मेंथा की खेती से जल स्तर हो रहा है कम

मेंथा की खेती से जल स्तर हो रहा है कमgaoconnection

लखनऊ। पिछले कुछ वर्षों में नगदी फसल के रूप में मेंथा की फसल का रकबा काफी बढ़ गया है, जिससे किसानों को तो मुनाफा हुआ है, लेकिन इन क्षेत्रों में भूजल का स्तर काफी नीचे पहुंच गया है।

लखनऊ, सीतापुर, रायबरेली, बाराबंकी, उन्नाव, जालौन जैसे कई ज़िलो में मेंथा की खेती होती है, किसान ट्यूबवेल के सहारे ही इनकी सिंचाई करते हैं। मेंथा की खेती तीन महीने में तैयार होती है, जिसमें औसतन आठ से दस सिंचाई की जरूरत होती है। 

मेंथा की खेती में अंधाधुंध सिंचाई से पानी का दोहन हो रहा है, सिंचाई के साथ मेंथा पेराई (आसवन) में भी काफी पानी खर्च होता है। केन्द्रीय औषधि एवं सगंध संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. सौदान सिंह बताते हैं, “मेंथा में आठ-दस बार सिंचाई होती है, एक सिंचाई में पांच सौ मिमी सिंचाई की जाती है।

अनुमान के अनुसार एक बीघा की सिंचाई में लगभग 30 से 35 हजार लीटर पानी की जरुरत होती है। इस हिसाब से ढाई से तीन लाख लीटर पानी खर्च होता है।”यही नहीं सिंचाई के साथ मेंथा पेराई (आसवन) में भी लगभग 1200 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। कृषि उत्पादन आयुक्त प्रवीर कुमार ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा, “उत्तर प्रदेश में अधिक पानी लेने वाली फसलों से बच कर अन्य फसलों को बढ़ावा देने की जरूरत है। 

जालौन के जिलाधिकारी ने पत्र लिखकर कर बताया कि मेंथा पर बैन लगा दीजिए, किसान मेंथा का उत्पादन कर रहे हैं, खेती से पानी बहुत खर्च हो रहा है, जिले में मेंथा की बढ़ती खेती से भूजल स्तर भी कम हो रहा है। साथ ही ही नहर के पानी के वितरण में सही नहीं हो पाता है।” मार्च से अप्रैल में इसका रोपाई की जाती है। मई से जून के मध्य फसल पूरी तरह से तैयार हो जाती है।  कम समय में तैयार हो जाने वाली मेंथा को आमदनी का अच्छा जरिया माना जाता है। 

कृषि उत्पादन आयुक्त ने कहा कि 111 विकास खण्ड खेती के लिए भूगर्भ जल के अतिरिक्त प्रयोग के कारण अतिदोहित श्रेणी में आ गये है, जबकि 68 विकास खण्ड चिंताजनक जल स्तर पर आ चुके हैं। 

डॉ. सौदान सिंह बताते हैं, “किसानों को चाहिए कि एक बार यदि वह अधिक पानी वाली फसल लेते हैं, तो दूसरी बार कम पानी वाली फसल बोये, ताकि संतुलन बना रहे। मेंथा की फसल की जड़ें पांच-छह सेमी तक ही जाती है, इसलिए उर्वरता पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है।”

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