महिलाओं के लिए पारंपरिक हर्बल ज्ञान

महिलाओं के लिए पारंपरिक हर्बल ज्ञानगाँव कनेक्शन

सैकड़ों वर्षों से तमाम रोगों के समाधान के लिए जहां एक ओर औषधीय पौधों का इस्तेमाल किया गया वहीं इन्हें सौंदर्य प्रसाधन के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता रहा है। हाल के कुछ वर्षों में बाजार में जिस तरह से कृत्रिम रसायनोंयुक्त सौंदर्य प्रसाधनों की बाढ़ सी आई है, इनके दुष्प्रभावों की बातें भी खूब होने लगी हैं। 

कई आधुनिक शोधों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सौंदर्य प्रसाधन में इस्तेमाल में आने वाले लगभग हर एक रसायन के दुष्प्रभाव हमारे शरीर में देर सवेर देखे जा सकते हैं। कृत्रिम रूप से तैयार सौंदर्य प्रसाधनों में कम से कम 500 विभिन्न प्रकार के रसायन इस्तमाल में लाए जाते हैं। वैज्ञानिक ड्रेलोस (2000) की ‘पोस्ट ग्रेजुएट मेडिसिन’ नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोध रपट के अनुसार त्वचा की देखभाल के नाम पर तैयार होने वाले अनेक कॉस्मेटिक्स में झाग लाने वाले तत्व, कृत्रिम सुगंधित पदार्थ, कृत्रिम रंग, इमल्सीफायर्स, प्रिजर्वेटिव्स, पेराबेन, पोरपायलीन ग्लायकोल, PVP/VA को- पॉलिमर, पेट्रोलेटम, पेराफिन और कई तरह की मेटल्स आदि का समावेश किया जाता है। इनकी वजह से त्वचा में खुजली, लालपन, काले और भूरे रंग के धब्बे तैयार होना और कैंसर जैसे भयावह रोगों के होने की भी पुष्िट हो चुकी है। पिछले एक दशक में अब लोग सौंदर्य के साथ-साथ सेहत को भी प्राथमिकता देने लगे हैं। 

अनियमित जीवन शैली, नींद का पूरा न होना, पर्यावरण में उपस्थित रसायन, धूल के कण, प्रदूषण आदि की वजह से समय से पहले शरीर पर बुढ़ापे का असर दिखाई देना, मुहांसों का होना, आंखों के चारों तरफ डार्क सर्कल्स का बनना, बालों का असमय पक जाना, त्वचा पर असमय झुर्रियों का बनना, शरीर पर दाग धब्बे आदि बनने की वजह से कई लोग आईने के सामने जाने से भी डर लगने लगता हैं, आत्मविश्वास में जबरदस्त कमी आने लगती है। 

भोज्य पदार्थों में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, तेलीय और मिर्चयुक्त खाद्य पदार्थों, ज्यादा चाय-कॉफी और एल्कोहल आदि के सेवन से भी इन तमाम समस्याओं का होना तय होता है। भागदौड़ और तनाव ग्रस्त जीवन में वक्त की कमी होने की वजह से लोगों का ध्यान परंपरागत हर्बल नुस्खों से दूर होता जा रहा है और आहिस्ता-आहिस्ता रसायनयुक्त घातक उत्पादों ने घर-घर तक अपनी पहुंच बना ली है। अब वक्त आ चुका है जब हमें अपनी जड़ों तक जाना होगा, यानि सदियों से चला आ रहा परंपरागत हर्बल ज्ञान अपनाने की कवायद शुरू करनी होगी, जंगल लेबोरेटरी की समझ बढ़ानी होगी। खास बात यह है कि इन प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधनों के किसी भी तरह के दुष्प्रभाव नहीं है और यह सेहत को दुरुस्त करने के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

शिकाकाई 

बालों की धुलाई या शैम्पू की तरह इस्तेमाल करने के लिए शिकाकाई का इस्तेमाल ग्रामीण इलाकों में पुरजोर किया जाता है। इसके लिए शिकाकाई की फल्लियों को एकत्र कर लिया जाता है और इन्हें रात भर पानी में डुबो के रखा जाता है। अगले दिन हथेली में रगड़ कर इसके बीजों को अलग कर दिया जाता है और बचे हिस्से का इस्तेमाल बालों की धुलाई के लिए किया जाता है। माना जाता है कि यह बालों की जड़ों को मजबूत बनाता है और इनके झड़ने के सिलसिले को रोकता है। 

