एक गीतकार जिसकी आंखों ने ज़माने को बदलते देखा

एक गीतकार जिसकी आंखों ने ज़माने को बदलते देखागोपालदास नीरज

गीत आज कम होता जा रहा है लेकिन गीत कभी मरेगा नहीं क्योंकि गीत का संबंध लय से है. जब जब आदमी सुख-दु:ख में रहेगा, वो गाएगा ही

"कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है" कविता में ज़िंदगी की ऐसी ज़िंदादिली समेटे उस शख्स की बूढ़ी आंखों ने दौर को बदलते देखा है, वो कहता है, "कलम की स्याही औऱ मन के भाव को सांसों के साथ ही खत्म होंगे" हम बात कर रहे हैं महाकवि गोपालदास नीरज की। वो कवि जिसने जब भी कलम चलाया कुछ ऐसा रचा जिसे ज़मानों तक याद किया गया। गोपाल दास नीरज 18 जुलाई 2018 को दुनिया छोड़ गए। गोपालदास नीरज की ज़िंदगी एक चलते-फिरते महाकाव्य जैसी है, जिसमें हज़ारों कविताएं, सैकड़ों किस्से और दर्जनों गाने दर्ज हैं। ज़िंदगी में उनका जितना तजुर्बा है आम कवियों की उतनी उम्र है। वो बताते हैं कि पहली बार उन्होंने कविता लिखी तब उम्र 17 साल की थी, नया-नया शौक था।

प्रेम कविताएं लिखी, पसंद की गईं लेकिन ये उन्हें भी नहीं पता था कि कामयाबी इस तरह कदम चूमेगीकि यूपी के इटावा का लड़का बंबई जाकर महाकवि कहलाएगा। नीरज का सफर मुशायरों से लेकर किताबों तक और कविताओें से लेकर फिल्मी गीतों तक रहा। उन्हें सबसे ज़्यादा जिस रचना के लिए याद किया जाएगा वो राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर का गीत - ऐ भाई ज़रा देख के चलो है। जब ये गीत लिखा गया तब दौर दूसरा था, हुस्न ओ इश्क के गाने चलते थे लेकिन ऐसे वक्त में ज़िंदगी के फलसफे को लेकर एक गीत बनाना एक बेहद बड़ा प्रयोग था।


'क्यों न कितनी ही बड़ी हो, क्यों न कितनी ही कठिन हो,

हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है,

उस सुबह से सन्धि कर लो,

हर किरन की मांग भर लो,

है जगा इन्सान तो मौसम बदलकर ही रहेगा।

जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा'।

साल 2007 में पद्मभूषण से सम्मानित कवि नीरज प्रेम और विरह के बीच कहीं खड़े होकर ज़िंदगी में उम्मीद की रौशनी जगाते हैं। उनकी कविताएं मायूस और उलझे हुए मन में एक रौशनी पैदा करती है। अपनी कलम से उन्होंने युवा वर्ग को जिस तरह नया आयाम दिया वो भी काबिले तारीफ रहा। कम उम्र में ही पिता को खो देने के बाद जिस तरह घर की ज़िम्मेदारी उन पर आ गई थी उन्होंने कुछ काम करने के लिए टाइपिस्ट का कोर्स किया। उन दिनों इसकी बहुत मांग थी। काम करते हुए घर की हालत कुछ ठीक हुई और वो बंबई चले गई। बंबई ने उन्हें बहुत नवाज़ा, खाली वक्त में लिखी उनकी कविताओं ने शहर के अदीबों और कवियों में खलबली मचा दी। उनकी ख्याति फिल्म इंडस्ट्री तक पहुंची तो राजकपूर ने उनसे अपनी फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए गीत लिखने को कहा जो अमर हो गया। 70 के दशक में उन्हें गीतकार के तौर पर तीन बार फिल्मफेयर से भी सम्मानित किया गया। इतनी कामयाबी के बावजूद भी जब नीरज से उनकी आत्मकथा लिखने को कहा गया उन्होंने उसे सिरे से नकार दिया और कहा कि उनकी ज़िंदगी एक खुली किताब है इसे आत्मकथा में समेट कर किताब में बंद नहीं करना चाहते।

प्यार अगर थामता न पथ में ऊंगली, इस बीमार उमर की हर पीड़ा वेश्या बन जाती, हर आंसू आवारा होता !तुम चाहे विश्वास न लाओ लेकिन मैं तो यही कहूंगा प्यार न होता धरती पर तो सारा जग बंजारा होता !"

आज गोपाल दास नीरज की सालगिरह के मौके पर आइये सुनते हैं उनके कुछ मशहूर गीत...

कहता है जोकर सारा ज़माना

दिल आज शायर है

बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं

मेरा मन तेरा प्यासा

अपने होठों की बंसी बना ले मुझे

आज मदहोश हुआ जाए रे

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