मिर्ज़ा ग़ालिब के दस सबसे बेहतरीन शेर

Jamshed QamarJamshed Qamar   23 Oct 2018 6:22 AM GMT

मिर्ज़ा ग़ालिब के दस  सबसे बेहतरीन शेरMirza Ghalib

उर्दू अदब मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी के बग़ैर अधूरी है। ग़ालिब की शायरी ने उर्दू अदब को नए पंख और नया आसमान दिया। कम लोग जानते हैं कि ग़ालिब की शायरी का बड़ा हिस्सा फारसी में है, उर्दू में उन्होंने बहुत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है वो ही आने वाले कई ज़मानों तक लोगों को सोचने पर मजबूर करने के लिए काफी है। ग़ालिब की शायरी की सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि वो किसी एक रंग या किसी एक एहसास से बंधे नहीं, हर मौज़ू पर उनका शेर मौजूद है। ग़ालिब शायद उर्दू के इकलौते ऐसे शायर हैं जिनका कोई न कोई शेर ज़िंदगी के किसी भी मौके पर quote किया जा सकता है।

आइये हम उनके दस चुनिंदा शेर देखते हैं

1.


आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

2.
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

3.
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

4.
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

5.
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

6.
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है

7.
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

8.
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

9.
काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुम को मगर नहीं आती

10.
कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले



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