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जावेद अख़्तर की सालगिरह पर ख़ास

Jamshed Siddiqui  17 Jan 2018 3:14 PM GMT

जावेद अख़्तर की सालगिरह पर ख़ासजावेद अख़्तर 

ये लेख गाँव कनेक्शन के दोस्त और युवा शायर हाशिम रज़ा जलालपुरी ने लिखा है। हाशिम ऑल इंडिया मुशायरों में शिरकत करते रहते हैं और उनकी गज़ले और नज़्में रेख़्ता समेत कई वेबसाइट्स और रिसालों में मौजूद है। इन दिनों वो ‘मीराबाई’ का उर्दू अनुवाद भी कर रहे हैं जो बहुत जल्द मंजर ए आम पर होगा। उनसे hashimrazajalalpuri@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

2005 में लखनऊ चौक स्टेडियम के मुशायरे में जावेद अख्तर को पहली बार लाइव सुनने का इत्तिफ़ाक़ हुआ। जहाँ तक मुझे याद आता है कि जावेद अख्तर ने 45 मिनट शायरी सुनाई, मुशायरा पंडाल में वाह वाह, क्या कहने और मुकर्रर की सदाएँ गूँज रही थीं। जावेद अख्तर ने कई नज़्में और ग़ज़लें सुनाईं मगर उनके चाहने वालों की फरमाइशें ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं। मेरे लिए यह सब किसी खूबसूरत ख्वाब की तरह था क्यूंकि मैं उस वक़्त इल्म से फिल्म तक शोहरत रखने वाले शायर जावेद अख्तर को सुन भी रहा था और देख भी रहा था। जावेद साहब की दिल फ़रेब आवाज़, पुर कशिश लहजा, दिलकश अंदाज़ और खूबसूरत शायरी सुनने वालों के दिल और दिमाग़ में रंग और खुशबू की तरह घर कर रही थी। मैं जावेद साहब की शायरी से लुत्फ़ अन्दोज़ होने के साथ साथ हैरान भी था कि कैसे कोई इंसान इतने सादा, आम और आसान लफ़्ज़ों में इतनी मुश्किल, पेचीदा और बड़ी बड़ी बातें कह लेता है। शायद इसी को लफ़्ज़ों की जादूगरी कहते हैं और लफ़्ज़ों के जादूगर को जावेद अख्तर

आज जावेद अख्तर का जनम दिन है। जावेद अख्तर ने 17 जनवरी 1945 को जांनिसार अख्तर और सफिया अख्तर के घर खैराबाद सीतापुर उत्तर प्रदेश में आँख खोली। वालिद जांनिसार अख्तर ने अपनी नज़्म के मिसरे " लम्हा लम्हा किसी जादू का फ़साना होगा " पर जावेद अख्तर का नाम जादू रखा। बाद में यह नाम बदल कर जावेद कर दिया गया जो कि जादू से नज़दीक था।

जावेद और शबाना

जावेद अख्तर की परवरिश और तरबियत ऐक इल्मी और अदबी घराने में हुयी। परदादा अल्लामा फज़ले हक़ खैराबादी (जिन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ 1857 में बग़ावत का फतवा दिया और काला पानी की सज़ा हुई), दादा मुज़्तर खैराबादी (लेनिन अवार्ड से सम्मानित शायर), वालिद जांनिसार अख्तर (मशहूर शायर और नग़मा निगार), वालिदा सफिया अख्तर (ज़ेरे लब की राइटर) तो मामूं उर्दू शायरी के कीट्स मजाज़ लखनवी थे।

ऐसे घराने में जिसके कई सितारे अदब और शायरी के आसमान पर पहले से ही पूरी आबो-ताब के साथ जलवागर हों, अपनी अलग शिनाख्त और पहचान क़ायम करना कितना मुश्किल काम होता है।

अपनी मंज़िल पे पहुंचना भी खड़े रहना भी

कितना मुश्किल है बड़े हो के बड़े रहना भी
शकील आज़मी

लेकिन जावेद अख्तर ने अपनी इल्मी और अदबी सलाहियत और क़ाबिलियत की बिना पर इस मुश्किल काम को भी आसान कर दिखाया। अक्सर ऐसा होता है कि नए चिराग़ पुराने चिराग़ोंकी तेज़ रौशनी के असर में आकर अपनी चमक खो देते हैं और उनके बुज़ुर्ग ही उनके परिचय का सबब बन जाते हैं, जैसे फलाँ साहब के पोते, फलाँ साहब के बेटे, फलाँ साहब के भांजे मगर जावेद अख्तर ने इसके बरअक्स कभी भी कहीं भी अपने बुज़ुर्गों के नाम की नुमाइश नहीं की बल्कि अपनी शख्सियत और शायरी के चिराग़ की लौ को इतना तेज़ किया की वो पुराने चिराग़ों की रौशनीओं से मुक़ाबिला करने लगी और जावेद अख्तर अपने बुज़ुर्गों के परिचय का सबब बन गए। आज जब कहीं भी मुज़्तर खैराबादी का ज़िक्र होता है तो लोग बेसाख्ता कहते हैं कि जावेद अख्तर के दादा

