क़िस्सा मुख़्तसर : जब नेहरू की बात का बुरा मान गए खां साहब 

क़िस्सा मुख़्तसर : जब नेहरू की बात का बुरा मान गए खां साहब बड़े ग़ुलाम अली खां साहब

बड़े गुलाम अली खां साहब हिंदुस्तान की सबसे करिश्माई आवाज़ों में से एक थे, उनके हर कॉनसर्ट में हज़ारों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। क़िस्सा उन दिनों का है जब बड़े ग़ुलाम अली खां साहब एक कार्यक्रम के सिलसिले में कोलकाता आए हुए थे। उस वक्त देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु थे। नेहरु ख़ुद भी खां साहब की गायकी के बड़े कद्रदानों में से एक थे।

इत्तिफाक़ ऐसा हुआ कि किसी आधिकारिक बैठक में हिस्सा लेने के लिए पंडित नेहरू भी कोलकाता में मौजूद थे। जब उन्हें पता चला कि खां साहब भी शहर में हैं तो उन्होंने तय किया कि कुछ वक्त निकाल कर उनकी गायकी का लुत्फ़ लिया जाए। उन्होंने उस होटल में फोन किया जहां खां साहब ठहरे हुए थे और उनसे बात की।

खां साहब यूं तो पंडित नेहरू के दोस्त थे लेकिन उनकी ‘मेरे पास एक घंटा है’ वाली बात शायद उनको ज़रा नागवार गुज़री।

खां साहब के बारे में कहा जाता है कि वो ज़रा सख़्त मिज़ाज शख्स थे, अपनी शर्तों पर गाते थे। औपचारिक बातचीत के बाद पंडित नेहरू ने उनसे कहा, "तो खां साहब, अब इत्तिफाक़ ऐसा हो गया है कि आप भी शहर में हैं और मेरे पास एक घंटे का वक्त भी है, सोचता हूं एक महफिल आपके साथ हो जाए"। खां साहब यूं तो पंडित नेहरू के दोस्त थे लेकिन उनकी 'मेरे पास एक घंटा है' वाली बात शायद उनको ज़रा नागवार गुज़री।

कुछ लम्हों की खामोश के बाद बोले, "पंडित जी, वो तो ठीक है लेकिन आज रहने देते हैं" ये सुनकर पंडित नेहरू ने पूछा, "क्यों आज क्या दिक्कत है" तो बड़े गुलाम अली खां साहब ने तंज़िया अंदाज़ में मुस्कुराते हुए कहा, "वो क्या है पंडित जी, एक घंटे में तो सिर्फ मेरा गला गर्म होता है"

- गीतकार और शायर जावेद अख़्तर की ज़ुबानी

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First Published: 2017-11-14 20:44:13.0

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