मेहदी हसन ...तेरी महफिल में लेकिन हम ना होंगे

मेहदी हसन ...तेरी महफिल में लेकिन हम ना होंगेमशहूर गज़ल गायक मेहदी हसन 

यूं तो हम किस्सागोई में अक्सर दिलचस्प किस्सों के बहाने किसी बड़े फनकार को याद करते हैं लेकिन आज की कहानी थोड़ी अलग है। कहानी जिसमें दुख है, अफसोस है और नाराजगी भी। इन्हीं सारी भावनाओं के बीच आज हम उस कलाकार को याद करेंगे जो ‘उस’ मुल्क से ताल्लुक रखते हैं, जिसे हम पाकिस्तान कहते हैं। ये अलग बात है कि उस कलाकार के चाहने वाले जितने उस मुल्क में हैं उससे कम ‘इस’ मुल्क में नहीं।

अभी पिछले महीने की ही बात है। अखबार में एक बड़ी अफसोसजनक खबर छपी थी। खबर थी कि पाकिस्तान के एक बहुत बड़े फनकार की मजार नशेड़ियों का अड्डा बन गई है। ये खबर किसी और के हवाले से नहीं बल्कि उस महान कलाकार के बेटों के हवाले से छपी थी जिसमें उन्होंने पाकिस्तान सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए भारत सरकार से अपील की थी कि उनके अब्बा की याद में एक म्यूजियम बनाने में आर्थिक मदद करें।

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ये सच्चाई है ग़ज़ल की दुनिया के बेताज बादशाह मेहदी हसन की, 18 जुलाई को जिनकी सालगिरह होती है। एक बड़ा मौजूं शेर याद आ रहा है

दबा के कब्र में सब चल दिए दुआ ना सलाम

जरा सी देर में क्या हो गया जमाने को

मेहदी हसन साहब का इंतकाल 2012 में हुआ था। उस वक्त पाकिस्तान और सिंध सरकार ने वायदा किया था कि एक साल के भीतर उनकी याद में एक मजार बनाई जाएगी, अफसोस आज उस मजार के नाम पर वहां सिर्फ बाउंड्री बनी है। आस पास नाला बहता है। गंदगी का कोई ठिकाना ही नहीं है।

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खैर, ये तो हुए मौजूदा समय के हालात चलिए आपको इतिहास के पन्नों में ले चलते हैं और मिलाते हैं उस ग़ज़ल सम्राट से जिसके जैसा ना कोई हुआ ना होगा। ये बात हम नहीं कह रहे हैं। मेहदी हसन के बारे में ये बात हिंदुस्तान के हर दिल अजीज कलाकार जगजीत सिंह कहा करते थे।

साल 1927 की बात है। राजस्थान के शहर झुंझनूं के एक गांव लूना में मेहदी हसन साहब का जन्म हुआ। तारीख थी 18 जुलाई। ये मेहदी हसन की शख्सियत ही है कि उनके जन्म के बाद से लेकर आज करीब सौ साल बाद भी उस गांव की पहचान मेहदी हसन ही हैं। घर में संगीत की बड़ी अच्छी परंपरा चली आ रही थी। अब्बा और चचा ध्रुपद गायकी से जुड़े हुए थे। अब्बा और चचा से पहले की कई पीढ़ियां भी संगीत से ही ताल्लुक रखती थीं। कहा जाता है कि मेहदी हसन 16वीं पीढ़ी की नुमाइंदगी कर रहे थे। घर में संगीत का माहौल और तालीम ही थी कि मेहदी हसन साहब का पहला पब्लिक परफॉर्मेंस सिर्फ आठ साल की उम्र में हुआ। उन्होंने अपने बड़े भाई के साथ ध्रुपद गाया। ये यही कोई 1935 के आस पास की बात होगी।

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इसके करीब 12 साल देश की तस्वीर ही बदल गई। देश अंग्रेजों से आजाद तो हो गया लेकिन उसके बाद विभाजन का दंश सभी ने झेला। हजारों लोग अपनों से बिछड़ गए। बच्चे अनाथ हो गए। बहुत से इधर के लोग उधर चले गए और उधर के लोग इधर आए। उस त्रासदी की दर्दनाक कहानियां हम अभी तक सुन रहे हैं। त्रासदी के इसी माहौल में मेहदी हसन का परिवार पाकिस्तान चला गया। उस वक्त मेहदी हसन की उम्र करीब बीस साल थी।

साल 1927 की बात है। राजस्थान के शहर झुंझनूं के एक गांव लूना में मेहदी हसन साहब का जन्म हुआ। तारीख थी 18 जुलाई। ये मेहदी हसन की शख्सियत ही है कि उनके जन्म के बाद से लेकर आज करीब सौ साल बाद भी उस गांव की पहचान मेहदी हसन ही हैं।

