एक शायर का सुसाइड नोट, जिसने ज़िंदगी से बोर होकर फांसी लगा ली

Jamshed QamarJamshed Qamar   3 Jan 2017 9:12 PM GMT

एक शायर का सुसाइड नोट, जिसने ज़िंदगी से बोर होकर फांसी लगा लीशायर अनीस मोईन का खुदकुशी से पहले लिखा ख़त

वो कुछ गहरी सोच में ऐसा डूब गया है

बैठे बैठे नदी किनारे डूब गया है

आज की रात न जाने कितनी लंबी होगी

आज का सूरज शाम से पहले डूब गया है

शाम का वक्त था और मुशायरें में तालियों की गड़गड़ाहट बढ़ती जा रही थी। एक 25 साल का नौजवान माइक पर था। रंग गोरा, हल्की दाढ़ी और आंखों में कशिश थी। दाएं हाथ में डायरी पकड़े वो एक के बाद एक गज़लें सुना रहा था। उसकी हर गज़ल के हर शेर पर वाह-वाह का ऐसा शोर उठ रहा था कि कि लगता था जैसे बाकी शायर फीके पड़ गए हों। वो जितनी बार ‘शुक्रिया’ कह कर माइक से हटता, लोगों का ऐसा शोर उठता कि मुशायरे के सदर उसे वापस माइक पर आने के लिए कहते। ये दीवानगी उस शायर के लिए थी जिसका हर शेर मोती की तरह खूबसूरत था। मुशायरा था पाकिस्तान के मुल्तान में और शायर का नाम था अनीस मोईन

शायर अनीस मोइन की तीन तस्वीरें

पाकिस्तान के मुल्तान में पैदा हुए अनीस मोईन वो शायर थे जिन्होंने बहुत ही कम उम्र में शायरी की दुनिया में अपनी धाक जमा ली थी। उनकी गज़लें, शेर और नज़्म बहुत पसंद की गईं। ये वो दौर था जब उर्दू अदब से कम उम्र के लोगों का जुड़ाव कम था, ज़्यादातर उम्र दराज़ शायर ही थे जिन्हें मुशायरों और जलसों वगैरह में बुलाया जाता था। लेकिन उसी दौर में जब अनीस मोईन ने शायरी करना शुरु की तो कम ही वक्त में उनके चाहने वालों की तादाद बढ़ने लगी।

धीरे-धीरे उनकी शिरकत काफी मुशायरों में होने लगी और वो जवां लोगों की खासी पसंद बन गए। लेकिन एक तरफ जहां उनकी ज़िंदगी में कामयाबी के पायदान चढ़ रही थी वहीं दूसरी तरफ वो अपनी ज़िंदगी में एक अजीब तरह की मायूसी महसूस कर रहे थे। अनीस साहब ने इतनी कम उम्र में इतनी ज़्यादा कामयाबी हासिल की थी कि उन्हे उस कामयाबी से उकताहट होने लगी। एक शेर में उनके ये एहसास झलकते हैं

मेरे अपने अंदर एक भंवर था जिस में
मेरा सब कुछ साथ ही मेरे डूब गया है
शोर तो यूँ उट्ठा था जैसे इक तूफ़ाँ हो
सन्नाटे में जाने कैसे डूब गया है

अनीस मुईन

अनीस मुईन का कहना था कि उन्हें ज़िंदगी की ‘यकसानियत’ से परेशानी है। यानि वो रोज़ाना एक जैसी ज़िंदगी से उकता गए हैं। वो एहसास की उस मंज़िल पर थे जहां कामयाबी और नाकामयाबी मायने नहीं रखती। उनके पास सब कुछ था लेकिन फिर भी महसूस होता था जैसे कुछ भी न हो। और इसी के चलते चार फरवरी 1986 को उन्होंने फांसी के फंदे से झूल कर खुदकुशी कर ली। अनीस मुईन बारे में आजतक कोई नहीं जान पाया कि उन्होंने खुदकुशी क्यों की, क्या जो वजह उन्होंने अपने सुसाइड नोट में बताई वो ही असली वजह थी या इसके पीछे कोई और वजह थी। ज़्यादातर लोग मानते हैं कि जो बात उन्होंने सुसाइड नोट में लिखी है वो ही सही वजह है हालांकि आम इंसान के लिए उस कैफीयत को समझ पाना मुश्किल है।

आइये देखें वो सुसाइड नोट जिसमें अनीस मुईन ने अपनी खुदकुशी की वजह लिखी है। उर्दू न जानने वालों के लिए हम नीचे उसका अनुवाद भी दे रहे हैं।

अनीस मुईन का सुसाइड नोट

सुसाइड नोट का हिंदी अनुवाद

ख़ुदा आपको हमेशा सलामत रखे।


मेरी इस हरकत की, सिवाए इसके, कोई और वजह नहीं कि मैं ज़िंदगी की यक्सानियत से उकता गया हूं। ज़िंदगी की किताब का जो पन्ना उलटता हूं उस पर वो ही लिखावट नज़र आती है जो पिछले पन्ने में पढ़ चुका होता हूं, इसलिए मैंने ढेर सारे पन्ने छोड़कर वो लिखावट पढ़ने का फैसला किया है जो आखिरी पन्ने पर लिखी हुई है। मुझे न तो घर वालों से शिकायत है न दफ्तर या बाहर वालों से, बल्कि लोगों ने तो मुझे इतनी मुहब्बत की है कि मैं उसके काबिल भी नहीं था। लोगों ने अगर मेरे साथ कोई ज़्यादती की भी है तो या किसी ने मेरा कुछ देना है तो मैं वो माफ करता हूं। खुदा मेरी भी ज़्यादतियों और गुनाहों को माफ फरमाए।

और आखिर में एक खास बात और, वो ये कि आखिर में राहे खुदा में देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है इसलिए मैं अपनी आंखे आई-बैंक को डोनेट करता हूं। मेरे बाद ये आंखे किसी मुस्तहक़ शख्स को लगा दी जाएं तो मेरी रूह को असल मायनों में सुकून हासिल हो सकने की उम्मीद है। मरने के बाद मुझे आपकी दुआओं की पहले से ज़्यादा ज़रूरत रहेगी, अलबत्ता ग़ैर-ज़रूरी रस्मों पर पैसा खर्च करने की ज़रूरत नहीं है। मैंने कुछ रुपये आमना के पास इसलिए रखवा दिये हैं ताकि इस मौके पर काम आ सकें।

आपका नालायक बेटा
अनीस मुईन
अस्लम ख़ान बिल्डिंग, मुल्तान
4/2/86

अनीस मोइन की ज़िंदगी और मौत की बहुत सी बातें आजतक लोगों को नहीं पता। वो एक ऐसा शायर था जिसने दुनिया की हकीकत को समझ लिया था। चलते-चलते अनीस मुईन की एक गज़ल

वो मेरे हाल पे रोया भी मुस्कुराया भी
अजीब शख़्स है अपना भी है पराया भी

ये इंतिज़ार सहर का था या तुम्हारा था
दिया जलाया भी मैं ने दिया बुझाया भी

मैं चाहता हूँ ठहर जाए चश्म-ए-दरिया में
लरज़ता अक्स तुम्हारा भी मेरा साया भी

बहुत महीन था पर्दा लरज़ती आँखों का
मुझे दिखाया भी तू ने मुझे छुपाया भी

बयाज़ भर भी गई और फिर भी सादा है
तुम्हारे नाम को लिक्खा भी और मिटाया भी

अनीस मुईन (1960 - 1986)

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top