क़िस्सा मुख़्तसर : “गधे आम नहीं खाते”

क़िस्सा मुख़्तसर : “गधे आम नहीं खाते”Mirza Ghalib 

ग़ालिब को आम बहुत पसंद थे। उन पर लिख़ी गई मुख़्तलिफ़ किताबों के मुताबिक आम के लिये उनकी दीवानगी हद दर्जे की थी।
वो भी गर्मियों का मौसम था। बाज़ार में आम आ चुके थे लेकिन ग़ालिब की जेब खाली थी। उनके कई कद्रदानों में से एक आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर को जब ये पता चला तो उन्होने ग़ालिब की मदद करनी चाही पर ग़ालिब ने मदद लेने से इंकार कर दिया।

बादशाह ने उन्हे मुग़लिया दौर की तारीख़ लिखने का काम दिया और इस बहाने से उनकी मदद कर दी।
अब ग़ालिब की जेब भरी थी और आम का मौसम था। ग़ालिब ने फ़ौरन दोस्तों को बुलाया, बाज़ार से आम खरीदे और पुरानी दिल्ली की गली में ही चारपाई डालकर दोस्तों के साथ आम का लुत्फ़ लेने लगे।
आम-नोशी के दौरान ग़ालिब ने देखा कि उनके दोस्त हकीम साहब आम नहीं खा रहे। कहा, “अमा लीजिये ना” वो बोले, “नही मैं आम नहीं खाता”। ग़ालिब हैरानी से बोले, “आप पहले शख़्स हैं जिन्हे मैं आम को लिए इंकार करते देख रहा हूं”। हकीम साहब मुस्कुरा दिये।
इत्तिफाक़ से उसी गली से कुछ गधे बोझा लादे हुए गुज़रे तो किसी ने चारपाई पर रखे कुछ आम एक गधे की तरफ उछाल दिये। गधे ने आम सूंघे और बिना खाए वहां से चला गया।
ये देखकर हकीम साहब को ग़ालिब पर चुटकी लेने का मौका मिल गया। गला खंखार कर बोले, “लीजिये साहिबान आम तो गधे तक नहीं खाते, लेकिन आप लोग खाते हैं” कहकर वो मुस्कुराने लगे। ग़ालिब ने आम की गुठली चूसते हुए कहा - “जी सही फरमाया आपने, गधे आम नहीं खाते”। गली कहकहों से गूंज गई।

मिर्ज़ा ग़ालिब पर बनी तमाम फ़िल्मों में इस प्रसंग का इस्तेमाल किया गया है। साल 1954 में आई ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ में भी एक सीन इसी प्रसंग पर फिल्माया गया। इस फ़िल्म में ग़ालिब का क़िरदार निभाया था उस वक्त के सुपरस्टार भारत भूषण ने, फिल्म के डायरेक्टर थे सोहराब मोदी और कहानी लिखी थी सआदत हसन मंटो ने। इसके बाद साल 1988 में गुलज़ार ने भी मिर्ज़ा ग़ालिब नाम से एक टीवी सीरीज़ शुरु की, इस बार ग़ालिब का किरदार निभाया था नसीरुद्दीन शाह ने। उस सीरीज़ में भी आम वाला ये सीन डाला गया था।

आइये देखते हैं दोनों फिल्मों में ग़ालिब और उनकी आमनोशी से जुड़ा हुआ वो सीन।

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