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सफ़दर हाशमी , वो जिसे सच कहने पर सज़ा ए मौत मिली

Jamshed Siddiqui  2 Jan 2019 7:30 AM GMT

सफ़दर हाशमी , वो जिसे सच कहने पर सज़ा ए मौत मिलीसफ़दर हाशमी

सफ़दर हाशमी का नाम यूं तो नुक्कड़ नाटक की कला से जोड़ कर देखा जाता है लेकिन हक़ीकत तो ये है कि वो न सिर्फ नाटककार बल्कि निर्देशक, लेखक और गीतकार भी थे। 12 अप्रैल 1954 को सफदर का दिल्ली में पैदा हुए सफदर हाशमी की शुरुआती ज़िंदगी अलीगढ़ में गुज़री और बाद में वो दिल्ली आ गए।

उनके घर का माहौल हमेशा से प्रगतिशील मार्क्सवादी था। दिल्ली के सेंट स्टीफेन्स कॉलेज से अंग्रेज़ी में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होने अंग्रेजी में एमए किया। यही वह समय था जब वे स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की सांस्कृतिक यूनिट से जुड़ गए और इसी बीच इप्टा से भी उनका जुड़ाव रहा।

The issue is not where the play is performed but the principal issue is the 'definite and unresolvable contradiction between the bourgeois individualist view of art and the people's collectivist view of art'.
Safdar Hashmi

सफदर हाशमी

सफ़दर हाशमी हिंदुस्तान की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सदस्य थे। 1979 में इन्होंने अपनी कॉमरेड और साथी नुक्कड़कर्मी 'मल्यश्री हाशमी' से शादी कर ली। बाद में उन्होंने प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया और इक्रोमिक्स टाइम्स के साथ पत्रकार के रूप में काम किया, वे दिल्ली में पश्चिम बंगाल सरकार के 'प्रेस इंफोरमेशन ऑफिसर' के रूप में भी तैनात रहे।

1984 में इन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और खुद का पूरा समय राजनैतिक सक्रियता को समर्पित कर दिया। सफ़दर हाशमी ने दो बेहतरीन नाटक तैयार करने में अपना सहयोग दिया, मक्सिम गोर्की के नाटक पर आधारित 'दुश्मन' और प्रेमचंद की कहानी 'मोटेराम के सत्याग्रह' पर आधारित नाटक जिसे इन्होंने हबीब तनवीर के साथ 1988 में तैयार किया था।

इसके अलावा इन्होंने बहुत से गीतों, एक टेलीवीज़न धारावाहिक, कविताओं, बच्चों के नाटक, और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों की अमोल विरासत सौंपी। रैडिकल और पॉपुलर वामपंथी कला के प्रति अपनी कटिबद्धता के बावजूद इन्होंने कभी भी इसे व्यर्थ की बौद्धिकत्ता का शिकार नहीं बनने दिया और निर्भीकतापूर्वक प्रयोगों में भी जुटे रहे।

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हिंदुस्तान में राजनीतिक थियेटर की शुरुआत सफदर ने ही की, हर उस मामले को नुक्कड़ नाटक के ज़रिये लोगों के बीच नुक्कड़ पर ले आए जिसके बारे में नेता बात नहीं करना चाहते थे। वो इंडियन पीपल थियेटर एसोसिएशन यानि इप्टा के अहम सदस्य थे लेकिन बाद में उन्होंने जन नाट्य मंच की भी बनाया।

उनके नाटकों से कई लोग नाराज़ थे। उनपर दवाब डाला जाने लगा कि वो ये नुक्कड़ नाटक बंद कर दें, लोगों को जगाना बंद कर दें, लेकिन सफदर रुके नहीं। 2 जनवरी 1989 में ग़ाज़ियाबाद में एक नुक्कड़ नाटक 'हल्ला बोल' खेलते हुए उनकी हत्या कर दी गई। एम एफ हुसैन ने एक पेंटिंग बनाई थी, नाम था आ ट्रिब्यूट टू सफ़दर हाशमी, जो दस लाख डॉलर में बिकी थी। आज उनकी सालगिरह के मौके पर आइये पढ़ें उनकी एक कविता।

किताबें करती हैं बातें
बीते ज़मानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की, कल की
एक-एक पल की
ख़ुशियों की, ग़मों कीफूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की
क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं।
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं॥

किताबों में चिड़िया चहचहाती हैं
किताबों में खेतियाँ लहलहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं
परियों के किस्से सुनाते हैं
किताबों में राकेट का राज़ है
किताबों में साइंस की आवाज़ है
किताबों में कितना बड़ा संसार है
किताबों में ज्ञान की भरमार है
क्या तुम इस संसार में
नहीं जाना चाहोगे?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं।
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं॥

- सफ़दर हाशमी

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