। मधोक जी ने सत्तर के दशक में जब मुसलमानों के भारतीयकरण की बात कही तो समय बदल चुका था, जयप्रकाश नारायण का सामंजस्य की राजनीति का युग चल रहा था जिसमें अटल जी सफल रहे। जयप्रकाश नारायण की जनता पार्टी छोड़ने के बाद मधोक ने जनसंघ को जीवित रखने का प्रयास किया लेकिन बात बनी नहीं। 

इतिहास विषय पर उनकी पकड़ बहुत अच्छी थी और लाहौर के डीएवी कॉलेज से प्रथम श्रेणी में एमए की डिग्री पाई। मधोक ने 1947 में प्रेमनाथ डोंगा के साथ मिलकर प्रजा परिषद की स्थापना की और भारत के साथ जम्मू कश्मीर के पूर्ण विलय का पक्ष रखा। उन दिनों जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री थे शेख अब्दुल्ला, उन्होंने मधोक को देश निकाला दे दिया और मधोक दिल्ली आ गए। पंजाब विश्वविद्यालय से सम्बद्ध डीएवी कॉलेज में इतिहास के प्राध्यापक बन गए। आजीवन प्रोफेसर मधोक ही कहे गए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका 1942 से ही जुड़ाव था जब वह पूर्णकालिक प्रचारक बने थे और 1951 में उन्होंने संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना की। जब गांधी जी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया तो लोकसभा में उसका पक्ष रखने वाला कोई नहीं था इसलिए संघ ने राजनैतिक शाखा के रूप में भारतीय जनसंघ की स्थापना कराई। दीनदयाल उपाध्याय, श्यामाप्रसाद मुखर्जी और बलराज मधोक उसके संस्थापक सदस्य थे। मधोक को राजनीति के क्षेत्र में संघ का लगातार हस्तक्षेप पसन्द नहीं था इसलिए संघ में उनके बजाय अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को तरजीह मिलती रही।

दिल्ली में पाकिस्तान से आए विस्थापितों के बीच मधोक बहुत ही लोकप्रिय थे। साठ के दशक तक जनसंघ में मधोक का वर्चस्व रहा और 1966-1967 में वह अखिल भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में जनसंघ ने 1967 के आम चुनाव में लोकसभा की 35 सीटें जीतीं जो बहुत दिन तक रिकॉर्ड रहा। उनके और अटल जी के विचारों में मतभेद रहता था और 1973 में जब लालकृष्ण आडवाणी जनसंघ के अध्यक्ष बने तो मुसलमानों का भारतीयकरण जैसे विषयों को लेकर मतभेद इतना बढ़ा कि आडवाणी ने जनसंघ के संस्थापक मधोक को तीन साल के लिए निष्कासित कर दिया। इसे विधि की विडम्बना कहें कि स्वयं आडवाणी आज पार्टी में हाशिए पर हैं। मधोक ने अनेक ऐतिहासिक विषयों पर पुस्तकें लिखी हैं और कश्मीर तथा भारत विभाजन पर उनकी किताबों में नई जानकारी मिलती है। कश्मीर विषय पर उनका निश्चित मत रहा कि धारा 370 की कोई आवश्यकता नहीं है। प्रोफेसर बलराज मधोक को एक राजनेता से अधिक एक कुशल अध्यापक के रूप में याद किया जाएगा।

sbmisra@gaonconnection.com

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