एलोवेरा भी एक महत्वपूर्ण पौधा है जिसका प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधनों को तैयार करने में बेजा इस्तमाल होता है। इस पौधे के सम्पूर्ण हिस्सों में अनेक महत्वपूर्ण रसायन पाए जाते हैं जिनमें मुख्य तौर पर प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेड्स, विटामिन B1, B2, B3, B6, C के अलावा फॉलिक एसिड और कई अन्य महत्वपूर्ण खनिज लवण होते हैं। एलोवेरा के रसायनों में घाव को सुखाने के अलावा चेहरे के काले दाग धब्बों को हटाने की ताकत होती है इसके अलावा त्वचा के जल जाने पर इसकी पत्तियों के भीतर पाए जाने वाला जेल (चिपचिपा पदार्थ/ रस) का लेपन किया जाए तो आराम दिलाता है। शुष्क त्वचा पर इसके चिपचपे द्रव को लगाने से नमी आ जाती है यानि यह एक जबर्दस्त मॉइस्चरायजर का काम करता है। 

नीम

नीम को कौन नहीं जानता और इसके गुणों को कौन नहीं सराहता? दुनिया भर में नीम अपने गुणों की वजह से प्रचलित है। नीम को पारंपरिक तौर पर अनेक रोगों के निवारण के लिए अपनाया जाता है। नीम के तेल को सिर पर बालों में रगड़ने से सिर से जूं और रूसी का खात्मा हो जाता है। कई ग्रामीण इलाकों में नीम के तेल के साथ करंज का तेल भी मिलाकर बालों की जड़ों तक रगड़ा जाता है, माना जाता है कि ऐसा करने से सिर से रूसियों की विदाई हो जाती है और बालों की जड़ें मजबूत हो जाती है जिससे इनके झड़ने का सिलसिला खत्म हो जाता है। चेहरे से मुहांसों को दूर करने के लिए नीम की पत्तियों का चूर्ण तैयार कर इसमें इतनी ही मात्रा में चंदन और दही मिलाकर पेस्ट तैयार किया जाए और ठीक मुहांसों के ऊपर लेपित कर दिया जाए, जब यह सूख जाए तो इसे धो लिया जाए, कुछ ही दिनों में मुहांसों से पूरा आराम मिल जाता है। डांग गुजरात के वनवासी हर्बल जानकारों के अनुसार मुहांसों का होना रक्त में अशुद्धि होने का परिचायक है। ऐसी स्थिति में यदि नीम की कच्ची पत्तियों को प्रतिदिन चबाया जाए तो और भी ज्यादा तेजी से फायदा होता है।

पपीता

सुदूर ग्रामीण अंचलों में लोग पपीते का इस्तेमाल कई तरह से प्राकृतिक सौदर्य संबंधित नुस्खों के तौर पर भी करते हैं। डांग की वनवासी महिलाएं चावल, मक्का और बाजरे के आटे की समान मात्रा (करीब आधा कप) लेती हैं और इसमें करीब 10g पके हुए पपीते को डाल देती हैं। इसमें थोड़ा सा पानी मिलाकर अच्छी तरह से मैश किया जाता है। इस पेस्ट को चेहरे पर आहिस्ता-आहिस्ता लगाया जाता है और मालिश की जाती है, माना जाता है कि चेहरे की मृत कोशिकाओं को यह अलग करने में मदद करता है और चेहरा कांतिमय और ऊर्जावान दिखायी देता है। त्वचा पर झुर्रियां आ जाने पर वनवासी हर्बल जानकार पके हुए पपीते के बीजों के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। पके हुए पपीते के बीजों को एकत्र कर लिया जाए, सुखा लिया जाए और इसका चूर्ण तैयार कर लिया जाए। जब इस्तेमाल करना हो तो एक चम्मच चूर्ण में इतनी ही मात्रा में पानी मिलाकर पेस्ट बनाया जाए और झुर्रियों वाले हिस्सों पर लेपित कर दिया जाए। जब यह पेस्ट सूख जाए तो इसे धो लिया जाए। ऐसा एक माह तक लगातार दिन में दो बार करने से फायदा जरूर होता है। 

ग्रामीण अंचलों में चना और चने का आटा यानि बेसन सौंदर्य और खूबसूरती प्राप्त करने के लिए बेहद खास माने जाते हैं। करीब एक चम्मच बेसन और कुछ मात्रा में पानी डालकर पेस्ट तैयार किया जाए और धीमे-धीमे इस पेस्ट को चेहरे से लेकर गर्दन और गले के हिस्से पर लेपित कर दिया जाए। कुछ देर में इसके सूख जाने के बाद हल्के-हल्के हाथों से इसे रगड़कर उतार लिया जाए। माना जाता है कि ऐसा करने से मृत कोशिकाएं बेसन के साथ चिपककर बाहर निकल आती हैं और चेहरे और अन्य हिस्सों जहां इसे लेपित किया गया था, वहां की त्वचा में निखार आ जाता है। हर्बल जानकारों के अनुसार लोगों को चेहरे की सफाई के लिए किसी तरह के साबुन के इस्तेमाल से दूर रहना चाहिए, इस पेस्ट के उपयोग से ज्यादा फायदा होगा। अक्सर इस लेप का इस्तेमाल चेहरे पर करते रहने से चेहरे पर निकलने वाले अनावश्यक बालों की वृद्धि भी रुक जाती है।

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