पंडित जसराज की सालगिरह पर, उनके संघर्ष की कहानी

पंडित जसराज की सालगिरह पर, उनके संघर्ष की कहानीपंडित जसराज

वो साल 1933 था, जब हैदराबाद के आख़िरी निज़ाम उस्मान अली खां के दरबार में उस दोपहर बड़ी चहल-पहल थी। उस शाम मेवाती घराने से ताल्लुक रखने वाले हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सबसे जाने-माने गायक पंडित मोती राम को 'राज संगीतज्ञ' घोषित किया जाना था। इधर समारोह की तैयारी हो रही थी और उधर मोती राम के घर में जश्न मनाया जा रहा था। उनके दोनों बेटे भी पिता को मिलने वाले इस सम्मान से खुश थे। लेकिन कुदरत का भी ये अजीब संयोग हुआ। शाम होते-होते खुशी गम में बदल गई। उसी शाम पंडित मोती राम जी का देहांत हो गया। सजे धजे घर में अचानक मातम होने लगा, रोने चीखने की आवाज़ें गूंजने लगी।

उस वक्त उनके छोटे बेटे की उम्र महज़ तीन साल थी। ज़रा सी उम्र में पिता का साया सर से उठ जाने से वो खुद को अंदर से बेहद टूटा हुआ महसूस कर रहा था। लेकिन उस मुश्किल वक्त में उसने क़सम खाई को वो भी पिता जी की तरह बड़ा संगीतज्ञ बनेगा।

इसके कुछ साल बाद दोनों भाइयों ने पिता की विरासत को आगे बढ़ाना शुरु किया। छोटा बेटा तबला बजाता था और बड़ा गाना गाता था। ये सिलसिला लंबे वक्त तक चलता रहा। लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब छोटे बेटे को एहसास हुआ कि उसे तो पिता जी की तरह शास्त्रीय गायक बनना है, तबला नहीं बजाना। लिहाज़ा, 14 साल की उम्र में उसने तबला बजाना छोड़ दिया और अपने आप से ये वादा किया कि वो तब तक बाल नहीं कटवाएगा, जब तक शास्त्रीय गायन में विशारद हासिल नहीं कर लेगा

वो कोशिशें करता रहा और लंबे संघर्ष का फल ये हुआ कि एक रोज़ उसे ऑल इंडिया रेडियो पर शास्त्रीय संगीत पेश करने के लिए बुलाया गया। उस दिन उसने अपने जूड़े में गुंधे बाल काटवाए और स्टूडियो पहुंच गया।

ये वो दिन था जब दुनिया ने शास्त्रीय संगीत की एक ऐसी सुरीली आवाज़ को पहली बार सुना जिसे नज़रअंदाज़ कर पाना मुमकिन ही नहीं था। जिसने भी वो आवाज़ सुनी, गायक का नाम ज़रूर पूछा.. और जवाब मिला - पंडित जसराज

पंडित जसराज

पं० जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला उच्चारण मेवाती घराने की 'ख़याल' शैली की ख़ासियत को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के साथ 'हवेली संगीत' की कई नई बंदिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में वो कुछ सबसे बड़े नामों में से एक हैं।

हरियाणा के ज़िले हिसार में 28 जनवरी 1930 को जन्में पंडित जसराज के लिए 29 जनवरी 2005, यानि 75वीं सालगिरह के मौके पर, दिल्ली में एक समारोह आयोजित किया गया था। इस मौके पर पंडित जी ने कहा था

सोचता हूं कि आज अगर 35 बरस का होता और 75 बरस के ये अनुभव साथ होते, और उससे आगे 35 बरस की यात्रा करता तो कितना फ़र्क़ होता। संगीत के प्रति यही भावनाएं, श्रद्धा और भक्ति होती तो जीवन कितना धन्य होता
पंडित जसराज

पंडित जी की पत्नी का नाम मधुरा है, जो कि एक कामयाब डॉक्यूमेंटरी फिल्म मेकर हैं। मधुरा मशहूर फिल्म निर्देशक वी शांताराम की बेटी हैं। वो बताती हैं कि उन दोनों की पहली मुलाकात 1955 में फिल्म झनक-झनक पायल बाजे के सेट पर हुई थी। इसी के बाद प्यार हुआ और फिर शादी। शादी के बाद कुछ साल तक वो लोग कोलकाता में भी रहे। उनका एक बेटा शारंगदेव पंडित और एक बेटी दुर्गा जसराज है, जो टीवी कलाकार हैं।

पंडित जी फिलहाल देश विदेश में क्लासिकल संगीत सिखाने की कवायद में लगे हुए हैं। भारत के अलावा अमेरिका और कनेडा में भी उनके कई म्यूज़िक इंस्टिट्यूट चल रहे हैं जिसमें हज़ारों छात्र भारतीय शास्त्रीय संगीत को बेहतरी से सीख पा रहे हैं।

पंडित जसराज जी ने कई हिंदी फिल्मों में भी आवाज़ दी है। विक्रम भट्ट की फ़िल्म ‘1920’ के लिए उन्होंने अपनी जादुई आवाज़ में एक गाना गाया। इस गाने के बोल हैं 'वादा है तुमसे'.. आइये सुनते हैं वो गीत

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