वो सुबह जिसने संपूर्ण सिंह कालरा को 'गुलज़ार' बना दिया

वो सुबह जिसने संपूर्ण सिंह कालरा को गुलज़ार बना दिया

वो नए साल की आखिरी रात थी। अगली सुबह 1963 की सुबह हो जानी थी। बंबई का मौसम सर्द तो नहीं था लेकिन इतनी ठंड थी कि वर्ली के उस गराज में मालिक की मेज़ पर रखा टेबल-फैन आज बंद था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कुराहट थी, जैसे अपने आप से कह रहा हो, 'मैंने तो पहले ही कहा था कि ऐसा होकर रहेगा'... उसकी नज़र बार-बार गराज में काम करने वाले एक नौजवान पर टिक जाती थी। संपूर्ण सिंह नाम के उस नौजवान के लिए वो रात बहुत ख़ास थी।

अगली सुबह उसका लिखा हुआ गाना पर्दे पर आने वाला था। यूं तो संपूर्ण का काम एक्सीडेंटल गाड़ियों पर आई खरोंचों पर किये जाने वाले पेंट का रंग बनाना था, रंगों को लेकर समझ बेहतरीन थी, किस रंग में कौन सा रंग मिलाया जाए कि मनचाहा रंग मिल जाए, ये उसे खूब पता था। ये उसका काम था लेकिन उसका शौक कविताएं लिखना था, किताबें पढ़ना था, इसी शौक ने संपूर्ण सिंह कालरा को लेखक बना दिया था।

नए साल की मुबारकबाद से गूंजती 1 जनवरी 1963 की सुबह एक फिल्म रिलीज़ हुई, नाम था 'बंदिनी'। निर्देशक विमल रॉय की इस फिल्म में खास किरदार अदा किये थे धर्मेंद्र, अशोक कुमार और नूतन ने। फिल्म के बाकी गाने तो शैलेंद्र ने लिखे थे लेकिन एक गाना संपूर्ण सिंह कालरा ने लिखा था। संपूर्ण ने अपना तख़ल्लुस 'गुलज़ार' कहा था।

फिल्म का वो गाना 'मोरा गोरा अंग लेइ ले, मोहे श्याम रंग देइ दे' ख़ूब पसंद किया गया और यहीं वक्त का वो मोड़ था जिससे 32 साल के संपूर्ण सिंह कालरा को 'गुलज़ार' बना दिया था।

फ़िल्म 'बंदिनी' का क्रेडिट रोल

गुलज़ार को ज़िंदगी की दो सबसे अज़ीज़ खुशियां नहीं मिलीं, एक मां का आंचल और दूसरा पिता का दुलार। गुलज़ार अपने पिता की दूसरी शादी से हुई इकलौती संतान हैं। मां का इंतकाल गुलज़ार के बचपन में ही हो गया था और नौ भाई-बहनों के बीच अपने हिस्से का लाड-प्यार उन्हें पिता से नहीं मिल सका। गुलज़ार की पैदाइश अविभाजित भारत में पंजाब के झेलम ज़िला के दीना गांव में 18 अगस्त 1936 की है। बंटवारे के बाद इनका परिवार अमृतसर आकर बस गया था। गुलज़ार यहीं से मुंबई चले गए थे।

गुलज़ार

2002 में साहित्य अकेदमी, 2004 में पद्म भूषण और 2008 में आई 'स्लमडॉग मिलेनियर' के गाने 'जय हो' के लिए ऑस्कर अवार्ड जीतने वाले गुलज़ार साहब गानों के अलावा, आशीर्वाद (1968), खामोशी (1969) , सफर (1970) , घरोंदा , खट्टा-मीठा (1977) और मासूम (1982) जैसी फ़िल्मों की पटकथा भी लिख चुके है। इसके अलावा उन्होंने 1971 में 'आई मेरे' अपने 1972 में आई 'कोशिश', 'परिचय' और 1973 में आई 'अचानक' का निर्देशन भी किया।

