"वो ग़ज़ल मुग़ल बादशाह की नहीं, मेरे दादा की थी"

Jamshed Siddiqui  30 July 2017 9:54 AM GMT

वो ग़ज़ल मुग़ल बादशाह की नहीं, मेरे दादा की थीजावेद अख़्तर 

साल 1960 में एक फिल्म आई थी, नाम था 'लाल किला', फिल्म के निर्देशक थे नाना भाई भट्ट, जो कि मशहूर निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट के पिता थे। फ़िल्म मुगलिया दौर की कहानी थी, जो लाल किले के इर्दगिर्द घूमती थी। नाना भाई भट्ट से फिल्म के निर्माता एच.एल. खन्ना ने कहा था कि वो चाहते हैं कि फिल्म के गाने ऐसे हों जिसे सुनकर लगे कि फिल्म वाकई मुग़लिया ज़माने की है, यानि ज़बान उसी वक्त की हो। नाना भाई भट्ट ने फिल्म के लेखक पंडित गिरीश से जब इस बारे में बात की तो उन्होंने एक राय दी, कि क्यों न फिल्म की शुरुआत मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की ही किसी ग़ज़ल से की जाए।

उस दौर की अदबी दुनिया में बहादुर शाह ज़फर के नाम से एक ग़ज़ल बेहद मशहूर थी। माना जाता था कि ये गज़ल मुग़लिया सल्तनत के आखिरी बादशाह, बहादुर शाह ज़फर की है, वो बादशाह जिनकी ग़ालिब से अच्छी दोस्ती थी, जो खुद शायर थे और जिन्हे बाद में ब्रिटिश हुकूमत ने रंगून भेज दिया था।

बहादुर शाह ज़फर की तस्वीर

हालांकि फिल्म बनने के काफी पहले से ही इस गज़ल को लेकर छुटपुट विवाद भी था। नियाज़ फतेहपुरी (जो 'निगार' नाम की पत्रिका भी चलाते थे) समेत कुछ बड़े शायरों का ये कहना था कि ये गज़ल बहादुर शाह ज़फर की है ही नहीं, ये तो मुज़तर ख़ैराबादी नाम के शायर की है (जो जावेद अख़्तर के अब्बा जां निसार अख़्तर के वालिद थे, यानि जावेद अख़्तर के दादा) लेकिन उस वक्त की इस गज़ल के बारे में 99 फीसदी लोगों का यही मानना था कि गज़ल बहादुर शाह ज़फर की ही है।

फिल्म के निर्देशक नाना भाई भट्ट ने उस गज़ल को फिल्म में शामिल कर लिया, ग़ज़ल को आवाज़ दी मोहम्मद रफी ने। नाना भाई भट्ट को ये गज़ल इतनी पसंद आई कि उन्होंने इस गज़ल से ही फिल्म की शुरुआत की। फिल्म के क्रेडिट रोल खत्म होते ही, ब्लैक एंड वाइट स्क्रीन पर लाल किला उभरता है और फिर मोहम्मद रफी की आवाज़ में ये ग़ज़ल गूंजती है। दर्शकों ने इसे खूब पसंद किया, वो लोग जो शायरी से दूर थे, फिल्म में आने की वजह से उन्हें भी इस गज़ल के बारे में पता चला, बताया गया कि ग़ज़ल मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की ही है।

फिर इस बात को ज़माने बीत गए और फिर शायरी की दुनिया में भी धीरे-धीर ये ही मान लिया गया कि ये गज़ल बहादुर शाह ज़फर की ही है। लेकिन इस किस्से के 60-65 साल बाद.. कहानी पहुंची साल 2014 में, जब बालीवुड के मशहूर गीतकार और स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख़्तर अपने दादा मुज़तर ख़ैराबादी की अलग-थलग पड़ी गज़लों को इकट्ठा करके, एक किताब छपवाने की तैयारी कर रहे थे।

उनके लिए मुश्किल ये थी कि मुज़तर साहब की ग़ज़ले और शायरी कहीं भी मुकम्मल तौर पर एक साथ नहीं थी। लिहाज़ा, जावेद अख्तर को काफी दौड़ धूप करनी पड़ी। उन्होने ख़ैराबाद, लखनऊ, टोंक, रामपुर, इंदौर, ग्वालियर और भोपाल समेत वो सभी शहर जहां-जहां मुज़तर ने अपनी ज़िंदगी में कयाम किया, की खाक छानी और उनके शेरों को एक किताब की शक्ल दी। इसी छानबीन के दौरान जावेद अख़्तर को पता चला कि अब तक दुनिया जिस शेर को बहादुर शाह ज़फर की ग़ज़ल समझ रही थी वो दरअसल उनके दादा की है। साल 2015 में मुज़तर ख़ैराबादी की ग़ज़लों के संकलन 'खिरमन' के लॉंच के मौके पर उन्होंने इस 'गज़ल कॉनट्रोवर्सी' का ज़िक्र भी किया। वीडियो में जानिये, कैसे सुलझी ये पहेली

फिल्म 'लाल क़िला' में उस ग़ज़ल के इस्तेमाल होने के बाद उसे कई लोगों ने गाया, लेकिन हक़ीकत में कोई नहीं जानता था कि इसे लिखा किसने है
जावेद अख़्तर

शायरी की दुनिया में ये पहला मामला नहीं है, ऐसे तमाम शेर हैं जो किसी की कलम से निकले थे लेकिन किसी और के नाम हो गए। जिगर और ज़ौक के तमाम शेर अक्सर ग़ालिब के समझ लिये जाते हैं। ख़ैर, अब ये साफ हो चुका है कि वो मशहूर गज़ल मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की नहीं बल्कि मुज़तर ख़ैराबादी की थी। चलते-चलते, आइये एक बार सुन भी लेते हैं, उस बेहतरीन और खूबसूत गज़ल को, मुज़तर ख़ैराबादी के पर-पोते फरहान अख़तर की ज़ुबानी।

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