महिलाओं की भागीदारी से बदलाव

महिलाओं की भागीदारी से बदलावगाँव कनेक्शन

बिहार के चुनाव परिणामों के विश्लेषण के वक्त कई कारक गिनवाए जाते हैं, इनमें बीजेपी का नकारात्मक चुनाव अभियान, आरएसएस प्रमुख का आरक्षण पर बयान, विकास पुरूष के रूप मे नीतीश की छवि और लालू प्रसाद और जेडीयू के बॉस के बीच बेहतर तालमेल, यह कारण तो विश्लेषकों की ज़ुबान पर ही हैं।

लेकिन एक तथ्य भुला दिया जाता है, वह है महिलाओं के बीच नीतीश को मिला समर्थन। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डिवेलपिंग सोसायटी के सर्वे के मुताबिक, महागठबंधन को एनडीए की बनिस्बत 9 फीसद अधिक महिलाओं के वोट मिले।

हो सकता है इस समर्थन के पीछे नीतीश की लड़कियों के लिए साइकिल योजना जैसी लोकप्रिय फैसले को माना जाए। शायद नीतीश को यह इल्म भी न रहा हो कि उनके एक फैसले ने बिहार और खुद उनकी पार्टी के चुनावी तकदीर को बदलने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने पंचायतों में 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित करने का फैसला किया था।

बिहार पहला सूबा था जिसने स्थानीय निकायों में साल 2006 में ही महिलाओं के लिए आधी सीटें आरक्षित कर दी थीं। पंचायतों में महिलाओं की बढ़ते प्रतिनिधित्व का यही रूझान उत्तर प्रदेश में भी कई बदलाव लेकर आया है। पिछले दशक में बिहार-यूपी में शादी की औसत उम्र में इजाफा हुआ है। शादी की औसत उम्र अब केरल और तमिलनाडु जैसे अगड़े राज्यों जैसी ही हो गई है।

इसका असर भी दिखने लगा है। उत्तर प्रदेश में 2001 से 2011 के बीच दशकीय जनसंख्या वृद्धि छह फीसदी बिन्दु तक घटी है जबकि बिहार में यह दर 3.5 फीसदी बिन्दु तक घटी है। यही वह दौर है जब इन दोनों ही राज्यों में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) में भारी कमी आई है और गर्भनिरोधकों को प्रयोग बढ़ा है। बिहार के मामले में, शिशु मृत्यु दर साल 2000 में 64 से घटकर 2012 में घटकर 43 हो गई है। यह तकरीबन 33 फीसद का सुधार है। इसी अवधि में, यूपी में शिशु मृत्यु दर 84 से घटकर 53 हो गई है। जनांकिकी के जानकार तर्क देते हैं कि घटा हुआ शिशु मृत्यु दर छोटे परिवारों को बढ़ावा देता है। नब्बे के दशक में बिहार में दशकीय आबादी वृद्धि दर 28.6 फीसदी था और यूपी में 25.9 था। पिछले दशक में यह यूपी में 25.1 फीसदी और बिहार में 20.1 फीसदी पर आ गया। इस वृद्धि दर में कमी 1951 के बाद पहली बार दर्ज की गई है।

गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल और देर से हो रही शादियां, यह दोनों वजहें देश में आबादी की वृद्धि दर को थामने में बेहद कारगर साबित हुई हैं। इस बदलाव को पीछे पंचायतों में महिलाओं की बढ़ती तादाद और उससे हुआ महिला सशक्तिकरण ही वजह है। इसी महीने में यूपी में 44 फीसदी महिला प्रधान चुनी गई हैं, यानी यह एक दशक पहले के आंकड़े से पांच फीसदी अंक अधिक है।

इसी तरह, बिहार में पंचायतों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का अनुपात बढ़ा है। यह 2001 के तकरीबन शून्य से पांच साल बाद 55 फीसद तक बढ़ गया। बिहार और यूपी के ग्राम पंचायतों में बहुत सारी महिलाओं ने यह सुनिश्चित किया कि बच्चियां स्कूल जरूर जाएं। जिससे उनमें अपने अधिकारों के बारे में जागरूकता आती है। इससे शादियों की उम्र में बढ़ोत्तरी देखी जा रही है। गर्भनिरोधकों के बारे में जागरूकता ने यह तय किया है कि वह अब खुद को ढेर सारे बच्चों को पालने-पोसने के लंबे वक्त खपाऊ बोझे से बच गई हैं। इस तरह, महिलाएं सशक्तिकरण के ऐसे बदलावों की वजह से खुद को लेकर पहले से अधिक आश्वस्त हैं। हालांकि, लंबा सफर बाकी है। कोई हैरत नहीं कि उस पुरुष को, जिसने महिला सशक्तिकरण के लिए पहला कदम उठाया है, महिलाओं के वोट ने रेकॉर्ड तीसरे कार्यकाल का तोहफा दिया है। 

(लेखक पेशे से पत्रकार हैं ग्रामीण विकास व विस्थापन जैसे मुद्दों पर लिखते हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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