जिन्होंने हमें “सारे जहां से अच्छा दिया” आज उनका जन्मदिन है, पढ़िए उनकी कुछ नज़्में

जिन्होंने हमें “सारे जहां से अच्छा दिया” आज उनका जन्मदिन है, पढ़िए उनकी कुछ नज़्मेंअल्लामा इक़बाल

बचपन में स्कूल में जिस तराने को गाकर हमारे दिल में देश भक्ति की भावना हिलोरें मारती थी, आज भी अगर उस तराने को हम सुन लेते हैं तो मन में देश के लिए गर्व के भाव पैदा होते हैं। मैं बात कर रही हूं तराना-ए-हिंद 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' की। आप जानते हैं ये तराना किसने लिखा? पाकिस्तान के राष्ट्रकवि कहे जाने वाले सर मुहम्मद इक़बाल ने। हम सब उन्हें अल्लामा इक़बाल के नाम से जानते हैं।

वही अल्लामा इक़बाल जिन्हें पाकिस्तान का आदर्श संस्थापक कहा जाता है, लेकिन ये वही अल्लामा इक़बाल हैं जिन्होंने भारत को अंग्रेज़ों से आज़ाद कराने की लड़ाई लड़ी, जो दार्शनिक थे, शायर थे, क्रान्तिकारी थे, नेता थे, उर्दू और फ़ारसी में इनकी शायरी को आधुनिक काल की सर्वश्रेष्ठ शायरी में गिना जाता है। आज उनके जन्मदिन पर पढ़िए उनकी कुछ ऐसी नज़्में जो उन्होंने हमारे देश के लिए लिखीं, वो देश जो कभी उनका भी था।

1. सारे जहाँ से अच्छा

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा

ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा

परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का
वो संतरी हमारा, वो पासबाँ हमारा

गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियाँ
गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनाँ हमारा

ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे, जब कारवाँ हमारा

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

यूनान-ओ-मिस्र-ओ- रोमा, सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशाँ हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा

'इक़बाल' कोई महरम, अपना नहीं जहाँ में
मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहाँ हमारा

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसताँ हमारा

2. नया शिवाला

सच कह दूँ ऐ बिरहमन(1) गर तू बुरा न माने
तेरे सनमकदों के बुत हो गये पुराने

अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा
जंग-ओ-जदल(2) सिखाया वाइज़(3) को भी ख़ुदा ने

तंग आके मैंने आख़िर दैर-ओ-हरम(4) को छोड़ा
वाइज़ का वाज़(5) छोड़ा, छोड़े तेरे फ़साने

पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है

आ ग़ैरियत(6) के पर्दे इक बार फिर उठा दें
बिछड़ों को फिर मिला दें नक़्श-ए-दुई मिटा दें

सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें

दुनिया के तीरथों से ऊँचा हो अपना तीरथ
दामान-ए-आस्माँ से इस का कलस मिला दें

हर सुबह मिल के गायें मन्तर वो मीठे- मीठे
सारे पुजारियों को मय प्रीत की पिला दें

शक्ती(7) भी शान्ती(8) भी भक्तों के गीत में है
धरती के वासियों की मुक्ती(9) पिरीत(10) में है

( अर्थ - 1. ब्राह्मण, 2. दंगा-फ़साद, 3. उपदेशक, 4. मंदिर-मस्जिद, 5. उपदेश, 6.अपरिचय, 7. शक्ति, 8.शांति, 9. मुक्ति, 10. प्रीत)


3. लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

लब(1) पे आती है दुआ(2) बनके तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शमअ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी

दूर दुनिया का मेरे दम अँधेरा हो जाये
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये

हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत(3)
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब
इल्म (4) की शमअ से हो मुझको मोहब्बत या रब

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत (5) करना
दर्द-मंदों से ज़इफ़ों (6) से मोहब्बत करना

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको

( अर्थ - 1. अधर, 2. प्रार्थना, 3. शोभा, 4. विद्या, 5. सहायता, 6. बूढ़ों)

4. मेरा वतन वही है

चिश्ती ने जिस ज़मीं पे पैग़ामे हक़ सुनाया,
नानक ने जिस चमन में बदहत का गीत गाया,
तातारियों ने जिसको अपना वतन बनाया,
जिसने हेजाजियों से दश्ते अरब छुड़ाया,
मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

सारे जहाँ को जिसने इल्मो-हुनर दिया था,
यूनानियों को जिसने हैरान कर दिया था,
मिट्टी को जिसकी हक़ ने ज़र का असर दिया था
तुर्कों का जिसने दामन हीरों से भर दिया था,
मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमां से,
फिर ताब दे के जिसने चमकाए कहकशां से,
बदहत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकां से,
मीरे-अरब को आई ठण्डी हवा जहाँ से,
मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

बंदे किलीम जिसके, परबत जहाँ के सीना,
नूहे-नबी का ठहरा, आकर जहाँ सफ़ीना,
रफ़अत है जिस ज़मीं को, बामे-फलक़ का ज़ीना,
जन्नत की ज़िन्दगी है, जिसकी फ़िज़ा में जीना,
मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

गौतम का जो वतन है, जापान का हरम है,
ईसा के आशिक़ों को मिस्ले-यरूशलम है,
मदफ़ून जिस ज़मीं में इस्लाम का हरम है,
हर फूल जिस चमन का, फिरदौस है, इरम है,
मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

5. रा

लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द(1)
सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द(2)
ये हिन्दियों के फिक्रे-फ़लक(3.) उसका है असर,
रिफ़अत(5) में आस्माँ से भी ऊँचा है बामे-हिन्द(5)
इस देश में हुए हैं हज़ारों मलक (6) सरिश्त (7)
मशहूर जिसके दम से है दुनिया में नामे-हिन्द
है राम के वजूद(8) पे हिन्दोस्ताँ को नाज़,
अहले-नज़र समझते हैं उसको इमामे-हिन्द
एजाज़ (9) इस चिराग़े-हिदायत (10) , का है यही
रोशन तिराज़ सहर (11) ज़माने में शामे-हिन्द
तलवार का धनी था, शुजाअत (12) में फ़र्द (13) था,
पाकीज़गी(14) में, जोशे-मुहब्बत में फ़र्द था

( अर्थ - 1. हिन्द का प्याला सत्य की मदिरा से छलक रहा है , 2. पूरब के महान चिंतक हिन्द के राम हैं, 3. महान चिंतन, 4. ऊँचाई, 5. हिन्दी का गौरव या ज्ञान, 6. देवता, 7. ऊँचे आसन पर, 8. अस्तित्व, 9. चमत्कार, 10. ज्ञान का दीपक, 11. भरपूर रोशनी वाला सवेरा, 12. वीरता, 13. एकमात्र, 14. पवित्रता)

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