जाहिर है बंटवारे के बाद के हालात अच्छे नहीं थे। लोग बेघर हो चुके थे। हजारों लोग मंदिरों, मस्जिदों में रुक कर गुजर बसर कर रहे थे। कई कैंप में थे। ऐसे मुश्किल वक्त में पाकिस्तान में मेहदी हसन के परिवार के लिए भी गुजर बसर करना एक बड़ी चुनौती था। ऐसे में मेहदी हसन ने कुछ समय साइकिल की दुकान में काम किया। रोजी रोटी के लिए कार और डीजल ट्रैक्टर मैकेनिक का काम भी उन्होंने किया।

ये अलग बात है कि जिस इंसान की कई पुश्तों ने संगीत में दिल लगाया हो उसका दिल मशीन के कलपुर्जों में कहां लगने वाला था। जाहिर है मेहदी हसन का मन भी संगीत के बिना कैसे लग सकता था। उन्होंने पैसों की दिक्कत के बावजूद रियाज नहीं छोड़ा। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और कहीं से उनके हुनर की बात पाकिस्तानी रेडियो के अफसरानों तक पहुंच गई। वो 1952 का साल था, जब उन्हें रेडियो पाकिस्तान के लिए गाने का मौका मिला। मेहदी हसन को ठुमरी गायक के तौर पर गायकी का पहला मौका मिला। रेडियो पाकिस्तान के कराची स्टेशन के अनवर इनायतुल्लाह ने एक इंटरव्यू में बताया है कि एक युवा, थोड़े-थोड़े गंजे हो रहे, चमकीली आंखों वाले शख्स ने गाना शुरू किया। उन्होंने ऐसा गाया कि फिर वो वहीं के होकर रह गए। ये वही मेहदी हसन थे।

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धीरे-धीरे उन्होंने ग़ज़ल गायक के तौर पर अपनी पहचान बनाई। फिर 1964 का साल आया, जब फिल्म-फिरंगी की एक ग़ज़ल दुनिया के सामने आई। ग़ज़ल के बोल थे-गुलों में रंग भरे, बाद-ए नौ बहार चले, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले। फैज अहमद फैज की इस ग़ज़ल को राग झिंझोटी में उनके बड़े भाई गुलाम कादिर ने कंपोज किया था। इसके बाद तो मेहदी हसन धीरे धीरे ग़ज़ल गायकी का पर्याय बनते चले गए। एक के बाद एक नगमें उनकी मखमली आवाज में आते गए और लोगों के दिलो दिमाग पर छाते गए।

आबिदा परवीन उन्हें संगीत के क्षेत्र का ‘टाइटैनिक फिगर’ बताती हैं। लता मंगेशकर ने एक बार कहा था कि आप हसन साहब को सुनें तो लगता है जैसे उनके गले में ईश्वर का वास है। भगवान उनके लिए गाते हैं। ये मेहदी साहब का सम्मान ही था कि भारत में हुए उनके एक कार्यक्रम के दौरान सोनू निगम पूरे समय उनके पैरों के पास बैठकर उन्हें सुनते रहे। गुलों में रंग भरे के साथ मोहब्बत करने वाले कम ना होंगे, रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाना है, अबकी हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें और रफ्ता रफ्ता जैसी ग़ज़लों ने लोगों को मेहदी हसन का दीवाना बना दिया। उनकी आवाज सीमाओं के परे हो गई। वो ग़ज़ल शहंशाह, ग़ज़ल सम्राट कहलाने लगे। दुनिया भर के ग़ज़ल प्रेमियों ने उन्हें सिर माथे पर बिठाया।

80 के दशक के आखिरी वर्षों में उनकी तबियत ने साथ देना छोड़ दिया। उन्होंने प्लेबैक सिंगिग से दूरी बना ली। उनके फेफड़ों ने साथ देना बिल्कुल छोड़ दिया था। इसके बाद भी उन्होंने 2009 में लता मंगेशकर के साथ तेरा मिलना गाया। इस रिकॉर्डिंग की खासियत ये थी कि मेहदी हसन ने अपना हिस्सा पाकिस्तान में रिकॉर्ड किया और लता जी ने भारत में। दोनों ट्रैक को मिक्स करके गाना तैयार हुआ। संगीत मेहदी हसन साहब का ही था। करीब 12 साल तक वो बीमारियों से लड़ते रहे। आखिरी वक्त वो भारत आना चाहते थे। अपने जन्म स्थान की मिट्टी देखना चाहते थे। लता मंगेशकर, दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन से मिलना चाहते थे। अफसोस उनकी ये तमन्ना दिल में ही रह गई। उससे बड़ा अफसोस इस बात का कि उन्हें वीजा मिल गया था लेकिन सेहत ने साथ नहीं दिया। 13 जून 2012 को 12 बजकर 22 मिनट पर उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया और इसके बाद के अफसोसनाक किस्से से ही हमने आज की किस्सागोई शुरू की थी।

फिल्म और संगीत की दुनिया को अलग से समझने के पढ़िए महफिल

First Published: 2017-11-05 19:28:55.0

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