पढ़िए बिस्मिल और अशफ़ाक की बेमिसाल दोस्ती की कहानी 

पढ़िए बिस्मिल और अशफ़ाक की बेमिसाल दोस्ती की कहानी बेमिसाल थी हिंदू-मुस्लिम एकता की दोस्ती

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें न हो खून-ए-जुनून,

क्या लड़े तूफानों से जो कश्ती साहिल में है,

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।

इन पंक्तियों से राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ को हर बार जोड़ा जाता है। अक्सर वो इसे गुनगुनाया करते थे लेकिन यह एक भ्रम है कि ये पंक्तियां बिस्मिल ने लिखी थीं जबकि इसके रचयिता शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी थे। यह गज़ल राम प्रसाद बिस्मिल की ज़ुबान पर हर वक़्त रहती थी। 1927 में सूली पर चढ़ते समय भी यह गज़ल उनकी जुबान पर थी, बिस्मिल के तीनों साथी अशफ़ाकउल्ला, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी, और रोशन सिंह जेल से पुलिस की लारी में जाते हुए, कोर्ट में मजिस्ट्रेट के सामने पेश होते हुए और लौटकर जेल आते हुए एक सुर में इस गज़ल को गाया करते थे।

देश की आजादी के लिए शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ का जन्म आज ही के दिन 11 जून, 1897 को यूपी के शाहजहांपुर में हुआ था। मैनपुरी षडय‍ंत्र और काकोरी कांड में इनके शामिल होने की वजह से 19 दिसंबर, 1927 को ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया।

कैसे काकोरी कांड बनी थी देश की बड़ी घटना

बिस्मिल भी उन क्रांतिकारियों में शामिल थे जो भारत को अंग्रेजों के अत्याचार से आजादी दिलाना चाहते थे। उन्होंने दूसरे क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन की स्थापना (1924) की।

उनके साथियों में अशफ़ाकउल्ला खां, राजेंद्र सिंह और रोशन सिंह शामिल थे लेकिन अपने उद्देश्य को सफल करने के लिए और अंग्रेजों के खिलाफ एक एजेंडा तैयार करने, हथियार खरीदने और ट्रेनिंग के लिए उन्हें पैसों की जरूरत थी।

अशफ़ाकउल्ला खां

इसके लिए उन्होंने पूरी एक ट्रेन लूटने की योजना बनाई थी। इस ट्रेन से ब्रिटिश सरकार का खजाना ले जाया जा रहा था।

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नौ अगस्त 1925 को काकोरी में दस लोगों ने एक ट्रेन में डकैती डालकर उसे एक सूनसान गांव में रोक दिया। वहां से वह पैसा लेकर भाग गए। यह घटना भारतीय इतिहास में अंग्रेजों के खिलाफ सबसे बड़ी क्रांतियों में शामिल रही है। इस घटना के बाद ब्रिटिश पुलिस ने करीब 40 लोगों को गिरफ्तार किया था जिसमें बिस्मिल और उनके तीनों साथी भी शामिल थे।

हिंदू-मुस्लिम एकता का बेजोड़ उदाहरण अशफ़ाक और बिस्मिल की दोस्ती

बिस्मिल जब गोरखपुर जेल में कैद में थे तब उन्होंने दो दिन के अंदर अपनी पूरी आत्मकथा लिख दी थी। 200 पन्नों की इस आत्मकथा में बिस्मिल ने अपने अजीज़ दोस्त अशफ़ाकउल्ला खां का भी जिक्र किया था।

पेश है कुछ अंश-

मुझे भलीभांति याद है, कि जब मैं बादशाही ऐलान के बाद शाहजहांपुर आया था, तो तुम से स्कूल में भेंट हुई थी। तुम्हारी मुझ से मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा थी। तुमने मुझसे मैनपुरी षड्यन्त्र के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करनी चाही थी । मैंने यह समझ कर कि एक स्कूल का मुसलमान विद्यार्थी मुझ से इस प्रकार की बातचीत क्यों करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की दृष्‍टि से दे दिया था।

तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे देशभक्‍त थे। तुम ने स्वदेशभक्‍ति के भावों को भली भांति समझने के लिए ही हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया। अपने घर पर जब माता जी तथा भ्राता जी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुंह से हिन्दी शब्द निकल जाते थे, जिससे सबको बड़ा आश्‍चर्य होता था।
राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा से, अशफ़ाकउल्ला खां के लिए

तुम्हें उस समय बड़ा खेद हुआ था। तुम्हारे मुख से हार्दिक भावों का प्रकाश हो रहा था। तुमने अपने इरादे को यों ही नहीं छोड़ दिया, अपने निश्‍चय पर डटे रहे । जिस प्रकार हो सका कांग्रेस में बातचीत की । अपने इष्‍ट मित्रों द्वारा इस बात का विश्‍वास दिलाने की कौशिश की कि तुम बनावटी आदमी नहीं, तुम्हारे दिल में मुल्क की खिदमत करने की ख्वाहिश थी। आखिर में तुम्हारी विजय हुई। तुम्हारी कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली।

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थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गए थे, किन्तु छोटे भाई बनकर तुम्हें सन्तोष न हुआ। तुम समानता का अधिकार चाहते थे, तुम मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे। वही हुआ। तुम सच्चे मित्र बन गए। सब को आश्‍चर्य था कि एक कट्टर आर्यसमाजी और मुसलमान का मेल कैसा ? मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था। आर्यसमाज मन्दिर में मेरा निवास था, किन्तु तुम इन बातों की किंचितमात्र चिन्ता न करते थे। मेरे कुछ साथी तुम्हें मुसलमान होने के कारण घृणा की दृष्‍टि से देखते थे, किन्तु तुम अपने निश्‍चय पर दृढ़ थे। मेरे पास आर्यसमाज मन्दिर में आते जाते थे । हिन्दू-मुस्लिम झगड़ा होने पर, तुम्हारे मुहल्ले के सब कोई खुल्लमखुल्ला गालियां देते थे, काफिर के नाम से पुकारते थे, पर तुम कभी भी उनके विचारों से सहमत न हुए।

तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे देशभक्‍त थे। तुम ने स्वदेशभक्‍ति के भावों को भली भांति समझने के लिए ही हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया। अपने घर पर जब माता जी तथा भ्राता जी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुंह से हिन्दी शब्द निकल जाते थे, जिससे सबको बड़ा आश्‍चर्य होता था।

एक समय जब तुम्हारे हृदय-कम्प का दौरा हुआ, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुंह से बार- बार ‘राम’ ‘हाय राम’ शब्द निकल रहे थे। पास खड़े भाई-बंधुओं को आश्‍चर्य था कि ‘राम’, ‘राम’ कहता है । कहते कि ‘अल्लाह, अल्लाह’ करो, पर तुम्हारी ‘राम’, ‘राम’ की रट थी !
राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा से, अशफ़ाकउल्ला खां के लिए

तुम्हारी इस प्रकार की प्रवृत्ति को देखकर बहुतों को सन्देह होता था कि कहीं इस्लाम धर्म त्याग कर शुद्धि न करा ले लेकिन तुम्हारा हृदय तो किसी प्रकार अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु की कराते ? तुम्हारी इस प्रकार की प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली। बहुधा मित्र मंडली में बात छिड़ती कि कहीं मुसलमान पर विश्‍वास करके धोखा न खाना। तुम्हारी जीत हुई, मुझमें तुममें कोई भेद न था।

राम-राम कहकर पुकारते थे अशफ़ाक

हां ! तुम मेरा नाम लेकर पुकार नहीं सकते थे । तुम सदैव 'राम' कहा करते थे। एक समय जब तुम्हारे हृदय-कम्प का दौरा हुआ, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुंह से बार- बार 'राम' 'हाय राम' शब्द निकल रहे थे। पास खड़े भाई-बंधुओं को आश्‍चर्य था कि 'राम', 'राम' कहता है । कहते कि 'अल्लाह, अल्लाह' करो, पर तुम्हारी 'राम', 'राम' की रट थी ! उस समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो 'राम' के भेद को जानते थे। तुरन्त मैं बुलाया गया । मुझसे मिलने पर तुम्हें शान्ति हुई, तब सब लोग 'राम-राम' के भेद को समझे !

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