क़िस्सा मुख़्तसर - शायर अमीर मीनाई ने दाग़ देहेलवी से पूछी एक राज़ की बात

क़िस्सा मुख़्तसर - शायर अमीर मीनाई ने दाग़ देहेलवी से पूछी एक राज़ की बातदाग़ देहेलवी

दाग़ देहेलवी मशहूर शायर ज़ौक के शागिर्द थे। उर्दू अदब के जानकार मानते हैं कि दाग़ साहब की शायरी में सिर्फ ख्याल नहीं, बल्कि ज़ुबान की भी ख़ूबसूरती दिखाई देती थी। इकबाल, जिगर मुरादाबादी, बेख़ुद देहलवी और सीमाब अकबारबादी उन्हें अपना उस्ताद मानते थे। उनके बारे में कहा जाता था कि जब वो मुशायरे में गज़ल पढ़ते हैं तो सुनने वालों के लिए बिना दाद दिये रह पाना नामुमकिन होता है।

लखनऊ में एक मुशायरा हो रहा था, इस मुशायरे में काफी बड़े शायरों ने शिरकत की थी। दाग़ देहेलवी को भी खास तौर से बुलाया गया था, इस मुशायरे में लखनऊ से ताल्लुक रखने वाले अमीर मीनाई भी मौजूद थे। अमीन मीनाई साहब दाग़ साहब के अच्छे दोस्तों में थे लेकिन उन दिनों उनकी गज़लों को वो शोहरत नहीं मिल पा रही थी जो दाग़ साहब के शेरों को मिल रही थी।

मुशायरे में तमाम शायरों ने अपने-अपने कलाम पेश किये, फिर बारी आई अमीर मीनाई साहब की, उन्होंने भी गज़ल पढ़ी, दाद मिली लेकिन वो हिस नहीं उठा जिसकी उन्हें उम्मीद थी। फिर बारी आई दाग़ साहब की, उन्होंने एक शेर पढ़ा -

उज्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं

बाइस ए तर्क ए मुलाक़ात बताते भी नहीं

देखते ही मुझे महफिल में ये इरशाद हुआ

कौन बैठा है इसे लोग उठाते भी नहीं
दाग़ देहेलवी

महफिले मुशायरा दाद ए सुखन से गूंज गई, हर तरफ से वाह-वाह का शोर उठने लगा। जब दाग़ साहब अपना कलाम पढ़ चुके तो उनकी बग़ल में बैठे अमीर मीनाई दाग़ साहब से मज़ाहिया अंदाज़ में कहा, "दाग़ साहब, क्या आफ़त ढा देते हैं आपके शेर, कैसे लिखते हैं इतना ख़ूबसूरत, कुछ हमें भी बताइये"

अमीर मीनाई

वो मुस्कुराकर बोले, “जब काली घटा छा जाती हों, ठंडी हवाएं गुनगुनाती हों, मौसमे बहार का तकाज़ा हो, तो आप कभी पैमाना मुंह से लगाते हैं?“ मीनाई ने लखनवी अंदाज में जवाब दिया “अमाँ पागल हो गए है क्या? मैं मोमिन आदमी हूँ, शराब पीना तो दूर छू भी नहीं सकता” दाग साहेब ने फिर पूछा “अच्छा ये बताइये कि शामे अवध की रंगीन फिजां में बेला चमेली से महकती ठंडी गलियों में कभी आपने कोठे का रुख किया है?” अब मीनाई थोड़ा सा नाराज़ होने लगे, “ हद्द है, कैसी बातें कर रहे हैं आप, मेरे नाम में ही मीनाई लगा है और मुझसे ये उम्मीद …भाई तौबा है….” दाग देहलवी ने उनके कान में फुसफुसाते हुए कहा, “तो भई बीवी के बग़ल में बैठकर लिखोगे तो ऐसा ही लिखोगे जैसा लिख रहे हो

- मशहूर इतिहासकार योगेश प्रवीन से बातचीत पर आधारित

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