खुशवंत सिंह : “ये वो शख्स है जिसने न इंसान को बख्शा न भगवान को”

खुशवंत सिंह : “ये वो शख्स है जिसने न इंसान को बख्शा न भगवान को”खुशवंत सिंह

खुशवंत सिंह एक भारतीय लेखक, वकील, उपन्यासकार, पत्रकार और राजनीतिज्ञ थे। आज उनकी जयंती है। 2 फरवरी 1915 को उनका जन्म पंजाब के हदाली में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वकील के तौर पर की थी और आठ साल तक लाहौर कोर्ट में प्रैक्टिस भी की लेकिन बाद में उन्होंने कुछ दिनों के लिए वकालत छोड़ दी। 1947 में वे विदेश सेवा के लिए चुन लिए गए। उन्होंने स्वतंत्र भारत में सरकार के इंफॉरमेशन ऑफिसर के तौर पर टोरंटो और कनाडा में सेवाएं दीं।

वह 1980 से 1986 तक राज्य सभा के सदस्य भी रहे। उन्होंने 'डेल्ही', 'ट्रेन टु पाकिस्तान', 'दि कंपनी ऑफ़ वुमन' जैसे कई मशहूर उपन्यास लिखे। 1974 में खुशवंत सिंह को पद्म भूषण का सम्मान मिला लेकिन अमृतसर के 'स्वर्ण मंदिर' में केन्द्र सरकार की कार्रवाई के विरोध में उन्होंने 1984 में लौटा दिया था। साल 2000 में उन्हें 'वर्ष का ईमानदार व्यक्ति' चुना गया। वर्ष 2007 में इन्हें 'पद्म विभूषण' से भी सम्मानित किया गया। 20 मार्च, 2014 को उनका निधन हो गया। खुशवंत सिंह ने अपनी मौत से पहले अपना ही स्मृति लेख लिखा था। जिसमें उन्होंने लिखा -

“ये वो शख्स है, जिसने न तो इंसान को बख्शा न ही भगवान को, उस पर अपने आँसू न खर्चा करो, यह उसकी एक आदत थी, गंदी चीजें लिखना उसे बड़ा मज़ेदार लगता था, भगवान का शुक्रिया कि वो अब मर चुका है।”

आज उनकी जयंती पर पढ़िए उनके उपन्यास 'समुद्र की लहरों' का एक अंश...

यह उपन्यास भारत के एक प्रधानमंत्री के जीवन पर आधारित है और इसमें कई ऐसी बातें उन्होंने लिखी हैं जो पहले प्रकाश में नहीं आई। उनके बचपन से लेकर लन्दन में उनके किशोर जीवन और बाद में उनके प्रधानमंत्री काल तक सभी अनछुए प्रसंगों का चित्रण है। ऐसे उपन्यास लिखना साहस का काम है। मूलतः अंग्रेज़ी में लिखा गया उपन्यास प्रकाशित होते ही ‘बेस्ट सेलर’ बन गया।

समुद्र की लहरों में

दो दिन, दो रात उसका पार्थिव शरीर राजभवन के दरबार हॉल में रखा रहा। वहां से अरब सागर ठीक सामने नज़र आता था। राजभवन के दरवाज़े हर किसी के लिए खोल दिए गये थे। ताकि लोग उस शख़्स को अपनी श्रद्धांजलि दे सकें जिसने देश के लिए बहुत कुछ किया। याद नहीं आता कि उस दौर में इतना किसी और ने किया। हालांकि बहुत कम लोग उसे व्यक्तिगत रूप से जानते थे, लेकिन जीते जी उसका नाम महान लोगों में शुमार हो गया था। राजभवन के गेट से मील भर दूर तक हाथों में फूल-मालाएं लिए श्रद्धांजलि देने वालों की कतार थी। क़ायदे-क़ानून को ताख पर रख दिया गया था। पुलिस थी सिर्फ ये देखने के लिए कि लोग बिना रुके अर्थी के आगे बढ़ते रहें। मौत के बाद भी उसके चेहरे पर विजय और विद्रोह के भाव थे। कुछ लोग उसकी अकूत दौलत की वारिस, उसकी बेटी को एक झलक देखने की फ़िराक में इधर-उधर मंडरा रहे थे। लेकिन उन्हें मायूस ही लौटना पड़ रहा था। सिर्फ़ उसकी बुज़ुर्ग बहनें, कुछ खास लोगों के साथ, हॉल में नज़र आ रही थीं।

