क़िस्सा मुख़्तसर : ग़ालिब के जूते

क़िस्सा मुख़्तसर : ग़ालिब के जूतेमिर्ज़ा ग़ालिब

ग़ालिब का दीवान तबतक नहीं छपा था लेकिन फिर भी उनकी पहचान हिंदुस्तान के दूर दराज़ इलाकों तक फ़ैल चुकी थी। हद ये कि आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र भी उन्हें कई बार शाही मुशायरे में शिरक़त के लिये बुला चुके थे।

पुरानी दिल्ली में बनी ग़ालिब की पुश्तैनी हवेली पर उनसे मिलने वालों का तांता लगा रहता था। आधे लोग उनकी शायरी के कायल थे और आधे उनकी हाज़िर जवाबी के। मिलने वालों में दिल्ली के ही एक शायर सैय्यद सरदार मिर्ज़ा भी होते थे। सैय्यद साब यूं तो आम शागिर्दों जैसे ही थे लेकिन उनको लगता था कि क्योंकि वो ज़ात से सैय्यद हैं ग़ालिब उनका कुछ एहतराम भी करें। वो दूसरे शागिर्दों से ज़रा हटकर बैठते थे और सबसे आख़िरी में जाते थे ताकि दूसरे शागिर्दों को लगे कि सैय्यद साहब ग़ालिब के ज़्यादा क़रीब हैं।

लेकिन उस शाम सैय्यद साहब को शायद कुछ काम था। आंगन में चिराग़ जले कुछ ही वक्त हुआ था। शाम का अंधेरा फैल चुका था। सैय्यद मिर्ज़ा कुर्सी से उठे और दूसरे लोगों को सुनाते हुए बोले "भई नौशे मियाँ आज तो इजाज़त चाहूंगा, ज़रा भी मुमकिन होता तो ज़रूर रुकता"

ग़ालिब ने मुस्कुराकर मुसाफा (हाथ मिलाना) किया और सैय्यद साब अपने जूते पहनने लगे। ग़ालिब मसहरी से उतरे और दीवार पर बने ताक से चराग़ उठाकर जूते पहन रहे सैय्यद साहब को रौशनी दिखाने लगे। वहां बैठे सब लोग खुसफुसाने लगे कि भई सैय्यदों की भी क्या शान है, देखिये ग़ालिब ख़ुद चराग़ दिखा रहे हैं। सैय्यद साहब ने इतराते हुए कहा "अरे क्यों ज़हमत कर रहे हैं आप, मैं पहन लूंगा"

ग़ालिब ने पूरी संजीदगी से कहा "नहीं नहीं ज़हमत कैसी। मैं तो इसलिए रौशनी दिखा रहा हूं कि कहीं आप मेरे जूते ना पहन जाएं"।

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