किस्सागोई : फर्श पर सोने से लेकर मर्सिडीज तक का सफर तय करने वाले गायक की कहानी

Shivendra Kumar SinghShivendra Kumar Singh   27 Aug 2019 6:39 AM GMT

किस्सागोई : फर्श पर सोने से लेकर मर्सिडीज तक का सफर तय करने वाले गायक की कहानीकिस्सागोई में आज गायक मुकेश।  

अमर चित्रकार और मूर्तिकार लियोनार्डो द विंची की राय में सरल होना सबसे बड़ी खासियत होती है। बॉलीवुड में एक ऐसे गायक थे जिनकी इसी खासियत की बदौलत उन्हें करोड़ों चाहने वाले मिले। उनके गाने सुनिए आपको लगेगा कि ऐसा तो मैं भी गा सकता हूं। भारतरत्न लता मंगेशकर उन्हें भाई मानती थीं। इसके अलावा उनके चाहने वालों में क्रिकेटर चंद्रशेखर और सचिन तेंदुलकर भी शामिल थे।

इस कलाकार से जुड़ा एक किस्सा बड़ा दिलचस्प है। एक बार संगीतकारों की मशहूर जोड़ी कल्याण जी- आनंद जी के स्टूडियो में इस कलाकार ने अपना गाना रिकॉर्ड किया और उसके बाद वो वहां चले गए। उसी दौरान एक शास्त्रीय गायक कल्याण जी- आनंद जी के पास पहुंचे।

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उन्होंने कल्याण जी आनंद जी से पूछा कि इस गायक को राग और सुरों का कुछ पता भी है या ये सिर्फ बगैर कुछ सोचे-समझे गाने गा देता है, चलता भी मर्सिडीज से है। कल्याण जी आनंद जी ने उस शास्त्रीय गायक से बहस करने की बजाए एक अनोखा प्रयोग किया। कल्याण जी-आनंद जी ने वही गाना उस शास्त्रीय गायक को गाने के लिए दिया। गाने के सुर समझा दिए।

जब फिल्म चोरी-चोरी के लिए मुकेश समय नहीं निकाल पाए तो म्यूजिक डायरेक्टर शंकर जयकिशन ने मन्ना डे से गाना गवाने का फैसला किया। इस बात की जानकारी जब स्टूडियो के मालिक को हुई तो उन्होंने यह कहकर रिकॉर्डिंग ही कैंसिल कर दी कि राज कपूर की आवाज मुकेश के अलावा कोई और बन ही नहीं सकता।

शास्त्रीय गायक ने तमाम मुरकियां लेकर वो गाना गा दिया। कल्याण जी आनंद जी ने फिर से समझाया कि इस गाने में मुरकियां नहीं हैं आप सिर्फ सही सुरों में इसे गा दीजिए। रिकॉर्डिंग के कई 'टेक' हो गए लेकिन मुरकियां कम नहीं हुई। इसके बाद कल्याण जी आनंद जी ने बड़ी संजीदगी से उस शास्त्रीय गायक से कहाकि अब आपको समझ आया जो गायक थोड़ी देर पर मर्सिडीज से गया उसकी क्या खासियत है।

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आसान गाना भी कहीं से आसान काम नहीं है। अब आपको समझ आ गया होगा कि वो गायक मर्सिडीज से क्यों चलता है। अगर आप अंदाजा नहीं लगा पाए तो मैं बताता हूं आपको। वो गाना था- चंदन सा बदन, चंचल चितवन धीरे से तेरा वो मुस्काना... और ये किस्सा है हरदिल अजीज गायक मुकेश का। मुकेश यानी मुकेश चंद माथुर। जिस गायक के दर्द भरे नगमें लाखों प्रेमियों के दिलों में अब भी धड़कते हैं।

ऐसा भी नहीं था कि मुकेश को शास्त्रीय संगीत या रागदारी की समझ नहीं थी। उन्होंने कई ऐसे गाने गाए जो शुद्ध रूप से शास्त्रीय संगीत पर आधारित थे, लेकिन उन गानों में भी उनकी सहजता ही सुनने वालों का दिल जीत ले गई। मसलन- 1962 में एक फिल्म आई थी- संगीत सम्राट तानसेन। इस फिल्म के डायरेक्टर और संगीत निर्देशक एसएन त्रिपाठी थे। उन्होंने इस फिल्म में राग सोहनी पर एक गीत कंपोज किया था, जिसे मुकेश ने गाया था।

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गाने के बोल थे- 'झूमती चली हवा, याद आ गया कोई।' इस फिल्म में दर्जन से ज्यादा गाने थे जिसमें से मुकेश ने इकलौता गाना गाया था। बाकी के गाने मन्ना डे, लता मंगेशकर और महेंद्र कपूर के गाए हुए थे लेकिन पचास साल बाद भी जब इस फिल्म का जिक्र होता है तो वही गाना याद आता है जो मुकेश का गाया हुआ था।

22 जुलाई 1923 को दिल्ली में जन्मे मुकेश उस दौर में आए ऐसे गायक थे जिन्हें शास्त्रीय संगीत के लिए नहीं जाना जाता था। मुकेश के पिता जोरावर चंद माथुर इंजीनियर थे। मुकेश के दस भाई बहन थे, वो छठे नंबर पर थे। हुआ यूं कि मुकेश की बहन सुंदर प्यारी को संगीत सिखाने एक शिक्षक आते थे। मुकेश साथ के कमरे से सुनते और सीखते थे। दसवीं के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और कुछ समय पीडब्ल्यूडी में काम भी किया। उन्हीं दिनों मुकेश के एक दूर-दराज के रिश्तेदार थे- मोतीलाल। मोतीलाल जी खुद एक जाने-माने अभिनेता थे। उनके घर ब्याह था।

