मैं उनकी अधबुझी सिगरेट संभाल कर रख लेती थी - अमृता प्रीतम

मैं उनकी अधबुझी सिगरेट संभाल कर रख लेती थी - अमृता प्रीतमसाहिर और अमृता

बात 1944 की है। अमृता प्रीतम एक मुशायरे में शिरकत कर रही थीं। वहां उर्दू-पंजाबी के नामवर शायर भी थे। कहा जाता है कि साहिर लुधियानवी पर अमृता की पहली नज़र भी इसी मुशायरे में पड़ी थी। अमृता, साहिर की शख्सियत के बारे में जानकर दिल को उस ओर झुकने से रोक ना सकीं। अमृता का दीवाना इश्क़ उस महफिल से ही साहिर की इबादत करने लगा। वो लिखती हैं...

मुझे नहीं मालूम कि साहिर के लफ्जों की जादूगरी थी या कि उनकी खामोश नज़र का कमाल था। लेकिन कुछ तो था जिसने मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया
अमृता प्रीतम

मुशायरा ख़त्म होते-होते आधी रात होने को आई थी। मेहमानों ने एक दूसरे को खुदा हाफिज कहा और अपने अपने मुकाम की ओर रुख कर लिया। अगली सुबह सबको नज़दीकी शहर लोपोकी जाना था, वहां से आगे वापस लाहौर तक जाने के लिए बस का इंतजाम था। सुबह हुई..बारिश से फिज़ा नम सी पड़ गई थी। बीती रात बारिश हुई थी। बारिश के पानी से सड़कों को फिसलन बढ़ गई थी। लोपोकी की ओर जाने वाला रास्ता बरसात में थोड़ा ख़तरनाक हो गया था। दरअसल बादलों ने इलाके को मुशायरे के पहले घेरे में लेना शुरू कर दिया था। प्रोग्राम ख़त्म होने के मंजिल पर हल्की रिमझिम होने लगी थी। अमृता ने इन हालात में खुदाई फैसला देखा। यह किस्मत का हाथ था। उस मुशायरे की रात को याद करते हुए अमृता लिखती हैं

आज जब उस रात को मुड़कर देखती हूं तो ऐसा समझ आता है कि तक़दीर ने मेरे दिल में इश्क़ का बीज डाला जिसे बारिश की फुहारों ने बढ़ा दिया ...
अमृता प्रीतम

मेहमान लोपोकी जाने के लिए बेचैन से रहे। सो थोड़ा बहुत ख़तरा मोल लेकर निकलने की दिल में ठान ली। इन सब बातों ने इश्क़ के लिए खूबसूरत

हालात बना दिए। जिनमें अमृता ने दिल में इश्क़ के फूल को खिलते महसूस किया। आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में अमृता ने खामोशी से बढ़ते इश्क के ज़िक्र में लिखती हैं..जब साहिर मुझसे मिलने लाहौर आते। वो हमारे दरम्यान रिश्ते का विस्तार बन जाता। मेरी खामोशी का फैलाव हो जाता। मानो ऐसे जैसी मेरी बगल वाली कुर्सी पर आकर वो चुपचाप चले गए हो। वो आहिस्ता से सिगरेट जलाते, थोड़ा कश लेकर उसी आधी छोड़ देते। जली सिगरेट को बीच में छोड़ देने की आदत सी थी साहिर में। अधजली सिगरेट को रखकर नयी जला लेते थे। जैसे हमेशा कुछ बेहतर तलाश रहे हों। साहिर की अधूरी सिगरेट को संभाल कर रखना सीख लिया था मैंने। अकेलेपन में यह मेरी साथी थी। उन्हें उंगलियों में थामना मानो साहिर का हाथ थामना था। उनकी छुअन को महसूस करना था..सिगरेट की लत मुझे ऐसे ही लगी। साहिर ने बहुत बाद में मुझसे अपने इश्क़ का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वो मेरे घर के पास घंटों खड़े रहकर खिड़की खुलने का इंतजार करते थे। घर के नुक्कड़ पर आकर पान खरीदते, सिगरेट सुलगाते या फिर हाथ में सोडे का गिलास ले लेते।

बंटवारे के बाद अमृता धीरे-धीरे दिल्ली की होकर रह गई..जबकि साहिर बम्बई में एक स्थापित नाम हो गए। साहिर से ज़मीन की दूरी को पाटने का अनोखा तरीका अमृता ने ईजाद कर लिया था। साहिर के साथ गुजरे वक़्त को अपने लेखन में शामिल करना शुरू कर दिया। अमृता के इन अनुभवों को आखरी ख़तों में महसूस किया जा सकता है। इन्हें 'दिल्ली की गलियां' और 'एक थी अनीता' में भी पढ़ा जा सकता है। साहिर-अमृता से जुड़ा एक किस्सा 'आखरी ख़त' कहानी से जुड़ा है।

दरअसल उर्दू की साप्ताहिक पत्रिका 'आईना' ने अमृता को पब्लिकेशन के लिए एक कहानी लिखना थी। माना जाता है कि 'आखरी ख़त' वही है। कहानी में साहिर से अमृता की पहली मुलाकात का ज़िक्र मिलता है। बहुत दिन बीत जाने पर भी जब साहिर की तरफ़ से ख़याल नहीं मिला तो अमृता उनके पास खुद चली आई..साहिर लिखते हैं

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मुझ तक जब ये मैगज़ीन पहुंची तो यकायक ख़्याल आया कि दुनिया को दिखा दूं..कि देखो अमृता ने मेरे वास्ते अफ़साना लिखा है लेकिन फ़िर मुझे ख्वाजा अहमद अब्बास और कृष्ण चंद्र जैसे दोस्तों का ख़याल आया। मैंने खुद को रोका।
साहिर लुधियानवी

कुल मिलाकर साहिर-अमृता के बीच एक अजीब सा लेकिन खूबसूरत रिश्ता था। लेकिन वक़्त और हालात की गर्द में साहिर के खामोश रवैये ने इसे अजीब बना डाला। अमृता ने भी अपने दिल की बात को लिखा ज़्यादा साहिर से सीधे रूबरू हो कम मिली। दिल्ली-लाहौर और बम्बई की दूरियों में प्यार को ज्यादा वक़्त नहीं मिला। दोनों के बीच मुश्किल से सीधे बातचीत होती थी। अमृता लिखती हैं.. दो चीजों ने साहिर मेरे बीच मुहब्बत को पूरी जिंदगी नहीं दी - एक खामोशी जो कि आखिर तक दिलों को दुखाती रही। दूसरी वजह ज़बान के फ़र्क की रही, पंजाबी और उर्दू का फ़र्क।

लेखक सैयद एस.तौहीद फ़िल्म रिसर्चर हैं। इनसे passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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