महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहा खादी ग्रामोद्योग

महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहा खादी ग्रामोद्योग

रायबरेली। सरावां गाँव की राजेश्वरी देवी (56 वर्ष) हर रोज़ सुबह जल्दी उठकर घर का कामकाज निपटा लेती हैं, जिससे वो पास के गाँधी आश्रम जा सकें। राजेश्वरी के साथ उनके गाँव की लगभग 12 महिलाएं आश्रम में सूत कात कर अपने घर की रोज़ी रोटी चला रही हैं।

सूत लगे हुए चरखे पर तेज़ी से अपनी अनुभवी उंगलियां चलाती राजेश्वरी आज इस काम के बलबूते ही अपनी बेटियों की पढ़ाई व उनकी ज़रूरतों को पूरा कर पा रही हैं। 

सूत कातती राजेश्वरी बताती हैं, ''हम यह काम पिछले सात वर्षों से कर रहे हैं। परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है, सूत कात कर जो भी मिलता है, उससे अपने परिवार का खर्चा चलाते हैं। पिछले वर्ष ही अपनी बड़ी बेटी का विवाह किया है।"

भारतीय खादी ग्रामोद्योग विभाग के वर्ष 2014-2015 के आंकड़ों के अनुसार देश के खादी बाज़ार में पिछले तीन वर्षों में करीब 88 फीसदी बढ़त हुई है। इसमें देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित करीब 3,000 हज़ार खादी ग्रामोद्योग केंद्रों की सहभागिता अहम रही है।

हर वर्ष पांच लाख के खादी वस्त्रों का व्यापार कर रहे रायबरेली के क्षेत्रीय गांधी खादी ग्रामोद्योग आश्रम के प्रबंधक अशोक कु मार सिंह बताते हैं, ''पिछले कुछ वर्षों में लोगों में खादी के कपड़े पहनने का चलन बढ़ा है। इससे लगातार इन वस्त्रों की मांग बढ़ी है। इसलिए गाँवों से आने वाले लोगों में इस काम के प्रति उत्साह भी ज़्यादा दिख रहा है।"

देश में अपने खादी के वस्त्रों के लिए मशहूर श्रीगांधी खादी ग्रामोद्योग हर वर्ष 1.5 करोड़ से ज़्यादा लागत के खादी वस्त्रों का व्यापार करता है। देश में खादी वस्त्रों के 60 से 70 फीसदी खरीददार युवा वर्ग से हैं। इन वस्त्रों को बनाने के लिए देश भर के विभिन्न राज्यों में रहने वाले 20,000 ग्रामीण कारीगर कार्यरत हैं। 

''पहले जब वर्ष 1986 में इस संस्थान की शुरुआत हुई थी तब हमारे यहां कुल मिलाकर 10 से 12 लोग ही काम करते थे। आज आस-पास के गाँवों से करीब 350 से ज़्यादा महिलाएं हमारे साथ काम कर रही हैं।" अशोक कु मार सिंह आगे बताते हैं।

जिला रायबरेली के ही गंगागंज गाँव की संगीता (46 वर्ष) और उर्मिला देवी (51 वर्ष) भी सूत कात कर खादी के वस्त्र बनाने का काम करती हैं। सूत की एक गठ्ठी बनाने के लिए उन्हें पांच रुपए मिलते हैं। दिनभर में वो 22 से 25 गठ्ठी बड़े आराम से बना लेती हैं।

चरखे पर सूत कातती हुई संगीता बताती हैं, ''हम ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं पर इस काम से इतना कमा लेते हैं, जिससे आसानी से घर चला लें। साथ ही इस काम में हमें सरकार की तरफ से सहायता भी मिल रही है, जिससे हमें बच्चों की पढ़ाई का खर्च और सरकारी कालोनी भी मिली है।" 

गांधी खादी ग्रामोद्योग के अंतर्गत काम करने वाले मज़दूरों को सरकार हर तीन महीने पर बनने वाली तनखाह (कुल बनाई गई सूत की गठ्ठियों) पर 20 फीसदी ज़्यादा राशि देती है। 

खादी ग्रामोद्योग में बनाए जाने वाले प्रमुख उत्पाद

-प्रसंस्कृत फल एवं सब्जियां।

-खादी के  वस्त्र (साड़ी, कुरता ,पैंट और शर्ट)।

-ऊनी क पड़े।

-अगरबत्ती। 

-तेल।

-शहद।-

-खादी फाइबर प्लेट।

-माचिस की तीली।

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