जय शंकर प्रसाद की सालगिरह पर: परिचय और एक दिलचस्प क़िस्सा

जय शंकर प्रसाद की सालगिरह पर: परिचय और एक दिलचस्प क़िस्साजय शंकर प्रसाद

परिचय: 1936 में था एक लाख का कर्ज़

जय शंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1890 को बनारस में हुआ था। वो एक संपन्न और सम्मानित परिवार से थे। उनके पिता बाबू देवी प्रसाद इत्र, ज़र्दा और खुश्बू का कारोबार करते थे। सैकड़ों कर्मचारी थे जिनके परिवार उसी घर से चलते थे। प्रसाद बचपन से ही साहित्य के प्रति रुझान रखते थे, जिससे उनके पिता और उनके बड़े भाई बाबू शंभूरतन भी खुश थे। लेकिन आठ साल की उम्र में उनकी मां और दस साल की उम्र में पिता की मृत्यु के बाद घर के आर्थिक हालात खराब होने लगे।

कारोबार अब रिश्तेदारों ने संभाल लिया था लेकिन धीरे-धीरे कारोबार ऐसा चौपट हुआ कि साल 1930 में जय शंकर प्रसाद पर एक लाख रुपये का उधार हो गया था। लेकिन अपनी कड़ी मेहनत और लगन से उन्होंने हालात दोबारा ठीक किये और फिर से साहित्य की सेवा में लग गए। उन्होंने चंद्रगुप्त समेत कई नाटक लिखे। धीरे-धीरे उनके नाटक साहित्य समाज में खूब पसंद किये जाने लगे। एक बार किसी ने कहा कि “प्रसाद जी, आप के बारे में कहा जाता है कि आपके नाटक रंगमंच के पैमानों पर खरे नहीं उतरते” तो प्रसाद जी ने कहा कि “ रंगमंच नाटक के किए होते हैं, नाटक रंगमंच के लिए नहीं लिखे जाते”

जय शंकर प्रसाद जी की कमायनी जो उन्होंने साल 1936 में लिखी थी, हिंदी साहित्य की वो अमर कृति मानी जाती है जिसमें मानवता की हर अनुभूति महसूस की जाती है। कहा जाता है कि दर्द और खुशी का ऐसा कोई रंग नहीं है जो कामायनी में न हो।

जयशंकर प्रसाद की व्यक्तिगत ज़िंदगी बहुत खुशियों भरी नहीं रही। मां और पिता का इंतकाल तो बचपन में ही हो गया था। साल 1906 में बड़े भाई भी गुज़र गए। इसके बाद उनकी भाभी ने उनका विवाह कराया। उनकी पत्नी का नाम विंध्यवाटिनी था। लेकिन टीवी बीमारी से 1916 में वो भी चल बसीं। हालांकि इसके बाद जयशंकर प्रसाद ने अकेले रहने का मन बना लिया था लेकिन भाभी ने दोबारा शादी के लिए उन्हें मना लिया और उनकी दूसरी शादी कमला देवी से करा दी गई, जिससे 1922 में उन्हें रत्न शंकर नाम का बेटा भी हुआ।

इस दौरान प्रसाद जी को भी टीबी बीमारी ने घेर लिया। वो कमज़ोर रहने लगे थे। कामायनी लिखने के एक साल बाद साल 1937 में नवंबर की 15 तारीख को वो सुबह का वक्त था, जब हिंदी साहित्य का ये सितारा हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा हो गया।

जब प्रेमचंद और जैनेन्द्र मिलने पहुंचे

अज्ञेय उन दिनों जेल में थे लेकिन उनकी किताब आने वाली थी। अज्ञेय के करीबी दोस्तों में साहित्यकार जैनेंद्र औऱ मुंशी प्रेमचंद थे, जिनसे उन्होंने कहा था कि वो चाहते हैं कि उनकी किताब की भूमिका जय शंकर प्रसाद लिखें।

ये काम कठिन था क्योंकि पूरा साहित्य समाज जानता था कि जय शंकर प्रसाद को भूमिकाएं लिखना पसंद नहीं था, वो बहुत सामाजिक व्यक्ति भी नहीं थे, न तो कवि सम्मेलनों में जाते थे और न ही गोष्ठियों में। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने महाकवि निराला की एक किताब के लिए ही चंद पक्तियों में भूमिका लिखी थी।

इस घटना को याद करते हुए जैनेन्द्र ने लिखा है कि वो और मुंशी प्रेमचंद जयशंकर प्रसाद से मिलने उनके घर पहुंचे और उनसे कहा कि आपसे एक दोस्त की पुस्तक की भूमिका लिखवाने का आग्रह है। “पहले पूछा, कौन है', मैंने कह दिया कि मैं आया हूँ, कह रहा हूँ, इसी से जान लीजिए।' जैनेंद्र का मतलब था कि मैं खुद आया हूं तो ज़ाहिर है अपने खास दोस्त अज्ञेय के लिए ही कह रहा हूं। ‘थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले, तुम कुछ चाहोगे, यह मैंने नहीं सोचा था, पर तुमने भी न सोचा होगा कि तुम कहोगे और 'प्रसाद' न कर पाएगा।'

जैनेन्द्र ने फिर से आग्रह किया- ‘मान लीजिए और कुछ नहीं तो, कारण यही (सही) कि अज्ञेय आपके लिए अज्ञात है, जेल में है।' प्रसाद ने उठते हुए कहा- 'कहोगे तो तुम जैनेन्द्र ... कि एक बात जो तुमने कही और 'प्रसाद' ने वह भी न रखी’। क्यों साहब' मैंने कहा- 'यह कहना भी अब मुझसे छीन लेंगे आप? एक तो आपने बात रखी नहीं, फिर हम कह भी न पाएँ कि नहीं रखी। कहिए प्रेमचंदजी यह अन्याय सहा जाए और अपनी वाक्‌-स्वतंत्रता को छिन जाने दिया जाए इस पर प्रेमचंद ने भी ठहाका लगाया लेकिन ठहाके में जयशंकर प्रसाद भी शामिल हुए।

ज़ाहिर है जय शंकर प्रसाद ने इस आग्रह को नहीं माना लेकिन तीनों की मुस्कुराहट में कहीं कुछ भी छुपा नहीं था।

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