महफ़िल

गुलज़ार से पाकिस्तान में एक बुज़ुर्ग बोले ‘तेरा बाप आता था किराए के 5 रु लेता था, तू भी ले जा’  

कुछ साल पहले गुलज़ार बंटवारे के पहले के अपने घर गए थे सत्तर साल बाद -- जो कि अब पाकिस्तान के झेलम जिले के दीना में है। उनकी इस यात्रा को दोनों देशों की मीडिया ने कवर किया, और बात ये भी उठी थी कि गुलज़ार का बर्ताव अजीब था यात्रा के दौरान। साल 2015 में गुलज़ार ने खुद ही अपने पाकिस्तान जाने के अनुभव को सुनाया था, अपने बर्ताव के बारे में भी कहा। ये किस्सा उन्होंने मराठी अखबार लोकमत के गेस्ट एडिटर के तौर पर वहां एक दिन बिताने के बाद सुनाया था।

शब्दश: पढ़िए गुलज़ार ने क्या कहा था:

आठ बरस का था जब निकला था वहां से और 78 बरस का था जब गया वापस। 70 साल के बाद आप जब दोबारा उस जगह जाते हैं, वो घर वहां पाते हैं, वो गली वहां पाते हैं, वो स्कूल देखते हैं। बहुत ही भावनात्मक अनुभव होता है ये। उस समय में मेरा कुछ पल अकेले रहने का मन था। लेकिन जब लोग आपको जानते हों तो ये बाधा भी बन जाती है। इतनी बड़ी भीड़ वहां आपके साथ गली में खड़ी है अगर वो हटेगी तब तो गली देख पाएंगे पूरी।

वो छोटी सी एक गली है, दूर तक जाती है। कुछ दूर तक आगे गया भी उस गली में। पलहे वो गली जहां खुलती थी, उसके आगे खेत ही खेत थे। मेरे बचपन की ये तस्वीर है ज़हन में। अब वहां दीवार बना दी है।

मेरी गली के आगे बिल्डिंगें बन गईं...

मैंने एक सा कहा कि इसके पीछे तो खेत थे, तो बोला वो जी, अब वहां बिल्डिंगें बन गई हैं। वहां से पीछे मुड़ के गली पूरी देखने की कोशिश की पर फिर भीड़ की वजह से नहीं देख पाया। इसमें बंद सा होने लग गया मैं खुद में।

लोग लेकिन बहुत अच्छे थे। घर खोल के दिया उन्होंने, पर्दादार। औरतें पर्दे में चली गईं पर मुझे घर अंदर से देखने दिया। कुछ बुज़ुर्ग वहां मिले, बहुत बूढे़ थे। एक मेरे बड़े भाई को जानते थे, एक को बहन का नाम पता था और एक को मेरी मां का नाम भी याद था। एक बुज़ुर्ग तो मामा को भी जानते थे, पूछे कहां हैं मामा आज कल। उन लोगों से अपने रिश्तेदारों के बारे में सुना, जिनके बारे में हम भी अब नहीं जानते कि वहां (पाकिस्तान) से आने के बाद वो कहां जाकर बसे।

एक ने पंजाबी में हंसकर बोला, "तेरा बाप आता था तो किराए के पांच रुपए लेता था, अब मालिक मकान तू आया है तो पांच रुपए ले जा"।

ये सब देख-सुनकर मैं बस अकेले बैठकर कहीं रोना चाहता था, पर लोगों की भीड़ ही भीड़। मैंने वो रेलवे स्टेशन भी देखा जहां मैं सुबह जाया करता था।

तेरा बाप आता था तो किराए के पांच रुपए लेता था, अब मालिक मकान तू आया है तो पांच रुपए ले जा।
गुलज़ार से एक बुज़ुर्ग ने कहा

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लोगों ने खाने का इंतज़ाम किया था। पंजाब के लोग खिलाते-पिलाते बहुत अच्छा हैं। बड़े मेहमान नवाज़ लोग होते हैं। पर मैं कार मैं बैठा और मैंने कहा कि मुझे नहीं खाना है आप हाइवे पर ले लीजिए। मैं ये समझा नहीं सकता कि मुझे क्यों नहीं खाना है। अरे भूख मर जाती है, आप खा भी नहीं सकते। ऐसे में एक निवाला भी अंदर नहीं जाता।

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ऐसे हाल में ये उनके प्रति मेरा खराब बर्ताव तो था जिन्होंने हर बंदोबस्त किया था। पर क्या करेंगे आप? आप बस कहीं एकांत में जाकर रोना चाहते हैं, क्या करेंगे आप? तो मैं और कुछ कर ही नहीं पाया सिवाए इसके कि वहां से बिना खाए निकल पड़ता, खराब बर्ताव के लिए कहा कि बाद में समझा दूंगा, मैं बस अभी यहां से निकलना चाहता हूं। तो मेरे पास अगले दिन होने वाले त्योहार में भी जाने का कोई मौका नहीं बचा था। बस अगली सुबह मैं सिर्फ वाघा गया और फिर वापस आ गया।

वहां के लोगों को अब तक शिकायत है। मैंने उसके बाद लिखा, इंटरव्यू भी दिए कि भाई ये कारण थे जिनकी वजह से मैं नहीं रुक पाया। अब आप को लगता है कि वापस जाएंगे तो बचपन का मज़ा आएगा। मुझे तो नहीं आया। मज़ा आया लेकिन वो दर्द का मज़ा था। कहकहा लगाने का मज़ा नहीं है। दर्द का मज़ा है और वो रखने का मज़ा भी है।

मेरा वापस जाने का कोई इरादा नहीं है, पहले भी नहीं था। कारण ये कि मैं अपने बचपन की यादों की तस्वीरों को मिटाना नहीं चाहता था।