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता

मुझे पामाल रस्तों का सफर अच्छा नहीं लगता
जावेद अख़्तर

जावेद अख़्तर

घर के माहौल के ज़ेरे असर जावेद अख्तर ने बचपन में ही उर्दू और दीगर ज़बानों का साहित्य पढ़ना शुरू कर दिया। जिस उम्र में बच्चे खेल कूद में दिलचस्पी रखते हैं उस उम्र में जावेद अख्तर को हज़ारों शेर ज़बानी याद थे। स्कूलों और कॉलेजों के डिबेट और बैतबाज़ी में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे। उर्दू और दूसरी ज़बानों के शायरों के दीवान पढ़ लेने और शायराना सलाहियत होने के बावजूद भी जावेद अख्तर ने अपनी शायरी के सफर का आग़ाज़ देर से किया।

जावेद अख्तर की दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, पहली किताब- तरकश, दूसरी किताब- लावा। पहली किताब ‘तरकश’ का दीबाचा क़ुर्रतुलऐन हैदर ने और दूसरी किताब ‘लावा’ का दीबाचा गोपी चन्द नारंग ने लिखा, दोनों ही जावेद अख्तर के शायराना शऊर से बेहद प्रभावित नज़र आते हैं।

मैं सोचता हूँ
यह मोहरे क्या हैं
अगर मैं समझूँ
कि जो यह मोहरे हैं
सिर्फ लकड़ी के हैं खिलौने
तो जीतना क्या ही हारना क्या
- जावेद अख़्तर

सिवाये मोहब्बत और इंसानियत के कोई भी फलसफा तमाम ज़िन्दगी नहीं निभाया जा सकता। मोहब्बत में जीत की तमन्ना और हार का इमकान नहीं होता क्यूंकि मोहब्बत कोई जंग का मैदान नहीं है बल्कि खुदा की अता की हुई वो नेमत है जिस में इंसान सब कुछ हार कर भी जीता हुआ महसूस करता है।

फतह की चाह नहीं हार का इमकान नहीं

यह मोहब्बत है कोई जंग का मैदान नहीं
हाशिम रज़ा जलालपुरी

जावेद अख़्तर और सलीम ख़ान, ‘शोले’ की स्क्रिप्ट देखते हुए

ग़ालिब ने कहा था कि "आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना " यानी आदमी का इंसान होना ऐक दुश्वार अमल है जिसके लिए बड़ी रियाज़त दरकार होती है। किसी भी शायर के लिए इंसान होना उतना ही ज़रूरी है जितना की रात और अंधेरों के वजूद को मिटाने के लिए सूरज का निकलना। तस्लीम कीजिये अगर सूरज ना निकले तो दिन और उजालों का कोई वजूद नहीं होगा और पूरी दुनिया रात और अंधेरों के क़ब्ज़े में आ जायेगी। अच्छी और सच्ची शायरी वही होती है जो इंसानियत का परचम उठा कर इंसानी दिल और दिमाग़ से रंग, नस्ल और मज़हब के फ़र्क़ को मिटा कर उजालों की हुकूमत का ऐलान करे। जावेद अख्तर की शायरी ज़िन्दगी के हर मुक़ाम पर इंसानियत की अलमबरदारी करती हुयी नज़र आती है। यही वजह है की जावेद साहब मोहब्बत करने वाले इंसानों के शायर हैं यानी मोहब्बत और इन्सानियत के शायर हैं।

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मुझे दुश्मन से भी खुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर, क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता
जो हो सके तो ज़ियादा ही चाहना मुझको
कभी जो मेरी मोहब्बत में कुछ कमी देखो
~ जावेद अख़्तर

जावेद अख़तर की एक पुरानी तस्वीर

आज जब हमारे मुल्क में नफरत अंगेज़ तक़रीरों के ज़रिये डर और दहशत का माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है। इंसानों को इंसानों से दूर किया जा रहा है। हमारी गंगा जमुनी तहज़ीब के माथे पर मुसलसल ज़ख्म लगाया जा रहा है। चारों तरफ नफरत के बीज बोये जा रहे हैं, जिसका नतीजा मोहब्बत और इंसानियत के लिए अल्लाह जाने क्या खबर ले कर आये। इन हालात में कोई ज़िंदा ज़मीर और दर्द मंद इंसान खामोश नहीं रह सकता। जावेद अख्तर इन नफरत के सौदागरों की पुरज़ोर मुखालिफत करते हुए कहते हैं कि

नफ़रत करने वालों ने हुकूमत की होगी मगर शायरी तो मोहब्बत करने वालों ने की है
जावेद अख़्तर

जिसकी आँखों ने मज़हब के नाम पर जलते हुए शहर और मरते हुए इंसान देखे हों, जिसकी आँखों ने ऐसे ऐसे खून में डूबे हुए मंज़र देखे हों जिनको देख कर आसमान की आँखों से भी खून के आंसूं टपके हों, उस से ज़ियादा इस दर्द को कौन समझ सकता है। जावेद अख्तर की शायरी इंसानों के दरमियान फासलों को कम करती है और दुनिया के तमाम इंसानों को डर, दहशत और नफरत के नतीजों से आगाह करती हुयी मोहब्बत का पैग़ाम देती है।

जब जल रहा था शहर तो सुर्ख आसमान था
मैं क्या कहूं थी कैसी क़यामत की रौशनी

जावेद अख्तर को उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए पद्मश्री (1999), पद्मभूषण (2007), साहित्य अकादमी अवार्ड (2013) और ना जाने कितने अवार्ड्स से नवाज़ा गया है और उनका इल्मी और अदबी सफर मुसलसल जारी है, हम उनकी लम्बी उम्र के लिए दुआ करते हैं ताकि उनकी शायरी के ज़रिये मुहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम आम होता रहे।

- हाशिम रज़ा जलालपुरी

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