सिर्फ 8 नगमों के दम पर ये कलाकार आज भी करता है दिलों पर राज 

Shivendra Kumar SinghShivendra Kumar Singh   27 May 2017 5:32 PM GMT

सिर्फ 8 नगमों के दम पर ये कलाकार आज भी करता है दिलों पर राज मास्टर मदन।

क्या आप सोच सकते हैं कि हिंदुस्तानी संगीत में एक ऐसा भी कलाकार हुआ जिसके सिर्फ 8 नगमें ही रिकॉर्ड हुए और वो उन्हीं आठ नगमों के दम पर अब भी लाखों संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करता है। यूं तो कोई भी ये बात दावे से नहीं कह सकता कि उसने कितने गाने गाए थे लेकिन ये बात तय है कि रिकॉर्ड 8 ही हुए थे। उस कलाकार की मौत हिंदुस्तान की आजादी से काफी पहले हो गई थी यानि सात दशक से भी पहले लेकिन आज भी उस कलाकार को हम उसके उन्हीं 8 नगमों की वजह से जानते हैं...याद करते हैं।

उसके वही 8 नगमें कई कलाकारों के सैकड़ों नगमों पर भारी हैं। तो चलिए आज आपको एक ऐसे ही जबरदस्त कलाकार की कहानी सुनाते हैं। आपको संगीत और संगीतकारों से जुड़े किस्से सुनाने के लिए गाँव कनेक्शन ने ये नई सीरीज शुरू की है। आपको ये सीरीज ‘महफिल’ कैसी लग रही है जरूर बताइएगा। चलिए आज के अपने कलाकार की कहानी आपको सुनाते हैं। ये महान कलाकार थे- मास्टर मदन।

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अब सबसे पहला सवाल ये है कि आपने कभी मास्टर मदन को सुना है? अगर नहीं सुना तो जरूर सुनना चाहिए। मास्टर मदन ने सिर्फ साढ़े 14 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया था। 28 दिसंबर 1927 को वो पंजाब में जालंधर के नजदीक खानखाना में जन्मे थे। इस गाँव के नाम की कहानी भी दिलचस्प है। कहते हैं कि इस गाँव की खोज अकबर के नवरत्न अब्दुल रहीम खानखाना ने की थी। उन्हीं के नाम पर इस गाँव का नाम पड़ा। इसी गाँव में मास्टर मदन का जन्म हुआ। मास्टर मदन के रिकॉर्ड हुए दो गाने अब भी आसानी से उपलब्ध हैं। दोनों ग़ज़लें हैं – इनमें से सबसे लोकप्रिय ग़ज़ल को 1935 में रिकॉर्ड किया गया था। ग़ज़ल लिखने वाले शायर थे सागर निज़ामी। इस ग़ज़ल के शेर कुछ इस तरह हैं।

यूं ना रह रह के हमें तरसाइए/

आइए, आ जाइए, आ जाइए/

फिर वही दानिस्ता ठोकर खाइए/

फिर मेरी आगोश में गिर जाइए/

मेरी दुनिया मुंतज़िर है आपकी/

अपनी दुनिया छोड़ कर आ जाइए/

ये हवा ‘सागर’ ये हल्की चांदनी/

जी में आता है यहीं मर जाइए/

यूं ना रह रह के हमें तरसाइए/

आइए, आ जाइए, आ जाइए

इस ग़ज़ल के अलावा ‘हैरत से तक रहा है जहाने वफा मुझे’ ग़ज़ल भी काफी मशहूर हुई। इन दो गजलों के अलावा रिकॉर्ड किए हुए नगमों में मास्टर मदन के दो पंजाबी गीत हैं, दो ठुमरियां हैं और दो गुरबानी। ‘गोरी गोरी बहियां’ और ‘मोरी बिनती मानो कान्हा रे’ उनकी ठुमरियों के बोल हैं। कुछ समय पहले एचएमवी की एक सीडी आई थी। सीडी का नाम था- ग़ज़ल का सफर। इसमें मास्टर मदन की दोनों ग़ज़लें भी शामिल थीं। इस कलेक्शन का चयन भी भारतीय संगीत के एक बहुत नामी गिरामी कलाकार ने किया था। अफसोस आज वो कलाकार भी हमारे बीच नहीं हैं। उनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं, ग़ज़ल का सफर सीडी में ग़ज़लों का चयन जगजीत सिंह ने किया था। इन ग़ज़लों के अलावा मास्टर मदन के बाकी छह नगमें भी आपको मिल जाएंगे। कोशिश कीजिए और अगर नहीं सुना है तो एक बार उन्हें सुनिए जरूर।

