आज के टीवी एंकर्स को ये वीडियो देखना चाहिए

आज के टीवी एंकर्स को ये वीडियो देखना चाहिएसलमा सुलताना, दूरदर्शन की मशहूर न्यूज़ रीडर

31 अक्टूबर साल 1984 की वो भी एक आम सुबह थी। सड़कों पर ट्रैफ़िक सुस्त था और मौसम साफ। सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। उन दिनों दूरदर्शन पर सुबह के वक्त कोई खास कार्यक्रम नहीं आता था.. इसलिए घरों में टीवी बंद थी लेकिन उसी उनींदे माहौल में एक ख़बर धीरे-धीरे शहर और फिर पूरे देश में फैल रही थी, बताया जा रहा था कि प्रधानमंत्री की हत्या कर दी गई है।

ये वो दौर था जब सूचना तंत्र इतना मज़बूत नहीं हुआ करता था, तब न सोशल मीडिया था न वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर। ख़बर की विश्वसनीयता अखबार और टीवी पर दिन में दो बार आने वाले ‘समाचार’ पर ही निर्भर थी। प्रधानमंत्री की हत्या की ख़बर को कोई कोरी अफ़वाह बता रहा था कोई उसे सच मान रहा था। कुछ ही घंटों में ये ख़बर पूरे देश में फैल गई कि ‘कुछ’ हुआ है।

लोगों की नज़र टीवी की झिलमिलाती स्क्रीन पर थी। सुबह के आठ बजे दूरदर्शन पर एक खास ट्रांसमीशन हुआ। लोगों की धड़कनें बढ़ गई। सबकी नज़र टीवी पर टिकी हुई थी। ट्रांसमिशन शुरु हुआ, औऱ टीवी स्क्रीन पर उभरा वो चेहरा जो रोज़ाना मुस्काराते हुए ख़बर पढ़ता था, जिसके बालों में एक फूल होता था .. नाम था सलमा सुलताना। उस सुबह सलमा सुलताना का चेहरा उदास था, आंखे नम थीं। फिर उन्होंने जो खबर पढ़ी उससे पूरे मुल्क में दुख की लहर दौड़ गई।

यहां देखें वीडियो

इस वीडियो में सलमा सुलताना वो ख़बर सुना रही हैं जो उस वक्त ना सिर्फ देश की, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी ख़बर है, लेकिन उनके चेहरे पर न कोई हड़बडाहट है ना कोई नकली गुस्सा। आंखों में ठहरे हुए आंसू है और आवाज़ में गंभीरता और दुख का संतुलन, न चीख है न चिल्लाहट। हिंदी पत्रकारिता का ये वो चेहरे है जिसे आज के एंकरों को बहुत कुछ सीखना चाहिए।

शोर में बदलती हुई सूचना

Painting credit : Stefano Ciarrocchi

हिंदी पत्रकारिता का चेहरा पिछले कई सालों में बदल गया है। शोर अब सूचना पर भारी पड़ने लगा है। आक्रमकता पत्रकारिता के अहम तत्व के तौर पर उभर कर आई है। सिर्फ ख़बर सुनाना काफी नहीं रहा, ख़बर को चीख-चीख कर सुनाना ज़रूरी हो गया है। संतुलित होकर धीरे-धीरे ख़बर पढ़ना अब आउट ऑफ फैशन हो गया है। न्यूज़ चैनलों पर चीखने वाले एंकरों की तादाद लगातार बढ़ी है, उनकी लोकप्रियता में भी इज़ाफा हुआ है। एकरों के चेहरे और हावभाव में एक ऐसी हड़बड़ाहट है जो हर खबर को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाने की कोशिश करती है। इस हड़बड़ाहट में काफी नाटकीयता होती है, जो किसी एक पक्ष को तकरीबन-तकरीबन दोषी साबित कर चुकी होती है।

सलमा सुल्ताना

हिंदी पत्रकारिता के नए और शोर मचाते चेहरों को सलमा सुलताना का वो वीडियो देखना चाहिए, कैसे वो इतनी बड़ी ख़बर को भी बिना किसी शोर और सनसनी के पढ़ती है। वहां एक बारीक एहसास भी देखने लायक है, क्योंकि शोर के बग़ैर भी वो अमानवीय नहीं होती। उनके चेहरे पर ग़म दिखता है, अफ़सोस छलकता है लेकिन वो नकलीपन नहीं है जो आज की टीवी एंकरों के चेहरे पर आम तौर पर दिखता है।

आज की हिंदी टीवी पत्रकारिता न सिर्फ मानवीय एहसास बल्कि पत्रकारिता के मूल्य भी भुला चुकी है। टीआरपी की अंधी दौड़ में सिर्फ वो बेचा जा रहा है जो बिके। फिर वो चाहे किसी कॉमेडी शो का हिस्सा हो या You tube से निकाली गई कोई पुरानी वीडियो। देश के आम वर्ग के एहसास, उसके मुद्दे, उसकी तकलीफ टीवी की स्क्रीन से गायब हैं और इस तरह से गायब किये गए हैं कि आम मध्यमवर्ग इस बात से परेशान भी नहीं है। शायद अब उसे उम्मीद भी नहीं है। वो टीवी पत्रकारिता से अब सिर्फ मनोरंजन की उम्मीद करता है और इसलिए चैनल भी उसी बेशर्मी के साथ उसे वही परोसते हैं। आठ खिड़कियों से झांककर एक साथ बोलने वाले लोगों को हर शाम दर्शकों के ड्राइंग रूम भेज दिया जाता है, जहां वो तबतक लड़ते रहते हैं जबतक कैमरा ऑफ नहीं हो जाता। हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौके पर ये भी देखना ज़रूरी है कि हिंदी टीवी पत्रकारिता अपने दर्शकों को समझदार नागरिक बना रही है या सिर्फ भावनाओं को सूचना बनाकर उन्हें एक ही तरह से सोचना सिखा रही है।


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