कैफ़ी आज़मी : किस धूम से उठा था जनाज़ा बहार का ...

Anusha MishraAnusha Mishra   19 Jan 2018 11:52 AM GMT

कैफ़ी आज़मी : किस धूम से उठा था जनाज़ा बहार का ...कैफ़ी आज़मी

ग्यारह साल की उम्र में उन्होंने लिखा था, ‘‘इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े, हंसने से हो सुकूं, न रोने से कल पड़े।’’

10 मई 2002 को मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की इस दुनिया से रुख़सती हुई थी। 14 जनवरी 1919 को आज़मगढ़ के मिजवां गाँव में जन्मे कैफ़ी का असली नाम अख़्तर हुसैन रिज़वी था। बचपन से ही कविताएं और शायरी लिखने के शौक़ीन कैफ़ी किशोरावस्था में ही मुशायरों में हिस्सा लेने लगे थे। वह 11 साल के थे जब उन्होंने अपनी पहली गज़ल लिखी थी। शिया घराने में एक जमींदार के घर में उनकी पैदाइश हुई थी।

मुहर्रम में मातम के दौरान हज़रत अली को जिन अल्फाज़ों में याद करते हैं, वह उनकी शायरी में देखने को मिलता है। वे जिस माहौल में पले-बढ़े, वहां शायरी का बोल-बाला था। ग्यारह साल की उम्र में उन्होंने लिखा था, ‘‘इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े, हंसने से हो सुकूं, न रोने से कल पड़े।’’ शुरुआत में आज़मी साहब ज्यादातर युवाओं की तरह प्रेम प्रधान कविताएं ही लिखते थे लेकिन जैसे-जैसे उनमें नए विचारों ने जन्म लेना शुरू किया उनकी कविता में भी बदलाव आने लगा। साम्यवादी पार्टी का सदस्य बनने के बाद उनमें जो बदलाव आया वो उनकी लिखी कई कविताओं में देखने को मिलता है।

देश-दुनिया से जुड़ी सभी बड़ी खबरों के लिए यहां क्लिक करके इंस्टॉल करें गाँव कनेक्शन एप

पार्टी के काम के सिलसिले में एक बार कैफ़ी साहब मुंबई गए, वहां उनका संबंध इंडियन पीपुल्स थिएटर से हुआ और आगे चलकर वे उसके अध्यक्ष भी बने। कम उम्र में ही वे मुशायरों में अच्छी पहचान बना चुके थे लेकिन पूरी तरह से कम्यूनिस्ट पार्टी के लिए समर्पित। पार्टी के कामों में मशरूफ रहने के साथ-साथ वह अख़बार 'कौमी जंग' में भी कॉलम लिखते थे। वह उर्दू अख़बार 'मज़दूर मोहल्ला' का संपादन करते थे और मज़दूरों के लिए भी काम करते थे। इन कामों के लिए पार्टी उन्हें 40 रुपये महीना देती थी जिसमें उनका घर खर्च चलता था।

1946 में उन्होंने मुंबई में ही शौकत से निकाह किया और अपने गाँव चले गए। शादी के बाद उनका एक बेटा हुआ जिसकी कुछ दिनों बात ही मृत्यु हो गई। इसके बाद वह लखनऊ आ गए। कुछ दिनों बाद उनकी पत्नी शौकत फिर गर्भवती हुईं लेकिन कम्यूनिस्ट पार्टी ने फरमान सुना दिया कि गर्भपात कराओ, कैफ़ी उस वक्त अंडरग्राउंड थे, उनके पास इतने भी रुपये भी नहीं थे कि वह शौकत की डिलीवरी करा पाते। वह अपनी मां के पास हैदराबाद चली गईं और वहीं पर उनकी बेटी शबाना आज़मी का जन्म हुआ।

कैफ़ी साहब की मुफलिसी का उस वक्त यह आलम था कि उनकी मदद के लिए महान लेखिका इस्मत चुगताई और उनके पति शाहिद लतीफ़ ने एक हज़ार रुपये आज़मी जी के पास भिजवाए ताकि वो बच्ची का खर्च उठा सकें।

फिल्म निर्माता शाहिद लतीफ़ ने उस वक्त एक फिल्म में आज़मी साहब के लिखे दो गाने इस्तेमाल किए थे और ये रुपये उसी की फीस के तौर पर दिए थे। कैफ़ी आज़मी ने 1951 में पहला गीत 'बुजदिल फ़िल्म' के लिए लिखा- 'रोते-रोते बदल गई रात'। उन्होंने अनेक फ़िल्मों में गीत लिखें जिनमें कुछ प्रमुख हैं- 'काग़ज़ के फूल' 'हक़ीक़त', हिन्दुस्तान की क़सम', हंसते जख़्म 'आख़री ख़त' और हीर रांझा'।

फिल्मी सफर

आज़मी साहब को पहला बड़ा ब्रेक 1959 में फिल्म 'कागज़ के फूल' में मिला। इस फिल्म के जरिए ही वह पहली बार गुरुदत्त से मिले थे और यह जान-पहचान जल्द ही अच्छी दोस्ती में बदल गई थी। इस बारे में बात करते हुए एक बाद कैफ़ी साहब ने लिखा था -