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रिश्तेदारी थी लिहाजा मुकेश भी वहां गए हुए थे। शादी-ब्याह में गाने बजाने की रस्म होती ही है। मुकेश कोई गाना गा रहे थे और मोतीलाल वहीं बैठे सुन रहे थे। उन्हें मुकेश की गायकी में कुछ खास बात समझ आई। इसके बाद ही मोतीलाल उन्हें मुंबई ले आए, जहां मुकेश ने पंडित जगन्नाथ प्रसाद से सीखना शुरू किया। 1945 में फिल्म आई- पहली नजर। मोतीलाल फिल्म में थे। मुकेश ने गाया - दिल जलता है तो जलने दे। गायकी का अंदाज ऐसा कि सुनने वालों को लगा कि गाना केएल सहगल ने गाया है। यहां तक कि जब सहगल ने गाना सुना तो कहा कि ताज्जुब है, मुझे याद नहीं आ रहा कि मैंने ये गाना कब गाया।

इसके बाद करियर के कुछ और शुरुआती गाने मुकेश ने केएल सहगल के अंदाज में गाए। सहगल उस वक्त के बड़े स्टार भी थे। बाद में मुकेश को मुकेश के अंदाज में गाने के लिए प्रेरित करने का श्रेय नौशाद को दिया जा सकता है। नौशाद के बाद धीरे-धीरे हर संगीतकार एक खास किस्म के गाने के लिए मुकेश को ढूंढता था। राज कपूर की तो वो आवाज ही बन गए। यहां तक कि जब फिल्म चोरी-चोरी के लिए मुकेश समय नहीं निकाल पाए तो म्यूजिक डायरेक्टर शंकर जयकिशन ने मन्ना डे से गाना गवाने का फैसला किया। इस बात की जानकारी जब स्टूडियो के मालिक को हुई तो उन्होंने यह कहकर रिकॉर्डिंग ही कैंसिल कर दी कि राज कपूर की आवाज मुकेश के अलावा कोई और बन ही नहीं सकता। बाद में राज कपूर के बहुत समझाने पर मन्ना डे से 'ये रात भीगी भीगी' गावा गवाया गया, जो जबरदस्त हिट हुआ।

मुकेश को 1974 में रजनीगंधा फिल्म के गाने 'कई बार यूं ही देखा है' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। कहा जाता है कि उन्होंने डेढ़ हजार से भी कम गाने गाए। ये संख्या बाकी गायकों के मुकाबले काफी कम है। फिर भी ऐसा लगता है मानो हर गाना हिट था। मुकेश की शादी की कहानी बड़ी मजेदार है। उन्होंने सरल त्रिवेदी से शादी की, जो रायचंद त्रिवेदी की बेटी थीं। रायचंद त्रिवेदी गुजराती ब्राह्मण थे और उनके पास बहुत पैसा था। दूसरी तरफ मुकेश के पास न तो कमाई का जरिया था और न ही अपना घर। उस पर मुकेश गायकी से जुड़े हुए थे, जिसे रायचंद जी अच्छा नहीं मानते थे। जाहिर है जब शादी के प्रस्ताव की बात आई तो उन्होंने मंजूरी नहीं दी। इसके बाद मुकेश सरल को लेकर भाग गए। उन्होंने मुंबई में कांदिवाली के मंदिर में 22 जुलाई 1946 को शादी कर ली। उस वक्त मुकेश 23 साल के थे। एक बार फिर एक्टर मोतीलाल ने ही मुकेश की मदद की। शादी के बाद मुफलिसी का आलम ये था कि कुछ दिनों तक दोनों फर्श पर सोये।

क्रिकेटर चंद्रशेखर मुकेश की आवाज के बड़े फैन हैं। इसके अलावा भारत रत्न सचिन तेंडुलकर के भी पसंदीदा गायकों में मुकेश शामिल हैं। कहते हैं कि एक बार उन्होंने कानपुर में मैच से पहले होटल स्टाफ से मुकेश की सीडी भी मंगाई थी। 70 के दशक में मुकेश ने गाना कम कर दिया था। इसकी दो वजहें थीं। एक तो उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था दूसरा 70 के दशक में किशोर कुमार बहुत ज्यादा लोकप्रिय हो गए थे। ज्यादातर म्यूजिक डायरेक्टर किशोर कुमार के साथ काम कर रहे थे। इसी दशक में 1976 का साल आया। जब मुकेश अमेरिका के दौरे पर गए थे। 27 अगस्त की तारीख थी मुकेश को एक कॉन्सर्ट करना था। वो सुबह उठे, नहाए। बाथरूम से बाहर आए तो 'अनइजी फील' कर रहे थे। पसीना बहुत ज्यादा हो रहा था। सीने में तेज दर्द भी था। उन्हें अस्पताल ले जाया गया। वहीं उनकी मौत हो गई। बाद में 'कन्सर्ट' को लता मंगेशकर और मुकेश के बेटे नितिन ने पूरा किया। लता जी मुकेश के पार्थिव शरीर के साथ भारत आईं।

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