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उसकी मौत के अगले दिन ही अखबारों में उसकी वसीयत छपी थी, जिसमें उसने अपनी सारी संपत्ति अपनी एकलौती औलाद भारती के नाम करने के साथ, यह भी चाहा था कि उसे समुद्र के किनारे गेटवे ऑफ इंडिया और एलिफैंटा टापू के बीच उस जगह प्रवाहित किया जाए जहां उसका जल भारती नामक याट यानी हल्का जहाज़ लंगर डाले रहता था। उसने अपनी आधी ज़िंदगी तो इस नौका पर ही बितायी थी। इसपर सवार होकर वह बंबई के शोर और बदबू से बचे रहकर शहर के बेहतरीन नज़ारे का मज़ा लिया करता था। और यहीं पर अपना सफ़र खत्म करना चाहता था। उसने यह भी साफ़ कर दिया था कि उसके अंतिम संस्कार के वक़्त कोई धार्मिक क्रिया कर्म न किया जाए।

अंतिम संस्कार का सारा कामकाज भारती की देखरेख में हो रहा था। अपने पिता के शव को राजभवन से ले जाने के लिए ठीक दस बजे तोपगाड़ी के इंतज़ाम के लिए उसने गवर्नर से कह दिया। शवयात्रा मैरीन ड्राइव से होते हुए जानी थी। बीच में, उसके पिता के नाम पर बनी जय भगवान टावर्स नाम की तीस मंज़िली इमारत पर दस मिनट ठहरना था, ताकि इस इमारत के दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी उसे विदा कर सकें जिसने उन्हें रोजगार दिया। वहां से शवयात्रा गेटवे ऑफ इंडिया की ओर बढ़ेगी जहां जल भारती लंगर डाले खड़ी है। सिर्फ पांच गाड़ियां शव वाहन के पीछे चलेंगी। पहली गाड़ी में भारती होगी। अगली दो गाड़ियों में उसकी बुआएं, उनके पति और बच्चे होंगे। चौथी कार में उसके गुरु और योग शिक्षक स्वामी धनंजय महाराज। और आखिरी गाड़ी, जो कि एक खुली वैन होगी, उसमें उसके पिता के करीबी, तांत्रिक साध्वी मां दुर्गेश्वरी और उनका पालतू शेर, सिर्फ़ भारती, उसे योग सिखाने वाली मां दुर्गेश्वरी देवी और शेरू को याट पर चढ़ने की छूट थी।

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ठीक दस बजे राजभवन से तोप का एक गोला दागा गया। उसकी आवाज़ सारे शहर में गूँज गयी। कबूतरों के झुंड के झुंड हवा में उड़ गये और इमारतों पर वापस बैठने से पहले देर तक आसमान में चक्कर काटते रहे। हज़ारों कौवे कांव-कांव करते हवा में उड़ गये, जैसे धमाके का विरोध कर रहे हों। फिर सन्नाटा छा गया। सेना के बैंड की मातमी धुन के स्वर के साथ शवयात्रा वाल्केश्वर हिल से नीचे से नीचे चौपाटी की ओर बढ़ चली। मैरीन ड्राइव के दोनों ओर बड़ी तादात में लोग मौजूद थे। जहां से अर्थी गुजरती, छज्जों पर खड़े लोग ऊपर से गुलाब की पंखुड़िया फेंकते। महिलाएं उस पुरुष के लिए आंसू बहा रही थीं जिन्हें भले ही ज़्यादातर ने देखा नहीं था, लेकिन उनकी मौजूदगी ताउम्र अपने इर्द-गिर्द महसूस करती रही थीं।