उस ज़माने में फ़िल्मों में गाने लिखना एक अजीब ही चीज थी। आम तौर पर पहले ट्यून बनती थी। उसके बाद उसमें शब्द पिरोए जाते थे। ये ठीक ऐसे ही था कि पहले आपने क़ब्र खोद ली, फिर उसमें मुर्दे को फिट करने की कोशिश करें। कभी मुर्दे का पैर बाहर रहता था तो कभी कोई अंग। मेरे बारे में फ़िल्मकारों को यकीन हो गया कि ये मुर्दे ठीक गाड़ लेता है, इसलिए मुझे काम मिलने लगा।

कैफ़ी साहब ने एक साक्षात्कार में बताया था कि 'कागज़ के फूल' का सबसे हिट गाना 'वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम' बस यूं ही बन गया था। एसडी बर्मन और कैफ़ी आज़मी ने मिलकर इस गाने को बनाया था लेकिन यह किसी फिल्म के लिए नहीं था। गुरुदत्त को गाना इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे ले लिया और बोले कि गाना तुम मुझे दे दो, इससे मिलती हुई परिस्थितियां मैं फिल्म में बना लूंगा। कैफ़ी साहब के लिखे सारे गाने बहुत हिट हुए लेकिन ये फिल्म नहीं चली। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों के लिए गाने लिखे लेकिन ज्यादातर फिल्मों में लिखे उनके गाने तो हिट होते थे, फिल्म फ्लॉप हो जाती थी। एक ऐसा दौर आया जब आज़मी साहब को लोग मनहूस मानने लगे। फिल्म जगत में ये बात फैल गई कि वह जिस फिल्म के लिए गाने लिखते हैं वह फ्लॉप हो जाती है। धीरे-धीरे लोगों ने उनके लिखे गानों को फिल्मों में लेना बंद कर दिया।

इस माहौल में चेतन आनंद एक दिन उनके पास आए, उन्होंने कैफी आज़मी से उनकी फिल्म में गाना लिखने की गुज़ारिश की। कैफ़ी साहब बोले मैं आपकी फिल्म के लिए गाना लिख तो दूं लेकिन मेरे सितारे आजकल गर्दिश में हैं, हो सकता है आपकी फिल्म मेरे गाने के कारण फ्लॉप हो जाए। चेतन आनंद उनसे बोले - मेरी फिल्में भी लगातार फ्लॉप हो रही हैं, हो सकता है दो फ्लॉप लोग मिलकर कुछ बड़ा हिट कर दें। कैफ़ी साहब मान गए और दोनों ने मिलकर काम किया। 1964 में आई चेतन आनंद की फिल्म ह़कीक़त बहुत चली और उसमें कैफ़ी साहब का लिखा गाना - कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों आज भी लोगों की जुबां पर चढ़ा रहता है।

शायरी में लिख दी पूरी फिल्म

इसके बाद 1970 में आई फिल्म 'हीर रांझा' में कैफ़ी साहब ने एक इतिहास कायम कर दिया। उन्होंने पूरी फ़िल्म शायरी में लिखी। हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। आप उसका एक-एक शब्द सुनें, उसमें शायरी है। उन्होंने इस फ़िल्म पर बहुत मेहनत की। वह रात भर जागकर लिखते थे। उन्हें हाई ब्लडप्रेशर था, सिगरेट बहुत पीते थे। इसी दौरान उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ और फिर पैरालसिस हो गया। उसके बाद फिर एक नया दौर शुरू हुआ। नए फ़िल्ममेकर्स कैफ़ी साहब की तरफ आकर्षित होने लगे। उनमें चेतन आनंद के बेटे केतन आनंद थे। उनकी फ़िल्म 'टूटे खिलौने' के गाने उन्होंने लिखे। उसके बाद उन्होंने मेरी दो-तीन फ़िल्मों टूटे खिलौने, भावना, अर्थ के गाने लिखे। बीच में सत्यकाम, अनुपमा, 'दिल की सुनो दुनिया वालो' बनी। ऋषिकेष मुखर्जी के साथ भी उन्होंने काम किया। अर्थ के गाने बहुत लोकप्रिय हुए और फ़िल्म भी बहुत चली। कैफ़ी साहब ने कई फिल्मों की पटकथा और संवाद भी लिखे। 'यहूदी की बेटी' और 'ईद का चांद' उनकी लिखी आरंभिक फ़िल्में थीं। उन्होंने 'गर्म हवा' और 'मंथन' जैसी फ़िल्मों में संवाद भी लिखे।

1975 कैफ़ी आज़मी को आवारा सिज्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से सम्मानित किये गये। 1970 सात हिन्दुस्तानी फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद 1975 गरम हवा फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ वार्ता फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। 10 मई 2002 को दिल का दौरा के कारण मुम्बई में उनका हुआ।

ये भी पढ़ें- उठ मेरी जान - कैफ़ी आज़मी की नज़्म ‘औरत’ पर आधारित

ये भी पढ़ें- कैफ़ी आजमी के शहर में एक शख्स युवाओं को सिखा रहा है अदाकारी, खस्ताहाल टॉकीज़ को बना दिया थियेटर

ताजा अपडेट के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहां, ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top