इस सब के बीच गुलज़ार साहब की नज़्में भी आम लोगों के बीच बहुत मशहूर हैं, उनकी कई नज़्में ऐसी हैं जो लोगों को ज़ुबानी याद है, पर लोग नहीं जानते कि उसे किसने लिखा है। आज गुलज़ार साहब की सालगिरह के मौके पर आइये पढ़ें, गुलज़ार की वो पांच नज़्में जिन्हें पढ़कर ये समझा जा सकता है कि गुलज़ार हिंदुस्तानी साहित्य के अबतक के सबसे बड़े हस्ताक्षर क्यों कहे जाते हैं।

गुलज़ार की पांच नज़्में

1. सांस लेना भी कैसी आदत है

साँस लेना भी कैसी आदत है
जिए जाना भी क्या रिवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस हैं चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से कितनी सदियों से
जिए जाते हैं जिए जाते हैं
आदतें भी अजीब होती हैं

2. आदमी बुलबुला है पानी का

आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतहा पर
टूटता भी है डूबता भी है
फिर उभरता है, फिर से बहता है
न समुंदर निगल सका इस को
न तवारीख़ तोड़ पाई है
वक़्त की हथेली पर बहता
आदमी बुलबुला है पानी का

3. वो जो शायर था

वो जो शायर था, चुप सा रहता था
बहकी बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूँगी ख़ामोशियों की आवाज़ें!
जमा करता था चाँद के साए
गीली गीली सी नूर की बूँदें
ओक में भर के खड़खड़ाता था
रूखे रूखे से रात के पत्ते
वक़्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ, वही, वो अजीब सा शाएर
रात को उठ के कुहनियों के बल
चाँद की ठोड़ी चूमा करता है!!
चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुद-कुशी की है

4. ग़ालिब

बल्ली-माराँ के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कड़ पे बेड़ों के क़सीदे
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे
और धुंद्लाई हुई शाम के बे-नूर अँधेरे साए
ऐसे दीवारों से मुँह जोड़ कर चलते हैं यहाँ
चूड़ी-वालान कटरे की बड़ी-बी जैसे
अपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इस बे-नूर अँधेरी सी गली-क़ासिम से
एक तरतीब चराग़ों की शुरूअ' होती है
एक क़ुर्आन-ए-सुख़न का भी वरक़ खुलता है
असदुल्लाह-ख़ाँ-'ग़ालिब' का पता मिलता है

5. नज़्म उलझी हुई है सीने में

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होंटों पर
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादा काग़ज़ पे लिख के नाम तिरा
बस तिरा नाम ही मुकम्मल है
इस से बेहतर भी नज़्म क्या होगी!

गुलज़ार

चलते-चलते

गुलज़ार की सालगिरह के मौके पर इस गाने का ज़िक्र न हो तो बात अधूरी रहेगी। 'इजाज़त' फिल्म के इस गाने की बात ही कुछ ऐसी है कि आज भी ये गाना तमाम लोगों की ज़बान पर रहता है। 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है'। इस गाने में तुकबंदी नहीं है शायद इसीलिए खालिस शायरी में डूबे हुए इस गाने को जब गुलज़ार ने लिखकर आर डी बर्मन को सुनाया तो उन्हें ये गाना बिल्कुल पसंद नहीं आया था।

गुलज़ार बताते हैं कि गाना सुनकर उन्होंने कहा था, "कल को तुम टाइम्स ऑफ इंडिया की ख़बर ले आओगे और कहोगे कि इसका गाना बना दो, तो ऐसा नहीं होगा" लेकिन गुलज़ार के समझाने के बाद आर. डी. बर्मन इसे रिकॉर्ड करने के लिए तैयार हुए थे और फिर इस गाने ने ऐसा इतिहास रचा कि इसका जादू आज भी लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है। सुनते हैं

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