जय भगवान टावर्स पर ठहरने के बाद शवयात्रा गेटवे ऑफ इंडिया की ओर बढ़ चली। उस रास्ते पर भी सड़क और आसपास की सारी खुली जगह खचाखच भरी हुई थी। सफ़ेद साड़ी पहने भारती अपनी कार से निकली। अपनी सूजी आँखों को छुपाने के लिए उसने गहरे रंग के चश्में लगा रखे थे। अर्थी को तोपगाड़ी से उतारा गया। छह सैनिकों ने उसे कंधा देकर धीमे-धीमे चलते हुए याट तक पहुंचाया। वहीं खड़ी जय भगवान की बहनों ने अर्थी के आगे सिर झुकाया और चुपचाप लौट पड़ीं। चौराहे पर लगी मूर्ति जैसे शांत हावभाव और लंबे कद वाले स्वामी धनंजय महाराज, सफ़ेद मलमल की लुंगी और वैसा ही कपड़ा तन के ऊपरी हिस्से पर डाले भारतीय के साथ चल रहे थे। इसी तरह मां दुर्गेश्वरी भी बाघ की खाल का अधोवस्त्र और केसरिया रंग का रेशमी कुर्ता पहने शेरू की चांदी की ज़ंजीर थामें चल रही थीं। जैसे ही वह तीनों आँखों से ओझल हुए, भीड़ जय भगवान ज़िंदाबाद और जय भगवान अमर रहें के नारे लगाने लगी।

भारती, स्वामीजी और मां दुर्गेश्वरी अपने बाघ के साथ नौका पर चढ़े। नौका का लंगर ऊपर चढ़ाया गया, और वह बढ़ चली बादलों से पटे आकाश तले धूसर-हरे से समुद्र की ओर। समुद्र में जहाँ जय भगवान का पार्थिव शरीर लहरों के हवाले किया गया, वहां क्या-क्या घटा यह भारती, स्वामीजी और मां दुर्गेश्वरी के अलावा अगर और कोई जान सकता था तो वह सिर्फ़ शेरू ही था।

लोग कयास लगाते रहे कि अगर जय भगवान नहीं चाहता था कि उसके अंतिम संस्कार में कोई धार्मिक कर्मकांड किया जाए तो फिर उस समय स्वामीजी और तांत्रिक महिला वहां क्या कर रहे थे? किनारे पर लोगों ने स्वामीजी को संस्कृत श्लोकों का उच्चारण करते और योगासनों के बारे में बताते सुना। लेकिन ये किसी की समझ में नहीं आया कि वह यह सब क्यों कर रहे हैं। वह जय भगवान और भारती के कितना क़रीब हैं?

जीते-जागते शेर को साथ लिए मां दुर्गेश्वरी की मौजूदगी तो और भी हैरत में डालने वाली थी। अफ़वाह तो यह थी कि जय भगवान नास्तिक होते हुए भी इस तांत्रिक महिला के मायाजाल में फंस गया था। लेकिन एक गंवार कर्मकांडी औरत और गढ़े हुए उद्योगपति के बीच यह कैसा तालमेल था? यह अलग बात है कि ऐसे सवालों और अटकलबाज़ियों का सिलसिला हफ़्ते दर हफ़्ते और बरसों जारी रहा, लेकिन इन सवालों के जवाब सामने नहीं आये।