आपको जानकर ताज्जुब होगा कि मास्टर मदन ने साढ़े तीन साल की उम्र में पहला पब्लिक परफॉर्मेंस दिया। 1930 के आस पास इस कार्यक्रम का आयोजन हिमाचल प्रदेश में किया गया था। हिमाचल प्रदेश के जिस शहर में ये कार्यक्रम था वो मास्टर मदन के गाँव से ज्यादा दूर नहीं था। लिहाजा इतनी कम उम्र में उन्हें वहां जाने और कार्यक्रम करने की इजाजत मिल गई। कहते हैं कि उस कार्यक्रम के बाद लोग उनकी आवाज और अदायगी के दीवाने हो गए। इतनी कम उम्र के बच्चों को इस तरह गाते कभी किसी ने सुना ही नहीं था। लिहाजा मास्टर मदन पर ईनामों की बरसात हो गई। ईनाम भी ऐसा वैसा नहीं, उन्हें इनाम में शॉल, सोने की अंगूठी वगैरह मिलीं।

इसके बाद बात कानोंकान फैल गई। संगीतप्रेमी मास्टर मदन को देखने और सुनने के लिए बेताब हो गए। बाद में मास्टर मदन ने देश के कई हिस्सों में गाया। सात साल की उम्र में उन्होंने पंडित अमरनाथ से सीखना शुरू किया। पंडित अमरनाथ मशहूर संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम के बड़े भाई थे। जिन दो ग़ज़लों का जिक्र हमने इस लेख की शुरूआत में किया था। उसका संगीत पंडित अमरनाथ ने ही दिया था। ये सोचकर भी ताज्जुब होता है कि आठ साल की उम्र में मास्टर मदन रेडियो के लोकप्रिय गायक बन चुके थे।

14 साल की उम्र में उनका आखिरी ‘पब्लिक परफॉर्मेंस’ कलकत्ता में हुआ। इसके बाद वो दिल्ली आए। उनके नाम की तब तक धूम मच चुकी थी। कलकत्ता से लौटने के बाद मास्टर मदन ने तीन-चार महीने ही और गाया होगा कि अचानक उनकी तबियत बिगड़ने लगी।

वो शिमला चले गए। जहां उनके माथे और जोड़ों पर अजीब सी चमक दिखाई देने लगी। कोई इलाज काम नहीं आया। आखिरकार 5 जून 1942 को करीब साढ़े चौदह साल की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी मौत पर शिमला बंद रखा गया। पदक पहने हुए ही मास्टर मदन का अंतिम संस्कार किया गया।

आज इतने बरस बाद भी उनकी मौत को लेकर अब भी कुछ साफ तरीके से नहीं कहा जा सकता। हालांकि उनकी मौत के बारे में जितनी भी कहानियां सुनी सुनाई जाती हैं उसमें उन्हें जहर देने का जिक्र जरूर है। कहानियों में फर्क जहर देने की जगह को लेकर है। एक कहानी के मुताबिक पंजाब के ही शहर अंबाला में एक लड़की ने उन्हें कोठे पर बुलाया, जहां उन्हें जहर वाला पान दे दिया गया। कुछ लोगों का कहना है कि कलकत्ता में जब उन्होंने अपना आखिरी कार्यक्रम दिया तब ही उनके पेय पदार्थ में जहर मिला दिया गया, जिसका धीरे-धीरे असर हुआ। कुछ लोग ये भी मानते हैं कि मास्टर मदन को शिमला या दिल्ली में जहर दिया गया। कोई पुख्ता सबूत नहीं है, जहर देने की वजह नहीं मालूम लेकिन अगर ये कहानी सच है तो इसने संगीतप्रेमियों से बहुत ही कम उम्र में एक शानदार कलाकार छिन लिया।

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