सिर्फ़ दोनों महिलाओं, उस शेर और स्वामीजी को पता था कि जय भगवान की इच्छा के खिलाफ़ उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गयी थी और उसके पार्थिव शरीर को अरब सागर की लहरों के सुपुर्द करने से पहले उसपर गंगाजल छिड़का गया था, सिर्फ़ उन्हें मालूम था कि उसके बाद इनमें से एक ने फिर कभी बम्बई नगरी न लौटने का क़सम खाकर यह कहते हुए शहर छोड़ दिया था—‘सुखी रहो, सब तुम्हारा है, अपनी है तो बस गंगा माई और उसकी याद।’

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लेकिन जय भगवान का शरीर को समुद्र में उतारने से चंद मिनट पहले नौका ने उसके निजी केबिन में क्या हुआ था, इस बात का पता न तो स्वामी जी को था और न ही भारती को। भारती ने मां दुर्गेश्वरी को वचन दिया था कि वह उसे जय भगवान के साथ कुछ पल बिलकुल अकेला रहने देगी। उसने अपना वचन निभाया। मां दुर्गेश्वरी केबिन में गयीं। अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। खुली अर्थी को ओर बढ़ीं। फिर पल भर बिलकुल स्थिर खड़ी रहने के बाद वह झुकीं और मृतक के होंठों को कस के चूम लिया। दरवाज़ा खोलने से पहले उन्होंने अपनी कुर्ती की जेब से छोटी-सी कैंची निकाली और जय भगवान के बचे-खुचे चमकदार बालों में से तीन लटें काट लीं। यादगार के तौर पर कुछ तो रहा उसके पास।

जय भगवान के संस्मरण तीन दशक पहले प्रकाशित हुए थे। इनमें मुख्य रूप से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों के साथ उसने भारत को एक महान् राष्ट्र बनाने की अपनी योजनाओं का ब्यौरा दिया था। उसने अपने परिवार, मित्रों और अपने भावनात्मक जीवन के बारे में बहुत कम लिखा। उसके जीवन के इन पहलुओं के बारे में जो भी छपा था वह मुख्यतः कही-सुनी पर आधारित था। जैसे वह सबसे इतना कट कर क्यों रहता है? उसने दूसरी शादी क्यों नहीं की ? दुर्गेश्वरी की कितनी पकड़ थी उस पर?

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भारती का भी यही हाल था। जोड़-तोड़ कर लिखी गयी एक-दो जीवनी थीं जो उसके साक्षात्कारों पर आधारित थी। इनमें से किसी में भी उसने अपने परिवार के दूसरे सदस्यों या दूसरों के साथ अपने निजी संबंधों के बारे में कुछ नहीं कहा था। वह किसी विशेष राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक विचारधारा से नहीं जुड़ी थी। हालांकि उसने भारत और स्विटजरलैंड के स्कूलों में पढ़ाई की थी, लेकिन कोई इम्तिहान उसने पास नहीं किया था और न ही उसके पास कोई डिग्री थीं। जब कभी उससे भविष्य के बारे में कोई सवाल किया जाता तो वह एक सीधा-सा जवाब दिया करती थी—जितनी अच्छी तरह हो सके, अपने पिता की परंपरा को आगे बढ़ाना है।’

अपने पिता की तरह वह भी सबसे अलग-थलग रहने वाली थी। अकसर बीमार रहनेवाली अपनी माँ और आकर्षक पिता की छवि उसके रूप-रंग झलकती थी। उसके प्रेम प्रसंग को लेकर अटकलों का बाज़ार गर्म रहता था। कुछ लोगों का मानना था कि वह अपने पिता के प्रभाव में इस कदर जकड़ी है कि उसे कोई ऐसा पुरुष मिलता ही नहीं जिसे पति बनाया जा सके। कुछ का मानना था कि पुरुष के साथ की कोई इच्छा नहीं थी, बल्कि पुरुष से नज़दीकी से दिक्कत है। सच्चाई तो यह थी कि वास्तव में किसी को भी उसके बारे में इससे ज़्यादा कुछ नहीं पता था कि वह बदमिज़ाज, नकचढ़ी और अपने ख़िलाफ़ आने वालों के लिए बेरहम थी।

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